Friday, July 22, 2016

डहरिया साहब, यह लोकतांत्रिक पाप है

कांगे्रस के वरिष्ठ नेता शिव डहरिया साहब से अपनी ना तो दोस्ती है और ना ही दुश्मनी। जब वे विधायक  थे तब एक-दो बार विधानसभा में हैलो-हॉय जरूर हुआ। पेशाई होड़ भी नही है। कहां वे सुघड़ राजनीतिज्ञ और कहां अपन टुच्चे से पत्रकार लेकिन दोनों गुरूघासीदास बाबा के इस सिद्धांत पर भरोसा करते हैं कि हमेशा सच बोलो। अब तक के अपने जीवन में पहली बार देखा है कि कोई नेता चंद दिनों पूर्व अपने परिवार के साथ घटे हत्याकाण्ड को इस कदर राजनीतिक अवसरवाद में तब्दील कर सकता है? आप समझ गए होंगे कि मैं कांग्रेस नेता शिव डहरिया जी के उस आरोप की बात कर रहा हूं जिसमें उन्होंने अपने परिवार के साथ हुए दु:खद हादसे के पीछे पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी का हाथ होने का इजारेदाराना प्रहार किया है। हालांकि जिस तरह की बातें हो रही हैं या पुलिस जांच में जो संकेत मिले हैं, उसके मुताबिक हत्यारा उन्हीं के घर-गांव में है?

छत्तीसगढ़ की राजनीति में तेजी से उभरे चेहरों में हमन शिव डहरिया ला जानते हैं। जमीन से जुड़े  सतनामी समुदाय से हैं और जोगी सरकार में वे संगठन और पार्टी में खासी पहुंच भी रखते थे। डहरिया के साथ-साथ पार्टी के दिगगज भी मानते हैं कि उन्हें फर्श से उठाकर अर्श तक पहुंचाने में जोगी परिवार का आर्शीवाद रहा। फिर क्या वजह रही होगी कि सतनामी समाज के इस धरातलीय नेता के मुंह से हाई-फाई आरोप निकला? डहरिया साहब ने तर्क रखा कि जोगी परिवार ने अपनी नई पार्टी छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस में शामिल होने के लिए मुझ पर दबाव बनाया था, जिसे मैंने नहीं माना इसलिए शक है कि मुझ पर दबाव बनाने के लिए यह साजिश रची गई। अपने-अपने आकाओं की चापलूसी करने वाले कांग्रेसियों को छोड़ दें तो अधिकांश इसे डहरिया का महज पब्लिसिटी पाने और प्रदेश कांग्रेस के आलाकमान के समक्ष वफादारी प्रगट करने की असफल हाँक भर कह रहे हैं। मैंने प्रदेश कांग्रेस के सर्वोच्च नेताओं से चर्चा की तो उनने साफ कहा कि यह आरोप लगाने के पूर्व उन्होंने हमसे कोई सलाह नही ली। अगर लेते भी तो वे इस तरह के गटर-लेवली बयान का समर्थन हरगिज नही करते।

साफ है कि जोगी जी की छाप लेकर जी रहे डहरिया साहब ने आलाकमान के प्रति स्वामीभक्ति प्रगट करने के उद्देश्य से यह आरोप लगाया। जनता के बीच भी दस में से सात लोगों ने यही रॉय रखी। न्याय मांगना और किसी को षड्यंत्री करार देने में बड़ा फर्क है। पता नही, डहरिया साहब समझ पाए कि नही मगर हत्याकाण्ड के बाद उनके प्रति जनता की जो सहानुभूति उमड़ी थी, वह भी इस बयान से धुल गई है। यह भारतीय राजनीति का फिनोमिना बन चुका है कि राजनीतिक आकाओं के प्रति वफादारी साबित करने के लिए आप किसी भी स्तर तक जा सकते हैं मगर वह परिवार में घटी दुर्घटना और उससे हुई मौत को भुनाने के स्तर पर कदापि स्वीकार नही हो सकता। इसे बेहतर ढंग से साबित किया खुद गांधी परिवार ने। बड़ा सवाल यह है कि कांग्रेस जैसी बेचारी और नामुराद पार्टी में राजनीति के लिए क्या यही बचा है कि आप अपनी मां की मौत या पिता पर हुए हमले को राजनीतिक हथियार बना लें?

हालांकि यह परिपाटी सालों से चली आ रही है। कभी सोनिया गांधी के समक्ष यह नारा लगा करता था कि सोनिया हम शर्मिंदा हैं-राजीव के कातिल जिंदा हैं क्योंकि मैडम के सामने तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंहा राव या केंद्रीय मंत्री अर्जुन सिंह जैसे नेता खड़े रहते थे जिन पर राजीव गांधी के हत्यारों को जल्द से जल्द सजा दिलवाने का दबा व बनाया जाता था। वैचारिक प्रतिबद्धता को फिलहाल भूल जाऊं तो मैं सोनिया गांधी का उस समय मुरीद हुआ था जब वे प्रधानमंत्री जैसा सर्वोच्च पद ठुकराकर भारतीय राजनीति की दधीचि साबित हुई थीं। उनकी बिटिया और उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की नई उम्मीद नजर आ रही प्रियंका गांधी ने भी एक बार बड़ा दिल दिखाते हुए कहा था कि मेरे पिता के हत्यारे तो उनके साथचले गए लेकिन षड्यंत्र रचने के आरोप में जो लोग सजा काट रहे हैं, उन्हें रिहा कर देना चाहिए।

संस्कार की गहराई देखिए कि डहरिया के इस आरोप पर पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने बड़प्पनभरा बयान दिया कि शिव के परिवार से उनके पारिवारिक संबंध हैं। छोटे जोगी ने भी गुस्से को जब्त करते हुए कहा : हमारे पारिवारिक रिश्ते इस कदर रहे कि मेरी शादी में उनके माता-पिता ने एक एकड़ जमीन दान में दी। और जब उनके माता-पिता पर प्राणघातक हमला हुआ तो जो चुनिंदा लोग डहरिया के पास सबसे पहले पहुंचे, उनमें से एक मेरे पिताजी भी थे। भगवान ऐसा दु:ख किसी को ना दे। यहां दरवाजे पर खड़ा गंभीर सवाल यह भी है कि बिना हाथ-पैर के इस आरोप से डहरिया जी को क्या मिला या मिलेगा?

साफ कर दूं कि मैं जोगी परिवार को बचाने की कोशिश नही कर रहा। वे तो मुझे दक्षिणपंथी विचारों वाला पत्रकार समझकर कन्नी काटते रहे हैं मगर जब हमारे राजनीतिक जीवन में सत्य-निष्ठाएं या बेसिर-पैर के आरोपों से राजनीतिक शुचिता को धूमिल करने की कोशिश हो तब पत्रकार नही लिखेगा तो कौन कहेगा? परिपाटी सी हो गई है कि कोई बुरा राजनीतिक घटनाक्रम घटा नही कि शक की सुई जोगी परिवार की ओर फेर दी जाती है। यह ठीक है कि बोए पेड़ बबूल के तो आम कहां से होय? साीनियर-जूनियर जोगी भलीभांति जानते हैं कि सन् 2000 से 03 तक के उनके शासनकाल में जो पाप हुए, उससे प्रभावित लोगों के श्रॉप से वे या उनकी पुरानी पार्टी कांग्रेस, आज तक नही उबर सकी। फिर एक बार जो छबि जोगीद्वय की बनी, वह बीच-बीच में उठते निराधार आरोपों से और मजबूत होती चली गई।

हालांकि जोगी विरोधियों के षडयंत्र या आरोप जोगीद्वय का बाल बांका तक नहीं कर सके। अगर आप भुलुंठित नही हुए होंगे तो जगगी हत्याकाण्ड से छोटे जोगी बाइज्जत बरी हो चुके हैं। जूदेव-जोगी सीडी काण्ड में भी वे पाक साफ निकले। और यदि झीरम घाटी काण्ड की बात करें तो इस मामले में भी शक की उंगलियां नक्सली या सरकार से ज्यादा जोगीद्वय पर उठाई गई, लेकिन 10 साल के कांग्रेसी शासन यूपीए सरकार में उनसे पूछताछ तक नही हुई। एनआईए ने भी जोगीद्वय की तरफ आंख तक नही फेरी। काश शिव डहरिया जी समझ पाते कि ऐसे आरोपों से सहानुभूति नही मिलती बल्कि लोग आपके विवेक-कौशल पर ठहाके लगाते हैं, जैसे मैं लगा रहा हूं।

अनिल द्विवेदी
(लेखक राजनीतिक समीक्षक हैं)
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Thursday, July 21, 2016

डहरिया साहब, यह लोकतांत्रिक पाप है

कांगे्रस के वरिष्ठ नेता शिव डहरिया साहब से अपनी ना तो दोस्ती है और ना ही दुश्मनी। जब वे मंत्री थे तब एक-दो बार विधानसभा में हैलो-हॉय जरूर हुआ। पेशाई होड़ भी नही है। कहां वे सुघड़ राजनीतिज्ञ और कहां अपन टुच्चे से पत्रकार लेकिन दोनों गुरूघासीदास बाबा के इस सिद्धांत पर भरोसा करते हैं कि हमेशा सच बोलो और कोई झूठ बोले तो उसे आईना दिखाओ। अब तक के अपने जीवन में पहली बार देखा है कि कोई नेता चंद दिनों पूर्व अपने परिवार के साथ घटे हत्याकाण्ड को इस कदर राजनीतिक अवसरवाद में तब्दील कर सकता है? आप समझ गए होंगे कि मैं कांग्रेस नेता शिव डहरिया जी के उस आरोप की बात कर रहा हूं जिसमें उन्होंने अपने परिवार के साथ हुए दु:खद हादसे के पीछे पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी का हाथ होने का इजारेदाराना प्रहार किया है। हालांकि जिस तरह की बातें हो रही हैं या पुलिस जांच में जो संकेत मिले हैं, उसके मुताबिक हत्यारा उन्हीं के घर-गांव का हो सकता है।

छत्तीसगढ़ की राजनीति में तेजी से उभरे चेहरों में हमन शिव डहरिया ला जानते हैं। जमीन से जुड़े  सतनामी समुदाय से हैं और जोगी सरकार में ईमानदार मंत्री के तौर पर गिने जाते रहे। डहरिया के साथ-साथ पार्टी के दिगगज भी मानते हैं कि उन्हें फर्श से उठाकर अर्श तक पहुंचाने में जोगी परिवार का आर्शीवाद रहा। फिर क्या वजह रही होगी कि सतनामी समाज के इस धुरंधर नेता के मुंह से इतना घटिया आरोप निकला? डहरिया साहब ने तर्क रखा कि जोगी परिवार ने अपनी नई पार्टी छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस में शामिल होने के लिए मुझ पर दबाव बनाया था, जिसे मैंने नहीं माना इसलिए शक है कि मुझ पर दबाव बनाने के लिए यह साजिश रची गई। अपने-अपने आकाओं की चापलूसी करने वाले कांग्रेसियों को छोड़ दें तो अधिकांश इसे डहरिया का महज पब्लिसिटी पाने और प्रदेश कांग्रेस के आलाकमान के समक्ष वफादारी प्रगट करने की असफल हाँक भर कह रहे हैं। मैंने प्रदेश कांग्रेस के सर्वोच्च नेताओं से चर्चा की तो उनने साफ कहा कि यह आरोप लगाने के पूर्व शिव डहरिया ने उनसे कोई सलाह नही ली। अगर लेते भी तो वे इस तरह के गटर-लेवली बयान का समर्थन हरगिज नही करते।

साफ है कि जोगी जी की छाप लेकर जी रहे डहरिया साहब ने आलाकमान के प्रति स्वामीभक्ति प्रगट करने के उद्देश्य से यह आरोप लगाया। जनता के बीच भी दस में से सात लोगों ने यही रॉय रखी। न्याय मांगना और किसी को षड्यंत्री करार देने में बड़ा फर्क है। पता नही, डहरिया साहब समझ पाए कि नही मगर हत्याकाण्ड के बाद उनके प्रति जनता की जो सहानुभूति उमड़ी थी, वह भी इस बयान से धुल गई है। यह भारतीय राजनीति का फिनोमिना बन चुका है कि राजनीतिक आकाओं के प्रति वफादारी साबित करने के लिए आप किसी भी स्तर तक जा सकते हैं मगर वह परिवार में घटी दुर्घटना और उससे हुई मौत को भुनाने के स्तर पर कदापि स्वीकार नही हो सकता। इसे बेहतर ढंग से साबित किया खुद गांधी परिवार ने। बड़ा सवाल यह है कि कांग्रेस जैसी बेचारी और नामुराद पार्टी में राजनीति के लिए क्या यही बचा है कि आप अपनी मां की मौत या पिता पर हुए हमले को राजनीतिक हथियार बना लें?

हालांकि यह परिपाटी सालों से चली आ रही है। कभी सोनिया गांधी के समक्ष यह नारा लगा करता था कि सोनिया हम शर्मिंदा हैं-राजीव के कातिल जिंदा हैं क्योंकि मैडम के सामने तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंहा राव या केंद्रीय मंत्री अर्जुन सिंह जैसे नेता खड़े रहते थे जिन पर राजीव गांधी के हत्यारों को जल्द से जल्द सजा दिलवाने का दबा व बनाया जाता था। वैचारिक प्रतिबद्धता को फिलहाल भूल जाऊं तो मैं सोनिया गांधी का उस समय मुरीद हुआ था जब वे प्रधानमंत्री जैसा सर्वोच्च पद ठुकराकर भारतीय राजनीति की दधीचि साबित हुई थीं। उनकी बिटिया और उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की नई उम्मीद नजर आ रही प्रियंका गांधी ने भी एक बार बड़ा दिल दिखाते हुए कहा था कि मेरे पिता के हत्यारे तो उनके साथ ही चले गए लेकिन षड्यंत्र रचने के आरोप में जो लोग सजा काट रहे हैं, उन्हें रिहा कर देना चाहिए।

संस्कार की गहराई देखिए कि डहरिया के इस आरोप पर पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने बड़प्पनभरा बयान दिया कि शिव के परिवार से उनके पारिवारिक संबंध हैं। छोटे जोगी ने भी गुस्से को जब्त करते हुए कहा : हमारे पारिवारिक रिश्ते इस कदर रहे कि मेरी शादी में उनके माता-पिता ने एक एकड़ जमीन दान में दी। और जब उनके माता-पिता पर प्राणघातक हमला हुआ तो जो चुनिंदा लोग डहरिया के पास सबसे पहले पहुंचे, उनमें से एक मेरे पिताजी भी थे। भगवान ऐसा दु:ख किसी को ना दे। यहां दरवाजे पर खड़ा गंभीर सवाल यह भी है कि बिना हाथ-पैर के इस आरोप से डहरिया जी को क्या मिला या मिलेगा?

साफ कर दूं कि मैं जोगी परिवार को बचाने की कोशिश नही कर रहा। वे तो मुझे दक्षिणपंथी विचारों वाला पत्रकार समझकर कन्नी काटते रहे हैं मगर जब हमारे राजनीतिक जीवन में सत्य-निष्ठाएं या राजनीतिक शुचिता दाँव पर हो, या बेसिर-पैर के आरोपों से राजनीतिक शुचिता को धूमिल करने की कोशिश हो तब पत्रकार नही लिखेगा तो कौन कहेगा? परिपाटी सी हो गई है कि कोई बुरा राजनीतिक घटनाक्रम घटा नही कि शक की सुई जोगी परिवार की ओर फेर दी जाती है। यह ठीक है कि बोए पेड़ बबूल के तो आम कहां से होय। साीनियर-जूनियर जोगी भलीभांति जानते हैं कि सन् 2000 से 03 तक के उनके शासनकाल में जो पाप हुए, उससे प्रभावित लोगों के श्रॉप से वे या उनकी पुरानी पार्टी कांग्रेस, आज तक नही उबर सकी। फिर एक बार जो छबि जोगीद्वय की बनी, वह बीच-बीच में उठते निराधार आरोपों से और मजबूत होती चली गई।

हालांकि जोगी विरोधियों के षडयंत्र या आरोप जोगीद्वय का बाल बांका तक नहीं कर सके। अगर आप भुलुंठित नही हुए होंगे तो जगगी हत्याकाण्ड से छोटे जोगी बाइज्जत बरी हो चुके हैं। जूदेव-जोगी सीडी काण्ड में भी वे पाक साफ निकले। और यदि झीरम घाटी काण्ड की बात करें तो इस मामले में भी शक की उंगलियां नक्सली या सरकार से ज्यादा जोगीद्वय पर उठाई गई, लेकिन 10 साल के कांग्रेसी शासन यूपीए सरकार में उनसे पूछताछ तक नही हुई। एनआईए ने भी जोगीद्वय की तरफ आंख तक नही फेरी। काश शिव डहरिया जी समझ पाते कि ऐसे आरोपों से सहानुभूति नही मिलती बल्कि लोग आपके विवेक-कौशल पर ठहाके लगाते हैं जैसे मैं लगा रहा हूं।

अनिल द्विवेदी
(लेखक राजनीतिक समीक्षक हैं)
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Sunday, December 13, 2015

सिस्टम बिका है, आप नहीं

मॉडल जेसिका लाल, आरूषि, मदेरणा, गोपाल हाण्डा की तरह ही सलमान खान मामले में भी मीडिया ट्रायॅल शुरू होना चाहिए ताकि गरीबों को न्याय मिल सके।  


जरा वर्ष 1999 याद कीजिए. कांग्रेस के भूतपूर्व संसद सदस्य और केन्द्रीय राज्यमंत्री रह चुके विनोद शर्मा के बिगडैल शहजादे मनु शर्मा ने शराब ना परोसने के दण्डस्वरूप दिल्ली में मॉडल जेसिका लाल की गोली मारकर हत्या कर दी थी. बेहद हाईप्रोफाइल केस की चार साल तक चली सुनवाई के बाद आरोपी को निचली अदालत ने यह कहते हुए बरी कर दिया था कि उसे पुख्ता सुबूत नहीं मिले थे. 

जहां तक मेरी जानकारी है, इस शर्मनाक फैसले के खिलाफ जेसिका के रिश्तेदार, कुछ एनजीओ लामबंद हुए थे और ‪प्त‎हृष्ठञ्जङ्क‬ एनडीटीवी सहित कुछ और न्यूज चैनलों ने मुहिम को थामते हुए असली न्याय पाने की लडाई लडी थी. संभवत: राष्ट्रपति के पास प्रकरण को पुन: खोलने की मांग की गई थी तथा इजाजत मिलने के बाद मामला पुन: उपरी अदालत में चला और अन्तत: मुख्य आरोपी मनु शर्मा को 2006 में उम्र कैद की सजा हुई थी और जेसिका के परिजनों को न्याय मिला था. इस पर एक फिल्म भी बनी जिसका नाम था : नो वन किल्ड जेसिका.

अभी ताजा मामला सलमान खान से जुडा है. अगर हम सबको लगता है कि अभिनेता सलमान खान के मामले में पैसों और रसूख के दम पर न्याय को खरीदा गया है तथा लैण्डक्रूजर कार से मारे गए लोगों के परिजनों को न्याय मिलना चाहिए तो एक बार पुन: हम सबको इस फैसले के खिलाफ उठ खडा होना चाहिए. अपने  फैसले में एक न्यायाधीश ने माना है कि पुलिस ने मामले को ठीक से जांचा नहीं और ना ही सुबूत पेश किए.  ऐसे में आरोपी सलमान को सजा कैसे मिलती? 

मैंने पत्रकारिता में पढ़ा है कि लोकतंत्र के तीन खम्भे— न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका किसी को न्याय दिलाने में असमर्थ होते दिखें तो फिर चौथे स्तंभ खबरपालिका को इसकी मशाल थमानी चाहिए. फिलहाल पत्रकारिता में आने को इच्छुक नई कोपलों को पढा रहा हूं और उन्हें बताता हूं कि किस तरह एनडीटीवी ने मॉडल जेसिका लाल हत्याकाण्ड में ईमानदारी दिखाई इसलिए मुझे सबसे ज्यादा उम्मीद एनडीटीवी से है.. रवीश कुमार से है और बाकी न्यूज चैनलों से भी. 

क्योंकि टीवी—अखबार वाले अपने समाज की संवेदनहीनता और गैरजिम्मेदारी पर बडे हमले करते हैं तब सलमान खान के मामले में चुप कैसे रहा जा सकता है! मीडिया ने ऐसा नही किया तो यह धारणा ज्यादा बलवती हो जाएगी कि चौथा स्तंभ— सिस्टम, पूंजीपतियों और रसूखदारों की रखैल हो गया है. उम्मीद जिंदा है क्योंकि अभिनेता संजय दत्त मात्र बंदूक रखने के आरोप में जेल जा सकते हैं तो सलमान खान क्यों नहीं जिनकी लैण्ड्क्रूजर गाडी ने गरीबों को कुचलकर मार डाला. साफ है कि मॉडल जेसिका लाल, आरूषी की तरह ही सलमान खान केस में भी मीडिया ट्रॉयल शुरू हो. 

वैसे मीडिया आम आदमी की आवाज है इसलिए जो लोग सलमान खान मामले में सोशल मीडिया साइटस पर या अपने घर की डायनिंग टेबल पर न्यायपालिका को धिक्कार रहे हैं, उन्हें भी घर से बाहर निकलकर, हाथ में मोमबत्तियां लेकर यह जतलाना होगा कि आलोचनाओं के शिकंजे में महज राजनेता या पूंजीपति ही नही बल्कि सलमान जैसे रसूखदार भी नहीं छोड़े जाएंगे. जब एक साथ लाखों आवाज उठेंगी तो मीडिया को ज्यादा ताकत मिलेगी. 
लगेगी आग तो जद में आएंगे कई मकां.. इस इलाके में सिर्फ हमारा आशियां थोड़े ही है

अनिल द्विवेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार और रिसॅर्च स्कॉलर हैं.

Saturday, October 17, 2015

किस मिट्टी के थे भाखरे साहब

शब्द=श्रद्धांजलि : दिनकर केशव भाखरे 


83 वर्षीय दिनकर केशव भाखरे, राष्ट्रवादी विचारधारा के आदर्श पत्रकार थे। स्वदेशी मन और कर्म ही उनकी पहचान रही। वे अपने परिवार से ज्यादा समाज के लिए जीए। कैंसर परछाई की तरह उनके साथ रहा लेकिन उसने उनमें कभी आत्मदया, कातरता या पराजय बोध नही जगने दिया। आगे पढ़ें : 

वरिष्ठ पत्रकार और पं. दीनदयाल उपाध्याय शोध पीठ के अध्यक्ष दिनकर केशव भाखरे (83 वर्ष) के पार्थिव शरीर को अगिन के सुपुर्द करके जब मैं वापस लौट रहा था तो मेरे सखा प्रभात मिश्र ने श्रद्धाँजलि स्वरूप यही शब्द कहे। उनका शरीर मिट्टी का था, उसी में मिल गया। अगिन भी इस शरीर को पाकर तेजोमयी हुई होगी जिसकी आत्मा ने खुद को समाज या देश हित के लिए तिल-तिलकर जलाया। भाखरे साहब किस मिट्टी के बने थे, यह जानना इसलिए जरूरी है क्योंकि वैसी जीवटता हम सभी में होनी चाहिए जैसा कि उन्होंने जी या दिखाई। गुजरे तीन महीने उनके लिए पीड़ादायक रहे लेकिन समाज के लिए जो किया या संगठन के लिए जोड़ा, दाह-संस्कार स्थल पर उमड़ी भीड़ इसकी गवाह थी। श्रद्धाँजलि देते हुए विधानसभा अध्यक्ष गौरीशंकर अग्रवाल ने कहा : परिवार से ज्यादा समाज के लिए  जिया जाये, भाखरेजी का यही संदेश है। 

ईशोपनिषद् ने कहा है : क्रतो स्मर: कृतम् स्मर:। भाखरेजी के जीवन मूल्य उस शिला के थे जिसकी रज, पद को सुशोभित करती है। वे मेहनती, मिलनसार, समय के पाबंद और कार्यकर्ताओं की कद्र करने वाले शख्स थे। उनकी तेज बुद्धि, चारित्रिक शक्ति, संयमित वाणी या अपार धैर्य का कुछ ऐसा असर था कि लोग उनसे जुड़ते चले गए। इस प्रखर आत्मा से मेरा मिलना सन् 1990 के आसपास हुआ तब वे राष्ट्रवादी विचारधारा के साथ स्वदेश और युगधर्म जैसे अखबारों को पुष्पित-पल्लवित करने में लगे थे। एक सीनियर के तौर पर मेरे लिए सबक था कि विचारधारा और पत्रकारिता के टकराव से बचना। हालांकि बाजारी ताकतें यह संभव नहीं होने दे रहीें। 

औरों के मुकाबले मेरे ऊपर भाखरेजी की कृपा दृष्टि ना के बराबर ही पड़ी लेकिन इसके उलट मेरे मन में उनके लिए हमेशा सम्मान बना रहा। मैं उनके दम गुर्दे का घनघोर प्रशंसक हूं। वे मुझे विलक्षण संयम और वस्तुनिष्ठ तटस्थता वाले व्यक्ति लगे। समयकाल अनुरूप रिश्तों पर जो बर्फ जम जाती थी, उसे पिघलाने में वे माहिर थे। स्वदेशी आंदोलन के साथ जुड़े तो मात्र दिखावे के लिए नहीं वरन् स्वदेशी उनके कर्तत्व में रच-बस गया था। भाखरे जी के साथ कैंसर परछाई की तरह साथ रहा लेकिन आत्मबल और गौमूत्र चिकित्सा के भरोसे वे उसे मात देते रहे। और यह शारीरिक अवस्था उनमें कभी आत्मदया, कातरता या पराजय बोध नही जगा सकी। उन्होंने एक प्रचारक सा जीवन जिया। सालों तक आरएसएस के संघ शिक्षा वर्ग में तृतीय वर्ष के स्वयंसेवकों को प्रशिक्षण देते रहे। घर में मात्र दो जून की रोटी के लिए ही ठहरते बाकी का समय संघ और उससे जुड़े संगठनों के लिए खपाते रहे। 

उनका व्यक्तित्व तुलसीदास के शब्दों में विसद-गुनमयफल जैसा है। उन्होंने पत्रकारिता का इस्तेमाल अपना घर-बार भरने, राजनीति करने या सत्ता में भागीदारी करने के लिए नही किया अन्यथा बारह साल की पत्रकारिता में मैंने कई श्लाघा-पुरूषों को समय-काल अनुरूप सत्ता की जुगाली करते देखा है। ताउम्र किसी विचारधारा के प्रति समर्पित होना अपने आप में एक चुनौती होता है। कुटिल राजनीति, पूंजीवादी पत्रकारिता और आयातित विचारधारा से ग्रस्त समय की मार के कई थपेड़े उन्होंने सहे लेकिन विचलित हुए बिना आगे बढ़ते रहे। सुना है कि मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने खुद यह कहकर कि-भाखरेजी के लिए कुछ करना है-उन्हें दीनदयाल शोध पीठ का अध्यक्ष बनाया। महज ऑबलाइज करने के लिहाज से सरकार ने तीन-चार शोध-पीठ जरूर बनाई हैं लेकिन उसे सुशोभित कर रहे महानुभावों ने अपनी आत्मकथा लिखने के सिवाय कुछ नहीं किया मगर भाखरेजी इनसे जुदा थे।

वैचारिक प्रतिबद्धता कह लें या एक पत्रकार का समाज को कुछ देकर जाने का जुनून, दीनदयाल उपाध्याय शोधपीठ में रहकर जितना संभव हो सका, भाखरे जी ने किया। स्वामी विवेकानंद शाद्र्धशती समारोह हो या दीनदयाल उपाध्याय की जयंती, उन्होंने दोनों ही आंदोलनों की कमान संभाले रखी और उसे सार्थक मुकाम तक पहुंचाया। स्वेदशी मेला और स्वदेशी भवन जैसी बुलंद इबारतें, उन्हीं की प्रयोगधर्मिता का परिणाम हैं। दिनकर कभी मरा नहीं करते। भाखरेजी ने आदर्श जीवन जीने की जो पगडंडी हमें दिखाई है, वह अमूल्य धरोहर है, सुपुत्र दिगिवजय के अंश में वे हमारे बीच हमेशा बने रहेंगे। विनम्र श्रद्धाँजलि..!

अनिल द्विवेदी
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार तथा रिसर्च स्कॉलर हैं)
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Saturday, September 19, 2015

देश पहचान गया मगर आप नहीं


संदर्भ : राहुल गांधी और लालू प्रसाद यादव का यह सवाल कि आरएसएस में महिलाओं को तवज्जो क्यों नही मिल रही?

अजब संयोग कह लीजिए कि जिस दिन बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और भारतीय राजनीति के स्थायी व्यँगय बन चुके लालू प्रसाद यादव, आरएसएस में महिला सरसंघचालक अब तक ना होने का मुद्दा उठा रहे थे, ठीक उसी दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बैनरतले आयोजित अखिल भारतीय कार्यशाला का समापन हो रहा था। जयपुर में दो दिनों तक चले इस वैचारिक कुंभ का विषय स्त्री और भारतीय समाज था। देशभर से पहुंचे विद्वान लेखक, स्तंभकार, पत्रकार और संपादक-जिनमें अधिकांश महिलाएं थी-ने भारतीय महिला के गौरवशाली इतिहास, सामाजिक, आर्थिक और परिवारिक व्यवस्था में महिला का योगदान, प्रगतिशील आंदोलनों और समानता का अधिकार जैसे विषयों पर विशेषज्ञों ने मन और दिमाग की खिडक़ी खोलकर चर्चा की तथा इस नतीजे पर पहुंचे कि देश की महिलाओं को ना सिर्फ सम्मानजनक समानता का अधिकार मिलना चाहिए बल्कि परिवार और समाज की केन्द्रीय इकाई होने के नाते, गरीब और पिछड़ी महिलाओं को जल्द से जल्द आरक्षण दिए जाने में बुराई क्या है?

लालू यादव ने यह सवाल अकेले उठाया हो, ऐसा नही है। कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी से लेकर पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम और छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता ने भी यही सवाल खड़ा किया है कि आरएसएस में महिलाओं के लिए कोई स्थान नही है! पूरी कांग्रेस पार्टी वैचारिक तौर पर किस कदर खोखली हो चुकी है, इसकी गवाही यह सवाल दे रहा है। वर्ना किसी पार्टी के युवराज या प्रवक्ता को प्रोफेशनली ही सही, अपने वैचारिक प्रतिद्वंद्वी के सांगठनिक ढाँचे की ठीक-ठाक समझ तो होनी ही चाहिए। लेकिन लालू और कांग्रेस प्रवक्ता ने बयानों के जो कोड़े आरएसएस पर फटकारे हैं, वे उन्हीं की पीठ पर जा चिपके हैं। जिस पार्टी की महिला कार्यकर्ता शारीरिक शोषण का शिकार या तंदूर में भून दी जाती हों, उन्हें यह सवाल उठाते वक्त चुल्लू भर पानी भी अपने पास रखना था। फिल्म अभिनेत्री नगमा जैसी महिला कांग्रेस कार्यकर्ताओं का दर्द भी किसी से छुपा नही है।

पहले यह समझ लें कि आरएसएस कांग्रेस नही है और ना ही राष्ट्रीय जनता दल, जहां लोकतांत्रिक ढंग से पूछे गए सवाल, तानाशाही या चापलूसी के मकडज़ाल में दम तोड़ देते हैं। गुलाबी नगरी जयपुर में स्त्री को केन्द्र में रखकर आयोजित संगोष्ठी में सरसंघचालक मोहन भागवत जी ने एक महिला विद्वान के सवाल के जवाब में कहा : हिन्दु समाज को संगठित करने के उद्देश्य के साथ, अपनी शक्ति और सामथ्र्य को नापते हुए जिस दौर में आरएसएस ने जन्म लिया, उस समय महिलाओं के संगठन की उतनी जरूरत महसूस नहीं हुई लेकिन सालों बाद जब आवश्यकता लगी तो संघ ने राष्ट्र सेविका समिति (आरएसएस) रूपी समानांतर महिला संगठन की शुरूआत सन् 1936 में महाराष्ट्र के वर्धा में की गई। श्री भागवत के अनुसार पहले महिलाओं को सीधे आरएसएस का हिस्सा बनाने पर सहमति हुई मगर महिलाओं को पुरूषों की बराबरी से आगे बढ़ाने का अवसर देने के उद्देश्य से समिति का निर्माण हुआ जिसमें प्रमुख संचालिका का पद (वर्तमान में वं. शांतक्का) सर्वोच्च है। इस संगठन से जुडक़र हजारों महिलाएं देश, समाज और परिवार को संवारने में लगी हुई हैं।

जानना जरूरी है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 35 से ज्यादा संगठन समाज जीवन में सक्रिय हैं जिनके माध्यम से हजारों महिलाएं जुडक़र समाज और देशसेवा में जुटी हुई हैं। विशेषतौर पर भाजपा, एबीवीपी, मजदूर संघ, सेवा भारती और विद्या भारती में महिलाओं का खासा प्रतिनिधित्व देखा जा सकता है। भाजपा ने जब अपने सांगठनिक ढांचे में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने की ओर कदम बढ़ाए तो आरएसएस ने दिल खोलकर स्वागत किया था।

दूसरी ओर संघ-प्रमुख मोहन भागवत जी के उत्तर से जो प्रेत-सवाल निकला है, वह लालू यादव सहित कांग्रेस या दूसरे अन्य राजनीतिक दलों के लिए ना सिर्फ आईना की तरह है बल्कि अन्य सामाजिक और सांस्कृतिक संगठनों को खुद में झांकने को विवश करता है। यहां ठहरकर यह सोचना गलत ना होगा कि देश के प्रमुख राजनीतिक दलों द्वारा महिलाओं को समान अधिकार दिलाने के दावे कितने भी किए जाते रहे हों लेकिन ईमानदारी से कहें तो क्या महिलाएं पुरूषों के वर्चस्व को तोडऩे में सफल हो पाई हैं? हाल यह है कि कई राजनीतिक दलों में अपना वाजिब स्थान पाने के लिए उन्हें अभी भी पुरूषों की कृपा पर निर्भर रहना पड़ता है। कांग्रेस को छोड़ दीजिए तो समाजवादी पार्टी या राजद में और भी बुरी स्थिति है जहां महिला आरक्षण के सवाल पर ही औचित्य खड़े किए जाते रहे हैं और जिनके चलते महिला आरक्षण बिल आज तक संसद से पारित नहीं हो सका।

बिना किसी जिरहबख्त के कांग्रेस से ज्यादा लालू यादव के सवाल में थोड़ी गंभीरता नजर आती है। वे लालू ही थे जिन्होंने चारा घोटाले के फेर में खुद के जेल जाने पर अपनी पत्नी राबड़ी देवी को चौके-चूल्हे से उठाकर सीधे मुख्यमंत्री की कुर्सी पर ला बिठाया था। कहना गलत ना होगा कि लगभग बीस साल पहले हुई यह पहल पुरूषों के वर्चस्व वाले समाज में महिलाओं के लिए एक उम्मीदभरी, सम्मानजनक शुरूआत थी लेकिन लालू ना भूलें कि उनकी पार्टी के अडिय़ल रवैये के चलते ही महिला आरक्षण बिल संसद में अब तक पेश नही हो सका है। स्पष्ट है कि लालू महिलाओं के सम्मान के मुद्दे पर अपनी राजनीतिक रोटी सेंक रहे हैं क्योंकि अगले महीने होने जा रहे बिहार विधानसभा चुनाव में उन्हें करो या मरो जैसी चुनौती से जूझना पड़ रहा है।

शायद कांग्रेस के नेता इस लोकोक्ति पर यकीन रखते हैं कि एक झूठ को सौ बार बोलो तो वह सच लगने लगता है मगर उन्हें याद होना चाहिए कि संघ के बारे में ऐसा ही एक झूठ गांधी-हत्या को लेकर कांग्रेस के नेता आजादी के समय से दुष्प्रचारित करते आए हैं लेकिन देश ने कभी उस पर भरोसा नही जताया उल्टा अर्जुन सिंह जैसे दिवंगत कांग्रेस नेता को इस आरोप के लिए माफी मांगनी पड़ी थी। अबकि बार कांग्रेस ने बड़प्पन का जो फतवा जारी किया है, वह उसी के लिए आईना बन चुका है।

अनिल द्विवेदी
(लेखक रिसर्च स्कॉलर और अतिथि प्राध्यापक हैं)
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इस आरएसएस को नही पहचानते आप


संदर्भ : राहुल गांधी और लालू प्रसाद यादव का यह सवाल कि आरएसएस में महिलाओं को तवज्जो क्यों नही मिल रही?

अजब संयोग कह लीजिए कि जिस दिन बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और भारतीय राजनीति के स्थायी व्यँगय बन चुके लालू प्रसाद यादव, आरएसएस में महिला सरसंघचालक अब तक ना होने का मुद्दा उठा रहे थे, ठीक उसी दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बैनरतले आयोजित अखिल भारतीय कार्यशाला का समापन हो रहा था। जयपुर में दो दिनों तक चले इस वैचारिक कुंभ का विषय स्त्री और भारतीय समाज था। देशभर से पहुंचे विद्वान लेखक, स्तंभकार, पत्रकार और संपादक-जिनमें अधिकांश महिलाएं थी-ने भारतीय महिला के गौरवशाली इतिहास, सामाजिक, आर्थिक और परिवारिक व्यवस्था में महिला का योगदान, प्रगतिशील आंदोलनों और समानता का अधिकार जैसे विषयों पर विशेषज्ञों ने मन और दिमाग की खिडक़ी खोलकर चर्चा की तथा इस नतीजे पर पहुंचे कि देश की महिलाओं को ना सिर्फ सम्मानजनक समानता का अधिकार मिलना चाहिए बल्कि परिवार और समाज की केन्द्रीय इकाई होने के नाते, गरीब और पिछड़ी महिलाओं को जल्द से जल्द आरक्षण दिए जाने में बुराई क्या है?

लालू यादव ने यह सवाल अकेले उठाया हो, ऐसा नही है। कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी से लेकर पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम और छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता ने भी यही सवाल खड़ा किया है कि आरएसएस में महिलाओं के लिए कोई स्थान नही है! पूरी कांग्रेस पार्टी वैचारिक तौर पर किस कदर खोखली हो चुकी है, इसकी गवाही यह सवाल दे रहा है। वर्ना किसी पार्टी के युवराज या प्रवक्ता को प्रोफेशनली ही सही, अपने वैचारिक प्रतिद्वंद्वी के सांगठनिक ढाँचे की ठीक-ठाक समझ तो होनी ही चाहिए। लेकिन लालू और कांग्रेस प्रवक्ता ने बयानों के जो कोड़े आरएसएस पर फटकारे हैं, वे उन्हीं की पीठ पर जा चिपके हैं। जिस पार्टी की महिला कार्यकर्ता शारीरिक शोषण का शिकार या तंदूर में भून दी जाती हों, उन्हें यह सवाल उठाते वक्त चुल्लू भर पानी भी अपने पास रखना था। फिल्म अभिनेत्री नगमा जैसी महिला कांग्रेस कार्यकर्ताओं का दर्द भी किसी से छुपा नही है।

पहले यह समझ लें कि आरएसएस कांग्रेस नही है और ना ही राष्ट्रीय जनता दल, जहां लोकतांत्रिक ढंग से पूछे गए सवाल, तानाशाही या चापलूसी के मकडज़ाल में दम तोड़ देते हैं। गुलाबी नगरी जयपुर में स्त्री को केन्द्र में रखकर आयोजित संगोष्ठी में सरसंघचालक मोहन भागवत जी ने एक महिला विद्वान के सवाल के जवाब में कहा : हिन्दु समाज को संगठित करने के उद्देश्य के साथ, अपनी शक्ति और सामथ्र्य को नापते हुए जिस दौर में आरएसएस ने जन्म लिया, उस समय महिलाओं के संगठन की उतनी जरूरत महसूस नहीं हुई लेकिन सालों बाद जब आवश्यकता लगी तो संघ ने राष्ट्र सेविका समिति (आरएसएस) रूपी समानांतर महिला संगठन की शुरूआत सन् 1936 में महाराष्ट्र के वर्धा में की गई। श्री भागवत के अनुसार पहले महिलाओं को सीधे आरएसएस का हिस्सा बनाने पर सहमति हुई मगर महिलाओं को पुरूषों की बराबरी से आगे बढ़ाने का अवसर देने के उद्देश्य से समिति का निर्माण हुआ जिसमें प्रमुख संचालिका का पद (वर्तमान में वं. शांतक्का) सर्वोच्च है। इस संगठन से जुडक़र हजारों महिलाएं देश, समाज और परिवार को संवारने में लगी हुई हैं।

जानना जरूरी है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 35 से ज्यादा संगठन समाज जीवन में सक्रिय हैं जिनके माध्यम से हजारों महिलाएं जुडक़र समाज और देशसेवा में जुटी हुई हैं। विशेषतौर पर भाजपा, एबीवीपी, मजदूर संघ, सेवा भारती और विद्या भारती में महिलाओं का खासा प्रतिनिधित्व देखा जा सकता है। भाजपा ने जब अपने सांगठनिक ढांचे में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने की ओर कदम बढ़ाए तो आरएसएस ने दिल खोलकर स्वागत किया था। दूसरी ओर संघ-प्रमुख मोहन भागवत जी के उत्तर से जो प्रेत-सवाल निकला है, वह लालू यादव सहित कांग्रेस या दूसरे अन्य राजनीतिक दलों के लिए ना सिर्फ आईना की तरह है बल्कि अन्य सामाजिक और सांस्कृतिक संगठनों को खुद में झांकने को विवश करता है। यहां ठहरकर यह सोचना गलत ना होगा कि देश के प्रमुख राजनीतिक दलों द्वारा महिलाओं को समान अधिकार दिलाने के दावे कितने भी किए जाते रहे हों लेकिन ईमानदारी से कहें तो क्या महिलाएं पुरूषों के वर्चस्व को तोडऩे में सफल हो पाई हैं? हाल यह है कि कई राजनीतिक दलों में अपना वाजिब स्थान पाने के लिए उन्हें अभी भी पुरूषों की कृपा पर निर्भर रहना पड़ता है। कांग्रेस को छोड़ दीजिए तो समाजवादी पार्टी या राजद में और भी बुरी स्थिति है जहां महिला आरक्षण के सवाल पर ही औचित्य खड़े किए जाते रहे हैं और जिनके चलते महिला आरक्षण बिल आज तक संसद से पारित नहीं हो सका।
बिना किसी जिरहबख्त के कांग्रेस से ज्यादा लालू यादव के सवाल में थोड़ी गंभीरता नजर आती है। वे लालू ही थे जिन्होंने चारा घोटाले के फेर में खुद के जेल जाने पर अपनी पत्नी राबड़ी देवी को चौके-चूल्हे से उठाकर सीधे मुख्यमंत्री की कुर्सी पर ला बिठाया था। कहना गलत ना होगा कि लगभग बीस साल पहले हुई यह पहल पुरूषों के वर्चस्व वाले समाज में महिलाओं के लिए एक उम्मीदभरी, सम्मानजनक शुरूआत थी लेकिन लालू ना भूलें कि उनकी पार्टी के अडिय़ल रवैये के चलते ही महिला आरक्षण बिल संसद में अब तक पेश नही हो सका है। स्पष्ट है कि लालू महिलाओं के सम्मान के मुद्दे पर अपनी राजनीतिक रोटी सेंक रहे हैं क्योंकि अगले महीने होने जा रहे बिहार विधानसभा चुनाव में उन्हें करो या मरो जैसी चुनौती से जूझना पड़ रहा है।

शायद कांग्रेस के नेता इस लोकोक्ति पर यकीन रखते हैं कि एक झूठ को सौ बार बोलो तो वह सच लगने लगता है मगर उन्हें याद होना चाहिए कि संघ के बारे में ऐसा ही एक झूठ गांधी-हत्या को लेकर कांग्रेस के नेता आजादी के समय से दुष्प्रचारित करते आए हैं लेकिन देश ने कभी उस पर भरोसा नही जताया उल्टा अर्जुन सिंह जैसे दिवंगत कांग्रेस नेता को इस आरोप के लिए माफी मांगनी पड़ी थी। अबकि बार कांग्रेस ने बड़प्पन का जो फतवा जारी किया है, वह उसी के लिए आईना बन चुका है।

अनिल द्विवेदी
(लेखक रिसर्च स्कॉलर और अतिथि प्राध्यापक हैं)
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Wednesday, July 15, 2015

नए अवतार में धरम लाल कौशिक

!! छत्तीसगढ़ : भाजपा !!

सरकार के चिकने-चुपड़े पैरोकार भले ही इसका खंडन करें, मगर धीरे-धीरे ही सही, धरम लाल कौशिक ने प्रदेश भाजपा में अपनी जड़ें इस कदर जमा ली हैं कि पार्टी उन्हें वैकल्पिक चेहरे के तौर पर देख रही है। लाल बत्ती बांटने में श्री कौशिक ने अपने पॉवर का पूरा सदुपयोग किया और चार समर्थकों को सूची में एडजस्ट करा दिया। हालांकि सांसद रमेश बैस, सरोज पाण्डे, रामविचार नेताम, केदार कश्यप और बृजमोहन अग्रवाल जैसे वरिष्ठ विश्वसनीय चेहरों को पछाडऩा कौशिक के लिए बड़ी चुनौती होगी जो तीव्र और लपलपाती इच्छा के साथ मुख्यमंत्री बनने का सपना संजोए बैठे हैं।
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प्रदेश भाजपा की राजनीति दिन-प्रतिदिन करवटें बदल रही है। अंदरखाने से निकलकर आई ताजा खबर यह है कि प्रदेश भाजपा अध्यक्ष श्री धरम लाल कौशिक, संगठन और सरकार के बीच एक नई ताकत बनकर उभरे हैं। इसके संकेत ताजा मंत्रिमण्डल विस्तार से मिले हैं। सूत्रों के मुताबिक श्री कौशिक की सलाह पर मुख्यमंत्री ने चार चेहरों को लालबत्ती से नवाजा है। इनमें से दो चेहरे ऐसे हैं जिन्हें मुख्यमंत्री ना तो मंत्री बनाने के इच्छुक थे और ना ही कोई निगम-मण्डल पकड़ाना चाहते थे लेकिन ऐनवक्त पर कौशिक के प्रभावी हस्तक्षेप ने इन नेताओं का बेड़ापार करवा ही दिया। बाकी दो को भी प्रदेश भाजपा के मुखिया का आर्शीवाद मिला है।

सबसे ज्यादा पेंच विधायक युद्धवीर सिंह जूदेव को लेकर था। जशपुर जिला में जूदेव परिवार का खासा दबदबा और समर्थन है। स्व. दिलीप सिंह जूदेव ने जनता का जो विश्वास हासिल किया था, उसी का प्रतिफल है कि आज युद्धवीर दूसरी बार विधायक बने हैं। बतौर संसदीय सचिव उनका कार्यकाल सराहनीय रहा था। इस बार जूदेव मंत्री बनना चाहते थे लेकिन मुख्यमंत्री की नापसंदगी के चलते उनका सपना अधूरा ही रह गया मगर  कौशिक की कृपा के बाद वे आबकारी निगम के चेयरमैन तक पहुँच ही गए। दरअसल छोटे जूदेव के कार्यकलापों को लेकर सरकार, संघ और संगठन का एक धड़ा हमेशा चिंतित रहता आया है। कई नेताओं ने इसकी शिकायत ना सिर्फ मुख्यमंत्री से की बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी संदेश भेजा जा चुका है कि जूदेव को लाल बत्ती देना खतरे से खाली नहीं।

सब तरफ से निराशा हाथ लगने के बाद अंतत: छोटे जूदेव ने प्रदेश भाजपा अध्यक्ष धरम लाल कौशिक का दामन थामा जिसके बाद कौशिक ने संगठन महामंत्री राम प्रताप सिंह को मनाया और दोनों ने मिलकर मुख्यमंत्री से युद्धवीर को निगम-मण्डल में एडजस्ट करने की सिफारिश कर दी। मुख्यमंत्री सचिवालय के मुताबिक मंत्री ना बनने से गुस्साये युद्धवीर के समर्थकों ने जशपुर बंद रखते हुए डॉ. रमनसिंह का पुतला फूँका था जिससे पार्टी और संगठन के बड़े नेताओं के कान खड़े हो गए थे मगर जैसा कि भाजपा अनुशासन के मामले में बेहद सख्त मानी जाती है सो युद्धवीर को कड़ा संदेश भिजवा दिया गया। इसके बाद छोटे जूदेव कई दिनों तक डैमेज कंट्रोल में लगे रहे।

प्रदेश भाजपा अध्यक्ष का आर्शीवाद पाने वालों में एक नाम भूपेन्द्र सवन्नी का है। भाजपा के महामंत्री रह चुके सवन्नी, कौशिक के दाएं हाथ माने जाते हैं। दूसरा वे जिस सिख समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं, वह भाजपा का तगड़ा वोटबैंक भी है। सवन्नी एक तरफ कौशिक के सिपहसालार बने रहे तो दूसरी ओर बतौर महामंत्री, संगठनमंत्री रामप्रताप सिंह का विश्वास भी हासिल करते रहे। दोनों की नजदीकी का ही सिला रहा कि उन्हें हाऊसिंग बोर्ड जैसे कमाऊ विभाग की जिम्मेदारी दी गई है।

खादी ग्रामोद्योग बोर्ड के अध्यक्ष कृष्णा रॉय भी प्रदेश भाजपा अध्यक्ष धरम लाल कौशिक का आर्शीवाद लेने में सफल रहे। इसके पीछे पूर्व में पर्यटन मण्डल और फिर हस्तशिल्प बोर्ड के अध्यक्ष के तौर पर श्री रॉय का पिछला कार्यकाल बेदाग रहा था जिसके चलते उन्होंने मुख्यमंत्री का आर्शीवाद हासिल किया मगर श्री कौशिक ने इस बार रॉय का नाम खुद होकर आगे बढ़ाया नतीजन श्री राय, खादी तथा ग्रामोद्योग बोर्ड का पद हासिल करने में सफल रहे।

पहले विधायक और फिर राजधानी का महापौर बनते-बनते रह गए पार्टी के युवा नेता संजय श्रीवास्तव की सिफारिश भी प्रदेश भाजपा अध्यक्ष ने ही की। दरअसल युवा मोर्चा का अध्यक्ष रहते हुए श्रीवास्तव ने श्री कौशिक की मदद संगठन को तराशने में की थी। बतौर सभापति उनका कार्यकाल भी बेदाग और परिणामदायी रहा था। दूसरी ओर जातीय समीकरण के हिसाब से वे फिट बैठ रहे थे। पहले विधायक, फिर महापौर की टिकट से वंचित रहने वाले संजय श्रीवास्तव को निगम-मण्डल सौंपने का मन खुद मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने बना लिया था लेकिन प्रदेश भाजपा अध्यक्ष श्री कौशिक ने भी उन्हें गहरा समर्थन दे दिया। संभवत: इन्हीं समीकरणों के चलते श्रीवास्तव को रायपुर विकास प्राधिकरण जैसे विभाग की जिम्मेदारी मिली है।

तो साफ है कि श्री कौशिक अपनी आवश्यकता सिद्ध करते जा रहे हैं। इस पूरी कहानी का लब्बोलुआब यही है कि प्रदेश भाजपा अध्यक्ष धरम लाल कौशिक, संगठन और सरकार में एक ऐसे शिखर पुरूष के तौर पर उभरे हैं जो उदार आईने में फिट हैं तथा पार्टी के लिए विकल्प के तौर पर देखे जा रहे हैं। थोड़ा साफ करेंं तो उनके समर्थक उनमें मुख्यमंत्री पद का चेहरा भी नजर पाते हैं। हालांकि अपनी अदाभरी शालीन चुप्पी के साथ कौशिक इसे महज मीडिया का आंकलन करार देते हैं लेकिन सच यह है कि भविष्य में यदि मुख्यमंत्री पद के विकल्पों की तलाश पार्टी करती है तो जातीय समीकरण के हिसाब से कौशिक इस पर फिट बैठते हैं। हालांकि उनके समक्ष रमेश बैस, सरोज पाण्डे, नंद कुमार साय, रामविचार नेताम और केदार कश्यप जैसे वरिष्ठ विश्वसनीय चेहरे को पछाडऩा बड़ी चुनौती होगी जो तीव्र और लपलपाती इच्छा के साथ मुख्यमंत्री बनने का सपना संजोए बैठे हैं।

अनिल द्विवेदी
लेखक राजनीतिक समीक्षक हैं

Saturday, May 16, 2015

यहां लिबास की कीमत है, आदमी की नहीं

II संदर्भ : आइएएस अमित कटारिया का डेे्रस कोड विवाद II

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की बस्तर-यात्रा के दौरान दो बड़े हादसे हुए। एक तो रायपुर में जो उनकी सभा होनी थी, उसका मंच बनते-बनते धराशायी हो गया जिसमें एक काल-कलवित हो गया और बाकी अभी अस्पताल में ईलाज करवा रहे हैं। दूसरा 'हादसा' यह रहा कि प्रधानमंत्री के समक्ष आइएएस अमित कटारिया पैंट, शर्ट और चश्मे के साथ मुखातिब हुए जिस पर प्रधानमंत्री ने कुछ टिप्पणी की और उसके बाद यह बहस आग पकड़ चुकी है कि एक आइएएस को वीआईपी के समक्ष किस कदर पेश होना चाहिए? अफसोस कि घटना के एक सप्ताह बाद भी हम उस गले की पकड़ से दूर हैं जो पंडाल के गिरने, उससे हुई मौतें या दर्जनों घायलों की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार है लेकिन प्रधानमंत्री के समक्ष काला चश्मा लगाकर खड़े होने वाले आइएएस का गला नापने के लिए कई तैयार खड़े हैं। 

स्कूल में बच्चों-टीचर के लिए ड्रेस कोड है, सेना में अफसर-सैनिकों के लिए है। न्यायालय में न्यायाधीश-वकीलों के लिए है। पुलिस में सभी के लिए है। अस्पताल में है I कार्पोरेट हाऊजेस में भी ड्रेस कोड लागू है। वहां पर सिवाय शनिवार के बाकी दिन आपको पेंट, शर्ट और टाई में दिखना होगा। इसी तरह प्रशासन में भी ड्रेस की आचार संहिता है। प्रशिक्षु आइएएस जब प्रशिक्षण ले रहे होते हैं तभी से इसकी आदत डाल दी जाती है। इसके पीछे का एक मकसद समानता और अनुशासन का भाव स्थापित करना है। यहां तक कि बतौर आइएएस यदि आप न्यायाधीश के समक्ष हाजिर हो रहे हैं तो ड्रेस कोड जरूरी हो जाता है और ऐसी चूकें करने वालों को अदालतों ने फटकार भी लगाई है। 

और ऐसा सिर्फ भारत में ही नहीं है। हमने देखा हैकि अमरीकी राष्ट्रपति से लेकर दुनियाभर के प्रधानमंत्री के साथ जो अफसर होते हैं, ड्रेस कोड में ही झलकते हैं। 1984 में रोनाल्ड रीगन जब अमरीका के राष्ट्रपति थे तो उनकी सुरक्षा में लगे एक अफसर को ऐनवक्त पर हवाईजहाज में चढ़ने से रोक दिया गया था क्योंकि उसके सूटकेश का रंग सुरक्षा जांच से मेल नहीं खाता था। प्रधानमंत्री मोदी जब बस्तर पहुंचे तो मुख्य सचिव से लेकर सीएम के सचिव अमन सिंह, अपर मुख्य सचिव बैजेन्द्र कुमार तथा पुलिस महानिदेशक तक सभी ड्रेस कोड में थे। तस्वीर देखने से स्पष्ट है कि खुद मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने जैकेट और सफेद कुर्ता-पायजामा (नेताओं का ड्रेस कोड) पहनकर, प्रधानमंत्री मोदी का स्वागत किया; खुद प्रधानमंत्री जी ड्रेस कोड को लेकर गंभीर रहते दीखते आये हैं।

याद कीजिये उस वाकये को जब मोदी सरकार के केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर एक सरकारी आयोजन में जींस टी शर्ट्स पहनकर पहुंचे थे जिसे पीएम ने उचित नहीं माना था। उसके बाद जावड़ेकर वापस गए और जीन्स के ऊपर ब्लेज़र डालकर आये थे। हांलांकि इसकी पुष्टि नहीं हो सकी थी लेकिन संकेत साफ़ हैं कि कुछ जगहों पर ड्रेस कोड अनिवारयतः लागू होना चाहिए। लेकिन कटारिया जो कि उस जिले के कलेक्टर यानि प्रशासन के मुखिया थे, ने इसे संभवत: हल्के में लिया। उन्होंने पीएम मोदी का स्वागत पैंट, शर्ट और आंखों में चश्मा डालकर किया इसलिए पहली नजर में वे ड्रेस की आचार संहिता का अपमान करने के दोषी तो दिखते ही हैं। 

मगर सिर्फ कटारिया ही क्यों, छत्तीसगढ़ में ड्रेस कोड की धज्जियां तो कई बार उड़ाई गई हैं और वो भी मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के सामने। एक आइएएस राजनेताओं की तरह व्यवहार करने लगे, यह किस आचार संहिता में लिखा है? महीनों पूर्व सिविल लाइंस स्थित सर्किट हाऊस में मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह एक सरकारी योजना का लोकार्पण करने पहुंचे थे तब तत्कालीन अपर मुख्य सचिव स्तर के वरिष्ठ आइएएस अफसर ने जींस के ऊपर कुर्ता ओढ़ रखा था। संयोग देखिए कि खुद मुख्यमंत्री भी कुर्ता और जैकेट में थे तब मैंने मजाकिया अंदाज में अफसर से पूछा था कि आज तो ड्रेस कोड से अलग दिख रहे हैं तब उन्होंने हंसते हुए इसे टाल दिया था। राज्य में ड्रेस कोड की धज्जियां अफसरों के इस कदर उड़ाई हैं कि ब्लेज़र की जगह अब नेहरू जैकेट ने ले ली है। 

बात साफ है कि यदि प्रधानमंत्री के समक्ष कोई आइएएस पैंट, शर्ट या चश्मा पहनकर आने पर अनुशासनहीनता का दोषी हो सकता है तो मुख्यमंत्री के समक्ष जींस-कुर्ता पहने और चश्मा लगाकर खड़ा होना कैसे स्वीकार्य हो सकता है? लेकिन यह सब इसलिए चल रहा है या नजरअंदाज किया जा रहा है क्योंकि मखमली दिल वाले मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने आंखें तरेरने का स्वभाव कभी रखा ही नहीं। 
बहस-मुबाहिसों के बीच फेसबुक पर वरिष्ठ पत्रकार बरूणा सखाजी की  टिप्पणी पढ़ने को मिली कि हमें स्मार्ट सिटी और स्मार्ट फोन तो चाहिए मगर स्मार्ट अफसर नहीं। आइएएस अमित कटारिया उन चुनिंदा अफसरों में शुमार हैं जिन्होंने अपने कार्य-व्यवहार से लोगों का दिल इस कदर जीता है कि रायपुर से जब उनका स्थानांतरण हुआ था तो इसके खिलाफ सैकड़ों लोग सड़कों पर उतर आए थे और हस्ताक्षर अभियान चलाया था। वे अकेले अफसर होंगे जो सेलेरी के तौर पर मात्र एक रूपया लेते रहे हैं। यह भी सच है कि प्रधानमंत्री के समक्ष यूं पेश होना, घण्टों तक उमसभरी तीखी धूप से बचने की एक कवायद भर रही होगी लेकिन यहां सवाल ड्रेस कोड की एकरूपता के साथ-साथ नियम और अनुशासन में बने रहने तथा प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति का सम्मान ज्यादा अहम है। 

गुजरे साल तत्कालीन केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री जयराम रमेश एक विश्वविद्यालय में थे जहां उन्हें बतौर मुख्य अतिथि स्नातक छात्रों को डिग्रियां बांटनी थी और अचानक उन्होंने अपने शरीर ओढ़ा लबादा उतारकर फेंक दिया था। उनका तर्क था कि अंग्रेजों की दी हुई यह परम्परा हम कब तक ढोएंगे? संभवत: कटारिया ने भी एक नया संदेश देने की कोशिश की है जिसे स्वीकार करने की दरियादिली हमें दिखानी होगी। 

अनिल द्विवेदी 
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं 

Tuesday, May 5, 2015

पानी दे मौला, शराब नहीं


मुद्दा : आइपीएल क्रिकेट मैचों में वीआईपीज को शराब परोसने का. 

II गंगा स्नान II

"ये अक्ल वाले नही अहले दिल समझते हैं, क्यों शराब से पहले वुजू जरुरी है"

राज्य सरकार में ईमानदार मंत्री के रूप में ख्यात मगर इस बार विधायक का चुनाव हार चुके एक वरिष्ठ भाजपा नेता ने फोन किया और एक ही सांस में बहुत कुछ खरी-खोटी सुनाते चले गए। कहा कि आप लोग ना जाने किस-किस मुद्दे पर कलम चलाते हैं मगर जब ेेजनहित की बात हो तो स्याही क्यों सूख जाती है? वे मुझे सुनाते रहे और मैं सुनते हुए, सम्मान देते हुए मुस्कुराता रहा। प्यारभरी डांट में लिपटी मुद्दे की बात यह रही कि श्रीमान को यह गंवारा नहीं था कि जिस राज्य में आंशिक शराबबंदी हो, वहां सरकार के नियम-कायदों को अंगूठा दिखाते हुए आगामी 9 और 12 मई को होने वाले आइपीएल मैचों में वीआईपीज को या कार्पोरेट लॉबी में कंपनियों की ओर से शराब परोसी जाए।

नेताजी यही नहीं रूके बल्कि अपनी विवशता समझाते हुए बोले, क्या हो गया है पार्टी और सरकार के सिद्धातों को या फिर आरएसएस के कर्णधारों को जिन्होंने कभी शराबबंदी लागू करने का प्रस्ताव सरकार के समक्ष रखा था, आज वे ऐसे खामोश हैं मानो शराब ना हुई, दूध की नदियां बहने वाली हैं। वे यहीं नहीं रूके। बोले, चलो हमारी तो मजबूरी है कि अपनी ही सरकार में रहकर अपनों के खिलाफ कौन बोले या लड़े? लेकिन मीडिया किस दबाव में है जो इस कुप्रथा का विरोध तक नहीं कर सकता। चूंकि मुद्दा वाकई सरकार की नीतियों को ठेंगा दिखाने और जनहित के स्वास्थ्य से जुड़ा है इसलिए मैंने नेताजी से सिर्फ इतना ही कहा कि कल का अखबार देख लीजिएगा।

अब वादा किया है तो निभाना पड़ेगा ही। इसमें दो राय नही है कि मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह देश के उन चुनिंदा मुख्यमंत्रियों में शुमार हैं जिन्होंने यह जानते हुए भी कि प्रदेश के राजस्व का लगभग 20 प्रतिशत खजाना शराब बिक्री से आता है--ने बड़े साहस के साथ फैसला लेते हुए शराबबंदी की ओर कदम बढ़ाए। खासकर महिलाओं की व्यथा और दशा को समझते हुए उन्होंने यह कानून भी बना डाला कि जिस इलाके की 55 प्रतिशत महिलाएं शराबभट्टी का विरोध करेंगी, वहां से वह दुकान हटा दी जाएगी। आब.ए.आईना यह है कि राज्य में कोई 300 से अधिक शराब दुकानें बंद हो चुकी हैं। गुजरे दिनों महिलाओं के लम्बे विरोध के बाद राजधानी से लगे कुम्हारी इलाके में एक शराबभट्टी में ताला लग गया था।

फिलवक्त बड़ा और गहरा सवाल यह है कि क्या आइपीएल क्रिकेट मैचों का आयोजन हमारे लिए इतना ज्यादा प्रतिष्ठा का विषय बन गया है कि उसके लिए सारे नियम-कानूनों को धता बता दिया जाये? माना कि इसके आयोजन से छत्तीसगढ़ का नाम देश-दुनिया में गूंजता है। या एक बड़ा लालच यह भी है कि देश के कार्पोरेट जगत की निगाहें छत्तीसगढ़ की ओर दौड़ पड़ती हैं? लेकिन किसकी, कितनी कीमत चुकायेंगे, इसकी सीमा तो तय होनी ही चाहिए।

एनएसयूआई के नेता संजीव शुक्ला ने बड़ा सवाल खड़ा किया कि आज आईपीएल आयोजित करने वाली कंपनी जीएमआर ने छूट मांगी है, कल से राजधानी में कुकुरमुत्तों की तरह इवेंट आयोजित कर रही कंपनियां या फाइव स्टार हॉटल्स चाहेंगे कि उन्हें पार्टी या इवेंट्स में शराब परोसने की इजाजत दी जाए, तब कलेक्टर साहब के पास क्या जवाब होगा? वैसे भी कलेक्टर ने शराब परोसने की अनुमति किस आधार पर दी? उनसे अनुमति ली भी गई या नहीं, इन सारे प्रश्नों का जवाब जल्द तलाशना होगा। साफ है कि सरकार या अफसरशाही शराब लॉबी की गिरफ्त में है जो खुलेआम सरकारी पॉलिसी की धज्जियां उड़ते देखना चाहती है!

पिछली बार भी आईपीएल कराने वाली कंपनी को राज्य सरकार ने मनोरंजन टैक्स से छूट दे दी थी लेकिन यह नुकसान इसलिए मंजूर था क्योंकि बड़े फायदों के लिए छोटे नुकसान झेलने ही पड़ते हैं परंतु इस बार सवाल धन जाने का नहीं है बल्कि चरित्र खोने का है। आशय साफ है कि आईपीएल मैंचों की कार्पोरेट लॉबी में शराब परोसकर जिस तरह सरकार के नियम-नीतियों की धज्जियां उड़ेंगी, उससे तो यही संकेत मिलता है। और फिर ऐसा क्यों लग रहा है कि आप करो तो रामलीला और हम करें तो रासलीला। एक तरफ कंपनी धूप और पसीने से सूखते कंठ को तर करने को बैचेन सामान्य दर्शक से पानी की बॉटल तक छीन लेना चाहती है तो दूसरी ओर 20 हजार की टिकट खरीदने वाले एयरकंडीशंड के शौकीनों को पीने और पिलाने की पूरी आजादी है। वाह रे रामराज!

अनिल द्विवेदी
( लेखक वरिष्ठ पत्रकार और शोधार्थी हैं )

Tuesday, February 10, 2015

एके49 से एके67 तक

II हारता सावन II

"मोदी सरकार के नौ महीने पूरे हो गये। उसके पेट से जो विकासरूपी बालक जन्मा है, उसका नाम केजरीवाल है : फेसबुक पर वायरल हुआ एक चुटकुला।"

जैसे किसी ने बहते हुए दरिया को बोतल में बंद कर दिया हो और उसका जल उछलने को छटपटा रहा है, कुछ ऐसा हम भाजपा के साथ होता महसूस कर रहे हैं। इसे वरदान नहीं विडम्बना कह लीजिये कि मात्र नौ महीने पहले जिस नरेन्द्र मोदी को दिल्ली की जनता ने सातों लोकसभा सीटें देते हुए सरआंखों पर चढ़ाया था, आज उसी जनता ने भाजपा को उसकी सबसे शर्मनाक पराजय तक ला पटका है। धमाकेदार जीत के साथ केजरीवाल आज प्रासंगिक तो हैं ही, कालजयी भी हो गये हैं। उनके विजन, मेहनत और जीतने योगय रणनीति को लाखों सलाम! शुभकामनाएँ!  

तमाम दुष्प्रचारों को धता बताते हुए दिल्ली की जनता ने जिस तरह आम आदमी पार्टी पर दुबारा भरोसा जताया है, वह भाजपा-कांग्रेस सहित दूसरे राजनीतिक दलों के लिए खतरे की घण्टी की तरह है। सोलह सालों से राजनीतिक वनवास भोग रही भाजपा, इस दावे के साथ किरण बेदी को लेकर आई थी कि बेदी नया चेहरा हैं और दिल्ली में वे खासी लोकप्रिय हैं, लेकिन यह मृगमरीचिका तब साबित हुई जब बेदी भाजपा का गढ़ माने जाने वाले कृष्णा नगर सीट से चुनाव हार गईं। एक न्यूज चैनल पर भाजपा कार्यकर्ता ने उनकी हार पर आक्रोश व्यक्त करते हुए कहा : जिस बेदी ने कभी ब्यूरोक्रेट्स रहते हुए कार्यकर्ताओं पर लाठियां भांजी थीं, हम उन्हें मुख्यमंत्री कैसे बनते देखते? दूध का जला छाछ भी फूंककर पीता है लेकिन भाजपा ने पिछली गल्तियों से कोई सबक नहीं लिया। 

भूले नहीं होंगे कि 2005 के लोकसभा चुनावों में भाजपा ने छत्तीसगढ़ की महासमुंद सीट से कांग्रेस के वरिष्ठ नेता स्व. विद्याचरण शुक्ल को बतौर उम्मीदवार बनाकर उतारा था तब भाजपा-संघ के कार्यकर्ताओं ने उन्हें सिरे से खारिज कर दिया था और शुुक्ल एक लाख से ज्यादा मतों से हार गए थे। यह सवाल रह-रहकर फन फैला रहा है कि जब पार्टी के पास पेशेवर नेताओं की फौज थी तो उसने सबको धकियाते हुए किरण बेदी को क्यों ला खड़ा किया? सभी बड़े नेता अनुशासन का डण्डा चलने के डर से मन मसोसकर शांत हो गए थे लेकिन देवतुल्य भाजपा कार्यकर्ताओं को लगा कि झूठे दिलासों के कफन ओढ़कर कब तक इंतजार करेंगे सो वे ना सिर्फ घर बैठ गए! 

और सिर्फ कार्यकर्ता ही क्यों, भारतीय लोकतंत्र की यही खासियत है कि वह अधिनायकवादी फैसलों के आगे कभी नहीं झुका। चाहे इंदिरा गांधी का दौर रहा हो या फिर वर्तमान में मोदी और शाह का। इस हार-जीत को हम जिस उजाले में देखने का प्रयास कर रहे हैं, उसके मुताबिक दिल्ली विधानसभा चुनाव के मीठे-खट्ठे परिणामों के बीच तीन प्रमुख कारण निकलकर आए हैं : पहला है ईमानदार चेहरा, दूसरा केडरबेस काम और तीसरा रणनीतिपूर्वक आगे बढ़ना। आश्चर्य कि आप पार्टी इसमें सफल रही जबकि भाजपा की चाल डगमगाती रही। 
केजरीवाल ने मोदी और शाह की तरह पार्टी को अपनी दृष्टि से नहीं बल्कि जनता की दृष्टि से गढ़ने की कोशिश की। 

जबान की फिसलन भी भाजपा को ले डूबी। एक तरफ भाजपा नेता ऐलानियां आप को धमकाते रहे तो दूसरी ओर केजरीवाल का आत्मविश्वास आकार लेता गया। मोदी और भाजपा जहां केजरीवाल को एके47, नक्सली, हरामजादा और चोर बताते रहे, वहीं दूसरी ओर आप के कार्यकर्ता और नेता पिछली गल्तियों के लिए जनता से माफी मांगते हुए दिल जीतते चले गए। केजरीवाल ने छप्पर फाड़ जीत हासिल कर 67 सीटें जीतकर एके47 का करारा जवाब दिया है। एक बानगी देखिए कि मतदान के एक दिन पहले प्रवक्ता आशुतोष ने बयान दिया कि हमें बुखारी का समर्थन नहीं चाहिए क्योंकि नवाज शरीफ को आमंत्रण देकर उन्होंने देश के प्रधानमंत्री का अपमान किया था। यह बयान भी भाजपा की जीत के लिए अंतिम कील साबित हुआ। 

समय से बहस करते हुए भाजपा की हार को धड़कनों की समग्रता में महसूस करने की जरूरत है। पार्टी और नेताओं को सर्वानुमति का सम्मान करना होगा। आरएसएस को भी भाजपा के उन बुलडोजरी फैसलों का विरोध करना सीखना होगा जिसमें अधिनायकवाद की बू आती है अन्यथा आज भाजपा कार्यकर्ता घर बैठे हैं, कल से स्वयंसेवक भी गंभीरता से लेना बंद कर देंगे। 

चलिए जो जीता, वो सिकंदर। बहुत उम्मीद और भरोसे के साथ केजरीवाल में जनता ने एक ऐसे सुपर स्टार को देखा है जिससे ढेरों आशाएं और उम्मीदें जुड़ी हैं। दिल्ली ने पिछले सालों में लाखों बेरोजगार उगले हैं। सुरक्षा, बिजली और पानी की गारंटी भी बड़ी चुनौती है। उम्मीर करें कि पांच साल बाद अरविंद केजरीवाल की सरकार, कांग्रेस की शीला दीक्षित सरकार से ज्यादा बड़ी लकीर खींचकर दिखाएगी। 

अनिल द्विवेदी ( लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं )


Monday, January 5, 2015

जीत-हार को इस तरह लीजिए


II गंगा स्नान II

प्रदेश की लगभग सवा दो करोड़ की आबादी ने अगले पांच सालों के लिए शहर-सरकार और अपने खैरख्वाहों को चुनते हुए आखिर अपना फैसला सुना ही दिया। महज चंद सालों में ही शक और असुरक्षा का जो माहौल पूरे राज्य में पनपा है, जनता ने इसी के दण्डस्वरूप भाजपा को सबक सिखाते हुए कांग्रेस पर भरोसा जताया है। बढ़ता नक्सलवाद, स्वास्थ्यगत लापरवाहियों से होती निर्दोष मौतें, राशन कार्ड निरस्तीकरण, पिछड़ा वर्ग का 4 प्रतिशत आरक्षण, पर्दाफाश होते भ्रष्टाचारी ये ऐसे कारण रहे जिनके चलते जनता अंदर ही अंदर उबलती रही मगर सरकार इस गुस्से की थाह नहंी पा सकी। 

इन परिणामों में तमाम तरह के संदेश छुपे हैं। पहला संदेश उन कामचोर, नाकारा और भ्रष्टाचारी लोगों के लिए है जिन्हें नकारते हुए रायगढ़ की जनता ने एक वृहन्नला को अपना महापौर चुन लिया। तस्वीर साफ है कि आप जनता का नेतृत्व कर रहे हैं तो मर्दों की तरह काम करिए अन्यथा मधु किन्नर जैसा विकल्प मौजूं है। हालांकि राजधानी रायपुर सहित पूरे प्रदेश में कई पार्षद ऐसे हैं जो लगातार तीसरी-चौथी बार चुनकर आए हैं। ऐसे नेता पार्टी की नाक साबित हुए हैं। उन्हें बधाईयां और शुभकामनाएं!

पहले बात कांग्रेस की। नक्सली हमले से कमजोर हुई पार्टी को जब विधानसभा-लोकसभा चुनावों में भी हार का सामना करना पड़ा तो पूरी पार्टी मानो मनोबल खो चुकी थी मगर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल और नेता प्रतिपक्ष टी.एस. सिंहदेव ने परिस्थितियों को नाप-तौलकर, बड़ा दिल रखकर, टीम-वर्क के साथ सरकार के खिलाफ जो आंदोलन छेड़ा, या जो आत्मविश्वास संगठन में भरा, यह जीत उसी का नतीजा है। पार्टी ने इस बार चार नगर निगम सहित पूरे प्रदेश में सम्माजनक विजय हासिल की है। यहां पर बड़ी चुनौती यह है कि रमन सरकार ने विकास की जो लकीर खींची है, आप उससे बड़ी लकीर खींचकर दिखाएं क्योंकि आगे और भी इम्तिहान होना है। 

इस जीत से कांगे्रेस और उसके कार्यकर्ता उर्जावान हुए हैं और भरोसा हो गया है कि पार्टी सत्ता में आ सकती है। आगे इस विश्वास को मजबूती के साथ बनाए रखने की जरूरत है। जहां तक जोगीरूपी चुनौती का सवाल है, आप उन्हें नजरअंदाज नहीं कर सकते। ना भूलें कि उन्होंने बिलासपुर सीट पर तय उम्मीदवार का विरोध किया था और पार्टी वहां हार गई है, सो जोगी और पार्टी एक-दूसरे के महत्व को बखूबी समझें और आगे बढ़ें। पार्टी को नोट कर लेना चाहिए कि उसके परंपरागत वोट बैंक-सतनामी मुस्लिम आदिवासी, जिस पर भाजपा ने सेंध लगाई है-को वापस पाना होगा। रही बात फूल-छाप नेता और कार्यकर्ताओं की तो उनसे भूपेश बघेल ने निबटना बखूबी सीख ही लिया है!

ताजा चुनाव परिणामों से भाजपा सकते में है। बुनियादी और गहरा सवाल यह है कि बेहतर सुराज देने का दावा करने वाली भाजपा को जनता ने खारिज क्यों किया या कांग्रेस पर भरोसा क्यों जन्मा? पिछले 11 सालों तक प्रदेश का अटल चेहरा बने, जनता का दिल जीतने वाले मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह देश में ऐसे मुख्यमंत्री के तौर पर पहचाने जाते हैं जो अभी तक बेदाग बने हैं। उनका विजन और योजनाओं ने इस राज्य को विकास के शिखर पर पहुंचाया है। खुद कांग्रेस की सरकार ने उन्हें दो दर्जन से ज्यादा पुरस्कार दिए। फिर क्या कारण रहे कि पार्टी जनता के नजरों से उतरती जा रही है? वस्तुत: पिछले कुछ सालों में नैतिकता की सीमा तक सरकार में जो भ्रष्टाचार पनपा, लालफीताशाही जन्मी, अफसरराज आया, उस पर यदि नकेल कसी जाती, मौत के सौदागरों के हाथों होती निर्दोष मौतों पर लगाम लगती या भ्रष्टाचार के धनकुबेरों को जेल में डाला जाता और कार्यकर्ताओं को सरकार में एक व्यक्ति-एक पद के मुताबिक तवज्जो मिलती तो पार्टी को यह दिन ना देखने पड़ते। 

अगर नरेन्द्र मोदी सहित पूरी पार्टी यह दावा करती है कि भाजपा में व्यक्ति नहीं पार्टी चुनाव लड़ती है तो यह दावा रायपुर में धराशायी हो चुका है। यहां पार्टी लगातार दूसरी बार महापौर चुनाव में धराशायी हुई है। साफ है कि पार्टी-हित के आगे पार्टी गौंण हो चुकी है। ऐसा नहीं है कि पार्टी के पास जीतने लायक चेहरे ही नहीं बचे लेकिन संगठन में प्रभावी कुछ रसूखदारों को इन चेहरों के बलवान होने से अपनी सत्ता खतरे में दिखती है इसलिए चालाकीपूर्वक इन्हें दरकिनार कर रहे हैं और खामियाजा पार्टी भुगत रही है। 

इसकी शुरूआत 2009 के चुनावों में ही हो गई थी जब कांग्रेस ने तीन नगर निगम हथियाए थे लेकिन सरकार नहीं चेती। तारीफ करना होगी स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल के नेतृत्व की कि नसबंदी काण्ड के चलते पूरे देश में आलोचना का केन्द्र बनने के बावजूद उन्होंने बेहतर नेतृत्व किया और बिलासपुर में पार्टी का महापौर चुनवाकर आलोचकों का मुंह बंद कर दिया। कार्यकर्ता महसूस करते हैं कि पिछले पांच साल में कमजोर और थके चेहरों के चलते जिला संगठन भी धराशायी होता जा रहा है जिसे फिर से ऑक्सीजन देने की जरूरत है। टिकट बंटने तक पार्टी की वार्ड बैठकें तक नहीं हो सकी। यही हालात अम्बिकापुर, चिरमिरी, जांजगीर, रायगढ़ में भी दिखाई दिए। आने वाले समय में पार्टी की परीक्षा पंचायत और मंडी चुनावों में भी होनी है इसलिए जरूरत इस बात की है कि भूल और चूकों के वास्तविक कारणों का हल निकाला जाए। अहंकार के घोंघे को तोड़कर दोस्ताना और विद्वतापूर्ण ढंग से पार्टी में संवाद स्थापित हो। जनता के सरोकारों, उनकी तकलीफों को गंभीरता से लें और उसी के मुताबिक फैसले भी करें ताकि रामराज सुराज महसूस हो सके। 

अनिल द्विवेदी 
( लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं )


Tuesday, November 25, 2014

किसका कोड़ा, किसकी पीठ

।। गंगा स्नान।।

पहले एक बयान : एक माँ का श्राप है जिम्मेदार कभी सुखी नही रहेंगे, यह दर्द दुलौरिन की सास के हैं जिसने बिलासपुर नसबंदी काण्ड में अपनी बहू को खो दिया है.

अब वाट्स अप पर आए मजाकिया संदेश पर गौर करें : मुख्यमंत्री कहते हैं : ऑपरेशन स्वास्थ्य मंत्री नहीं करता. स्वास्थ्य मंत्री कहते हैं कि स्वास्थ्य विभाग की गलती नहीं. डॉक्टर-संघ कह रहा है : मरीज गलत दवा खाने से मरे. फार्मा संघ कह रहा है : चूहा मार दवा इतनी नहीं थी कि उससे इंसान की मौत हो जाए लेकिन पीडि़त कह रहा है : बस कर ददा. गलती हमरे रहिच..हमरे मन करत रहिच मरे के..!

मजाकिया अंदाज लिए इस संदेश के अंतिम शब्द गंभीरता और सच्चाई ओढ़े हैं। काश यह तेजाब बन जाते और हर उस शख्स को झुलसा दें जो इस नसबंदी हत्याकाण्ड के जिम्मेदार माने जा रहे हैं। बिलासपुर के पेंडारी में हुआ नसबंदी हादसा या यूं कह लें कि एक ऐसा हत्याकाण्ड है जिसे मानव समूह की लापरवाही ने रचा। फिलवक्त 18 जानें गई हैं और अभी भी मौत मजे ले-लेकर लील रही है। चूक कहां हुई, कैसे हुई, समूची इंसानियत इसके जवाब के लिये बेकरार है लेकिन सही उत्तर नदारद है। यहां वाजिब सवाल यह खड़ा है कि जनसंख्या स्थरीकरण के लिए केन्द्र सरकार, जो नसबंदी योजना चला रही है, क्या वह सिर्फ एक समुदाय के लिए ही है क्योंकि मौतों का आंकड़ा इस पर अपनी मुहर लगा चुका है। 

यह अफसोसजनक हादसा ऐसे राज्य में हुआ है जिसके मुखिया यानि मुख्यमंत्री खुद डॉक्टर हैं। रमनसिंह जी की जो बड़ी खासियत है, वह यह कि उन्हें तौलकर बोलने में महारत हासिल है लेकिन उन्होंने मन को चुभने और गले ना उतरने वाला बयान देकर चौंका दिया। सवाल स्वास्थ्य मंत्री के इस्तीफे को लेकर दागा गया था जिसके जवाब में उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य मंत्री ऑपरेशन नहीं करते! कमाल है भाई! अगर सालों पहले रेल हादसे से विचलित एक रेल मंत्री ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था तो क्या इसका मतलब यह कि रेल मंत्री ही रेल चलाते हैं। यह तो नैतिकता का तकाजा है और इस्तीफा उसका सुबूत। एक नरेन्द्र मोदी हैं जिन्होंने छह महीने में ही परफारमेंस ना देने वाले मंत्रियों को सबक सिखाते हुए उनके विभाग छीन लिए। और एक आप हैं कि कोई कार्रवाई ना करना ही मानो असली काम बन चुका है। 

अपने परिजनों को खो चुके लोग दु:ख से सूखे जा रहे हैं और राजनीतिज्ञ हैं कि मौत को मनोरंजक बनाते हुए उलजुलूल बयान दे रहे हैं। फिलवक्त किसी कार्रवाई की उम्मीद करना बेमानी होगा क्योंकि बचने-बचाने का खेल शुरू हो चुका है। शुरूआत आरोपी डॉक्टर से करते हैं जिसकी गिरफतारी का विरोध इंडियन मेडिकल एसोसिएशन कर रहा है। डॉक्टरों के संघ ने जिन दो मांगों के साथ प्रदर्शन किया, उसमें एफआईआर से हत्या की धारा हटाने तथा रिहाई की मांग जुड़ी है। परंतु शवों पर अपने तर्कों के अट्ठहास लगाने वाले स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल ने स्वागतयोगय लेकिन घुडक़ीभरे अंदाज में कहा कि फिलहाल जो मौतें हुई हैं, उनमें से कुछ की वजह इंफेक्शन बताया जा रहा है जिसके लिए डॉक्टर जिम्मेदार है। 

जिस राज्य में पिछले 12 सालों तक निजी नर्सिंग होम एक्ट लागू ना हो सका हो, अंदाजा लगाया जा सकता है कि डॉक्टरों के बचने या बचाने की किस कदर छूट मिली हुई है! आंखफोड़वा काण्ड, गर्भाशय काण्ड, मलेरिया से होती बेगुनाह मौतें, स्वास्थ्य कार्ड के नाम पर लूट जैसे कई हादसे हमने देखे और हर वक्त इस उम्मीद के साथ मन मसोसकर चुप हो गए कि कभी तो स्थिति बदलेगी, सिस्टम सुधरेगा या डॉक्टरों में मानवीयता जागेगी मगर अफसोस कि गरीबों की जान के साथ खेलना मानो इनका असली पेशा बन चुका है। 

इस मखौल में सब शामिल हैं तभी तो विपक्षी कांग्रेस को जैसे अंधेरे में तीर चलाने का बहाना मिल गया। जनता को तो याद है परन्तु पार्टी ना भूले कि चंद महीनों पहले ही राजधानी रायपुर में पीलिया से हुई मौतों में तीन दर्जन से ज्यादा जिंदगियां होम हो गई थीं! क्या महापौर डॉ. किरणमयी नायक उन चेहरों को गिना सकती हैं जो इस काण्ड के लिए जिम्मेदार थे और उन्होंने उन पर बड़ी या कड़ी कार्रवाई की? नतीजा सिफर रहा है। लेकिन जनता न्याय करना चाहती है और वह नगर निगम चुनाव का इंतजार कर रही है। अब वापस नसबंदी काण्ड पर लौटते हैं जिस पर राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए सुरक्षित घरों में बैठे तमाम इच्छाधारी फुफकारते हुए बाहर निकल आए। इन्हीं में से एक कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी। दुर्घटना के पीडि़तों को रमन सरकार ने जो मुआवजा बांटा, वह न्यायानुकूल तो नहीं लगा मगर वह उसका धर्म था और निभाया भी लेकिन कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी से लेकर छुटभैया नेताओं ने आश्वासन और वादों के अलावा कुछ नहीं दिया। 

मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि राहुल जब पीडि़तों से मिल रहे थे तो वे लडख़ड़ाती सांसों के साथ यह उम्मीद बांधे बैठे थे कि कांग्रेस के युवराज उस पार्टी के सर्वोच्च नेता हैं जिसकी तिजोरी अरबों के चंदे से भरी पड़ी है? क्या उसका मुंह इन पीडि़तों की मदद के लिए नहीं खोला जा सकता था? राहुल ने महज सुर्खियां बटोरीं, वादों और आश्वासनों का मलहम लगाया और चलते बने। इसके ठीक विपरीत कांग्रेस के युवा विधायक अमित जोगी के पहल की दाद देनी होगी कि उन्होंने ना सिर्फ पीडि़तों के दु:ख-दर्द को बांटा बल्कि एक अनाथ बिटिया को उसकी परवरिश करने के लिए गोद भी लिया। राज्य में 90 विधायक हैं। अगर एक-एक परिवार को भी गोद लेंगे तो अभागे परिवारों के दर्द और आंसुओं पर कुछ तो मलहम लगेगा ही। 

आप भूलें ना हों तो याद दिला दूं कि पूर्व गृह मंत्री ननकीराम कंवर ने तीन साल पहले राजधानी के मेडिकल स्टोर में पुलिस के दस्ते भेजकर छापे पड़वाए थे। कारण यह कि उन्हें नौ रूपये की टेबलेट नब्बे रूपये में बेची गई थी। तब छापे में आश्चर्यजनक खुलासा हुआ था कि मेडिकल स्टोर्स में नकली दवाईयां खपाई जाती हैं। कंवर का यह अभियान जनता के हित से जुड़ा था या उनकी व्यक्तिगत भड़ास रही हो, परन्तु पब्लिक ने उसे खासा रिस्पांस दिया था। हालांकि  स्वास्थ्य विभाग को दीमक की तरह चाट रहे दलाल ठेकेदारों तथा कुछ राजनीतिज्ञों ने हायतौबा मचाते हुए कार्रवाई को कटघरे में खड़ा किया था परन्तु शीशे की तरह साफ है कि पूरे राज्य में दवा व्यवसाय का काला धन्धा फल-फूल रहा है और उसे सरकार के राइट-लेफट में बैठे शुभचिंतक संरक्षित करते रहे हैं, इन्हें बचाने का खेल बड़ी चालाकी से खेलते हैं। 

महावर दवा कंपनी को ही लीजिये : सन् 2012 में उसका लाइसेंस रद्द हुआ था लेकिन जल्द ही उसे श्रेष्ठ गुणवत्ता का प्रमाण-पत्र पकड़ा दिया गया। महावर को सांसद रमेश बैस के चुनाव कार्यालय प्रभारी के तौर पर मैंने खुद देखा है। मन में यह सुगबुगाहट उठना स्वाभाविक है कि सरकारी अस्पतालों में दवाईयां खपाने से लेकर राजनीतिक मदद करने तक में किसने साथ दिया होगा? हालांकि श्री बैस का साफगोईपना देखिए कि उन्होंने खुद ही खुलासा किया कि जिस दवा कंपनी की दवाईयां मरीजों को दी गईं, उसे कुछ साल पहले ब्लैकलिस्टेड किया जा चुका है। नसबंदी काण्ड पहला मामला थोड़े ही है। इसके पहले शर्मिंदा करने वाले वाकयों को अंजाम दिया गया था, उसके दोषी डॉक्टर नाममात्र के लिये निलंबित हुए और चंद महीनों में ही बहाल कर दिए गए। गर्भाशय काण्ड में जिन डॉक्टरों के लाइसेंस रद्द हुए, उसमें से कितने ही फिर से अपनी प्रेक्टिस पर लौट आए हैं। कहने का तात्पर्य यह कि सजा ऐसी दीजिये कि नैतिकता का थर्मामीटर टूट जाए। बहकावे में आकर या कह लें कि चंद रूपये पाने का लालच ही सही, आंखों में सपने पालने वालों ने सिस्टम पर भरोसा करने की जो कीमतचुकाई है, शैतानों को उसका पाई-पाई का हिसाब अभी ना सही, कभी ना कभी तो चुकाना पड़ेगा ही, वह भी जिंदा रहते हुए। रही न्याय की बात तो आप देखिएगा, आंखफोड़वा काण्ड, गर्भाशय काण्ड या बालको चिमनी हादसा की तरह ही नसबंदी काण्ड भी अपनी मौत मर जाएगा यानि इंसाफ समय की गर्द में दफन हो चुका होगा। 


अनिल द्विवेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार और शोधार्थी हैं 
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Wednesday, April 2, 2014

राजनीति का नया अभिषेक



आसान जीत की ओर बढ़ रहे अभिषेक सिंह का राजतिलक लगभग तय है लेकिन इसके बाद खुद को साबित करने की चुनौती मुंहबांये खड़ी है. अब तक राजनांदगांव से खुद को दाँव पर लगाने वालों की सच्चाई यह है कि राजनीतिक रोटियां सेंकने के सिवाय वे कोई खास चमत्कार नहीं कर सके अत: परिवार से लेकर जनता-जनार्दन तक में आशा की यह डोर बंधी है कि शुक्ल-युग का अवसान होने के बाद देश के राजनीतिक-शीर्ष पर युवा छत्तीसगढिय़ा की जो कमी राज्य महसूस कर रहा है, उम्मीद है कि अभिषेक इसे भरने में कामयाब होंगे. ठीक राहुल गांधी, सचिन पायलट और ज्योतिरादित्य सिंधिया की तरह. राजनांदगांव संसदीय क्षेत्र से विशेष रिपोर्ट :
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जादुई स्पर्श लिए मुस्कान और अदाभरी शालीन चुप्पी के साथ अभिषेक सिंह जब चुनाव-प्रचार के लिये घर से निकलते हैं तो छह फीट से अधिक की काया वाले इस शख्स से हाथ मिलाने को लोग बेताब हो उठते हैं. बुढ़ापा ओढ़े दो शख्स के बीच खड़ी एक नन्हीं बिटिया के सर पर बाबा हाथ फेरते हैं और बुजुर्गों से कहते हैं, ‘इस क्षेत्र की सेवा करना चाहता हूं. आपका आर्शीवाद चाहिये.’ जोश से भरी युवाओं की टोली नारे लगाती है और काफिला आगे बढ़ जाता है. लेकिन कांगे्रस-जोकि विपक्षी चुनौती के तौर पर सामने है-के झण्डे-बैनर देखना मुश्किल पड़ रहा है. इसकी वजह साफ करते हुए पार्टी के वरिष्ठ नेता कहते हैं, ‘जनमत का दबाव या सत्ता के लोभ का असर कह लीजिये, विद्रोह और विरोध की हर चिंगारी जलने से पहले ही बुझ गई.’

लेकिन राजा-रजवाड़ों के प्रभुत्व वाले इस शहर में ऐसा कब नहीं हुआ? सत्ता का तो चरित्र ही यही है. क्षेत्र का संसदीय इतिहास गवाह है कि राजा वीरेन्द्र बहादुर सिंह से लेकर रानी पद्मावती देवी, शिवेंद्र बहादुर सिंह, मोतीलाल वोरा, राजा देवव्रत सिंह, डॉ. रमनसिंह और मधुसूदन यादव तक में मात्र यादव ही तो थे जो महल बनाम हल की लड़ाई जीतकर संसद पहुंचे और अब यह नारा कांग्रेस प्रत्याशी कमलेश्वर वर्मा लगा रहे हैं. अभिषेक पर अप्रत्यक्ष प्रहार करते हुए वे कहते हैं, ‘मतदाता चाहकर भी महल के प्रत्याशी (अभिषेक सिंह) से नहीं मिल पायेंगे.’ अभिषेक इसके जवाब में मौन साध लेते हैं.

पन्द्रह लाख से ज्यादा की आबादी वाले राजनांदगांव लोकसभा में चुनावी बिसात सज चुकी है. हाथों में मुद्दे और आरोपरूपी तलवार के साथ मोहरे मैदान में हैं और पार्टी के दिगगज रणनीतियों के साथ एक-दूसरे को धराशायी करने में लगे हैं. तस्वीर साफ है कि गुजरे विधानसभा में भाजपा और कांग्रेसचार-चार सीटें जीतकर बराबरी पर रही थीं और यदि कांग्रेस ने वर्तमान की तुलना में मजबूत प्रत्याश्ी उतारा होता तो अभिषेक को गहरी चुनौती से जूझना पड़ता लेकिन अब खुला खेल फर्रूखाबादी हो चला है. राजनीतिक पंडितों का आंकलन है कि जब प्रदेश की राजनीति में नई जमात दहाड़ रही है तब अभिषेक ने धमाकेदार एण्ट्री मारी है.

लडख़ड़ाहटों के साथ ही सही, अभिषेक ने अपने राजनीतिक कैरियर की शानदार शुरूआत की है. कुछ अभिषेक को पैराशूट कैंडीडेट मान रहे हैं मगर वे गफलत में हैं. विरोधी तर्क देते हैं कि उनका कोई राजनीतिक अनुभव नहीं है और सिर्फ एक ही योगयता है कि वे मुख्यमंत्री के सुपुत्र हैं. इसके बचाव में वरिष्ठ पत्रकार विजय कानूगा कहते हैं, ‘ऐसे लोगों के लिये सचिन पायलट और ज्योतिरादित्य सिंधिया को याद करना चाहिये जिन्होंने कम अनुभव के बावजूद पिता की विरासत संभाली और राजनीति में सफल हुए. आप देखिएगा अभिषेक की जीत एक लाख से ज्यादा मतों से होगी.’

दरअसल राजनांदगांव लोकसभा क्षेत्र पर बाबा की नजर तीन साल पहले लग गई थी. सीट तय होने के बाद मुख्यमंत्री डॉ. रमनसिंह के सलाहकार विवेक सक्सेना को वहां का प्रभार सौंपा गया जिन्होंने दिन-रात एक करके स्थानीय समीकरणों को साधा, रास्ते की रूकावटों को साफ किया, असंतुष्टों को मनाया और सरकारी मशीनरी को झोंकते हुए विकास की गंगा बहा दी. इलाका चमन हो चुका है और यहां के सडक़ मार्ग से गुजरते वक्त आप इसका नजारा बखूबी देख सकते हैं.

गुजरे विधानसभा चुनाव में बाबा की नेतृत्व-क्षमता को परखने का वक्त था सो पर्दे के पीछे रखते हुए उन्हें राजनांदगांव सीट का चुनाव संचालक बनाया गया. पूरे दो महीने तक अभिषेक ने जिस सूझबूझ से चुनाव संचालन किया और पिताश्री को पैंतीस हजार से ज्यादा की लीड से विजयश्री का वरण कराया, उसने भाजपा संगठन, आम आदमी और पिता का दिल जीत लिया. इस सफलता के बाद इस बात पर मुहर लग गई थी कि अगला लोकसभा चुनाव अभिषेक ही लड़ेंगे. ऐसा नहीं है कि वर्तमान सांसद मधुसूदन यादव की टिकट काटने से पार्टी और संगठन में खदबदाहटें नहीं हुईं लेकिन उसे जादू की झप्पी के साथ बेहद खामोशी से दफन कर दिया गया. सुना है कि इस कुर्बानी के बदले मधुसूदन को लालबत्ती से नवाजते हुए युवा आयोग का अध्यक्ष बनाया जा सकता है.

अब जबकि अभिषेक सांसद बनने की ओर हैं तब एक बड़ा सवाल जेहन में यह है कि वे लम्बी राजनैतिक पारी खेलेंगे या देवव्रत सिंह और मधुसूदन यादव जैसे युवा चेहरों की तरह अगले चुनाव तक फुस्स हो जायेंगे. अंचल का दुर्भागय कह लीजिये कि राजपरिवार के आश्रय में पल-बढ़ रहा राजनांदगांव आज भी देश में पहचान के लिये मोहताज है. अगले पांच साल बाद तय होगा कि बाबा ने खुद का राजनैतिक धरातल किस कदर मजबूत किया है? फिलहाल भाजपा और कांग्रेस के संसदीय फलक पर जो युवा चेहरे जमे हैं, उनमें तरूणाई तो गायब सी हो गई है. भाजपा के दिनेश कश्यप, कांग्रेस के देवव्रत सिंह और कुछ हद तक दुर्ग की सरोज पाण्डे को छोड़ दें तो अभिषेक सिंग के रास्ते में ज्यादा अवरोध नहीं है. वे अपने पिता की तरह ही छुपे रूस्तम साबित हो सकते हैं क्योंकि सियासी शालीनता और परिपक्वता के मुकाबले अभिषेक सबसे बीस ही नजर आते हैं. मगर फिर भी बाबा को जंग खाई मुरझाई सोच को तिलांजलि देकर आगे बढऩा होगा. पिता का आभामण्डल-जो इनके इर्द-गिर्द बना है-को तोडक़र खुद की देशव्यापी छबि बनाने की चुनौती है. मन में आशा के फूल खिले हैं कि अभिषेक उस शून्य को जरूर भरेंगे जो शुक्ल-युग के अवसान के बाद देश की राजनीति में छत्तीसगढ़ के लिये पैदा हो गया है. हमारी शुभकामनाएं साथ हैं.

अनिल द्विवेदी
लेखक राजनीतिक टिप्पणीकार हैं

Friday, March 21, 2014

विषम कोण : 

तकनीक के आगे हारी नैतिकता ?

रोहित बनाम एनडी तिवारी के मामले में यह साबित हो चुका है कि जब नैतिक-धर्म कमजोर पड़ जाता है तो विज्ञान ना सिर्फ उम्मीद के तौर पर आपके साथ है बल्कि वह दूध का दूध और पानी का पानी करने की क्षमता भी रखता है. डीएनए जांच से ही साबित हुआ कि रोहित के गुणसूत्र तिवारी से मेल खाते हैं! इसके बाद तिवारी ने आत्मसमर्पण कर दिया. विज्ञान और रोहित के हौसलों के आगे नैतिक धर्म की हार हुई है!

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पुरानी कथा है. राजा उत्तानपाद की दो पत्नियां सुनीति और सुरूचि थी जिन्हें सुनीति से धु्रव और सुरूचि से उत्तम नामक पुत्र प्राप्त हुए थे. वैसे तो सुनीति बड़ी रानी थी लेकिन राजाजी का दिल सुरूचि के लिये ज्यादा धडक़ता था. एक दिन धु्रव राजा की गोद में बैठे खेल रहा था तभी छोटी रानी सुरूचि वहां आई और उसने ध्रुव को पिता की गोद से उतारते हुए अपने पुत्र को राजा की गोद में बैठाते हुए ध्रुव से कहा : तू मेरी कोख से पैदा नहीं हुआ है इसलिए उनकी गोद में या राजसिंहासन में बैठने का अधिकार तुझे नहीं है.. कहानी का अंत और निष्कर्ष दूसरी तरह का है लेकिन यहां इसका जिक्र हम नारायण दत्त तिवारी और उनके बेटे रोहित शेखर के बीच जारी विवाद से जोडक़र देखना चाहते हैं.

नैतिकता खखारने वालों के लिये यह अतिश्योक्ति कदापि नहीं होगी कि पूर्व मुख्यमंत्री, 87 साल के नारायण दत्त तिवारी के बेटे रोहित ने जो लड़ाई लड़ी, वह धु्रुव की लड़ाई से ज्यादा सम्मानीय है. सराहनीय भी है और प्रेरणास्पद भी. पैंतीस साल तक लावारिस होने का दंश झेल रहे रोहित ने ना सिर्फ पितृ-सुख हासिल करने का अधिकार हासिल किया बल्कि सालों से सुहाग के नाम से वंचित अपनी माँ को भी न्याय दिलाया. जिस समाज के अजीबोगरीब तर्कों के आगे भगवान राम तक ने घुटने टेक दिये (सीता की अगिनपरीक्षा) उस कलियुगी समाज में सालों तक किसी महिला का बिना पति के अकेले गुजर-बसर करना कितना त्रासद भरा रहा होगा, इसका दर्द उस माँ से ज्यादा भला कौन महसूस कर सकता है? या बिना पिता का नाम लिये दोस्तों के बीच उठना-बैठना, मार्कशाीट तक में पिता के नाम के लिये तरसना, रोहित के लिये कितना अपमानजनक रहा होगा, सहज अंदाजा लगाया जा सकता है. 

ऐसा नहीं है कि रोहित शेखर की माँ ने पति का अधिकार हासिल करने के लिये अनुनय-विनय नहीं किया होगा मगर एक शक्तिशाली राजनीतिज्ञ का नशा तिवारी पर इस कदर चढ़ा था कि उन्होंने इस अबला की दलीलें कई बार खारिज कर दी. एक बार तो उनके बंगले में ही खासा विवाद हुआ था. रोहित की मां उज्जवला शर्मा, पूर्व केन्द्रीय मंत्री प्रो. शेरसिंह की पुत्री हैं और तिवारी जब उत्तरप्रदेश के  मुख्यमंत्री थे, तब उनके संपर्क में आई थीं. चंद मुलाकातों में ही दोनों के बीच रिश्ते बन गये. सत्ता की संवेदनाओं की बंजर जमीन पर पकती आंकांक्षा और उत्तेजना की फसल से बेखबर, एनडी ने उनकी काफी मदद भी की और इतना शक्तिशाली बना दिया था कि उज्जवला के बिना सीएम हाउस का पत्ता तक नहीं खडक़ता था लेकिन जब वे गर्भवती हुईं तो तिवारी ने उन्हें शादीशुदा होने का हवाला देते हुए अपनाने से साफ इंकार कर दिया. 

बहस-तर्क  और परेशानी झेलने के बाद भी जब ढीठ राजनीतिक एनडी तिवारी नहीं माने तो रोहित पितृत्व हासिल करने और मां को उसका पति-अधिकार दिलाने के लिये न्यायालय की शरण में चले गये. जिरह के दौरान न्यायालय ने जब डीएनए टेस्ट करने का आदेश दिया तो राजनीतिक दर्शन का मुलम्मा चढ़ाकर अब तक बचते आये रसिकमिजाज तिवारी अंतत: उन्हें यह टेस्ट देना पड़ा. उसके बाद आई रिपोर्ट में यह साफ हो गया कि तिवारी ही रोहित के पिता हैं! 

सत्ता के बाएँ रहने वाले लोग मानते हैं कि तिवारी की रासलीलाओं का खेल नया नहीं है. यह तब से चल रहा है जब वे पहली बार विधायक और मुख्यमंत्री बने. पहले उत्तरप्रदेश और अब उत्तराखण्ड में उनके रसिकमिजाज के चटखारे लोग लेते ही रहते हैं. उत्तराखण्ड का मुख्यमंत्री बनने के बाद तिवारी की लीलाएं जारी रहीं. स्टैला डेविड कांड लोग भूले नहीं हैं. उनके वर्षों पुराने एक निजी सचिव को संदिग्ध परिस्थितियों में बाथरूम में मृत अवस्था में पाया गया था लेकिन मामला मीडिया प्रबंधन के जरिए हवा-हवाई हो गया. हालांकि तिवारी, अमरमणि, मदेरणा, चंद्रभान या गोपाल काण्डा की तरह दोगले नही हैं जो प्यार के नाम पर अवैध संबंधों का खेल खेलते हैं, फिर प्रेमिका को या तो मरवा देते हैं या आत्महत्या के लिये विवश कर देते हैं लेकिन पाप छुपाने का प्रयास तो तिवारी ने बेशर्मी की हद तक किया ही. 

विकासशील दौर में यह बहस अभी भी जिंदा है कि विज्ञान बड़ा या धर्म लेकिन रोहित बनाम एनडी तिवारी के मामले में यह साबित हो चुका है कि जब नैतिक-धर्म कमजोर पड़ जाता है तो विज्ञान ना सिर्फ उम्मीद के तौर पर आपके साथ है बल्कि वह दूध का दूध और पानी का पानी करने की क्षमता भी रखता है. रोहित-एनडी तिवारी प्रकरण का सत्य उजागर करने में डीएनए यानि जीवनसूत्र नामक चिकित्सा तकनीक की अहम भूमिका रही है. आयु के साथ व्यक्ति के डीएनए यानि जीवन-सूत्र में कोई बदलाव नहीं आता है अत: जन्म से मृत्यु पर्यंत डीएनए एक सा ही रहता है. अपने जैविक माता-पिता से प्राप्त इस जीवन-सूत्र में छिपी हुई सूक्ष्म विभिन्नताओं के आधार पर प्रत्येक जीव को किसी भी अन्य जीव से अलग पहचाना जा सकता है. रोहित को उसका पितृत्व अधिकार दिलाने में इसी तकनीक ने अहम भूमिका अदा की. न्यायालय के निर्देश पर हुई डीएनए जांच में स्पष्ट हो गया कि रोहित के गुणसूत्र तिवारी से मेल खाते हैं! इसके बाद तिवारी ने आत्मसमर्पण कर दिया.  साफ है कि विज्ञान और रोहित के हौसलों के आगे नैतिक धर्म की हार हुई है!

अनिल द्विवेदी
(लेखक रिसॅर्च स्कॉलर हैं)

Thursday, January 16, 2014

रमजान शरीर से गया, ये आत्मा से!

विषम कोण :

तीन महीने से छिन चुकी अपने पसीने की कमाई को हासिल करने की गुहार लगाते-लगाते रमजान अली दुनिया से चल बसा. कांकेर के जिलाधीश कार्यालय में जब उसने मिट्टी का तेल छिडक़कर अगिनदाह किया तो उसकी आत्मा के साथ-साथ मानवता, प्रशासनिक संवेदनशीलता और सुराज के खोखले दावे भी होम हो चुके थे. इस ह्दय विदारक घटना के बाद जेहन में दो बड़े सवाल उभरे हैं. पहला यह कि जिंदगी और मौत से जूझते अली ने जिस अफसर को दोषी बताया है, उसके खिलाफ एफआईआर क्यों नहीं हो रही? और दूसरा यह कि सरकार और प्रशासन यदि उसे बचाने में लगे हैं तो कर्मचारी-कल्याण के नाम पर नेतागिरी बघारने वाले या मुस्लिमहितों के नाम पर अपनी रोटियां सेंकने वाले धार्मिक-सामाजिक संगठन या उसके नेता, रमजान को या उसके परिवार को न्याय दिलाने के लिये आगे क्यों नहीं आ रहे?

भाईजान की मौत कई चेहरों पर एक बड़ा तमाचा है. वह जिला पंचायत कांकेर में ड्रायवर के पद पर कार्यरत था. विगत 5 जनवरी को यूट्यूब पर अपलोड तथा मृत्यु-पूर्व दिये अपने बयान में अली ने जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी, आइएएस भीम सिंह को अपनी मौत के लिये जिम्मेवार ठहराया है. इसके अलावा मेरे पास उस आवेदन-पत्र की कॉपी भी है जो उसने कलेक्टर को लिखा था. दो नवम्बर के इस पत्र में रमजान ने कहा था, ‘जिला पंचायत के सीईओ ने सितम्बर व अक्टूबर माह का मेरा वेतन बिना कारण बताए रोक दिया है. मुझे कार्य में अनुपस्थिति रहने का कारण बताओ नोटिस दिया जाता है जबकि मैं नियमित रूप से अपने कर्तव्य स्थल पर उपस्थित रहता हूं और हाजिरी रजिस्टर में हस्ताक्षर करता हूं जिसकी जांच करवा सकते हैं.’ वह आगे लिखता है : मेरी पत्नी ह्दय रोग से पीडि़त है. वेतन नहीं मिलने से आर्थिक परेशानी हो रही है. मुझे ऐसा लगता है कि मैं आत्महत्या कर लूं.’

लेकिन तर्कों और दिलासों के तीर चला रही पुलिस के लिये मानो ये दोनों सबूत सीईओ के खिलाफ एफआइआर के लिये पर्याप्त नहीं हैं इसलिए जांच जारी है. तय है कि यह कवायद भी खानापूर्ति के साथ खत्म हो जायेगी. कई मामलों का हश्र हम देख चुके हैं. मुद्दे की बात यह है कि अली ने मदद पाने के लिये अफसरों के अलावा मुख्यमंत्री, मंत्री सहित हर उस दरवाजे पर दस्तक दी जहां से उसे न्याय मिलने की उम्मीद लग रही थी लेकिन हाथ आई तो सिर्फ निराशा जिसके बाद उसने जीवनलीला समाप्त कर ली. कांकेर जिलाधीश अलरमेल मंगई डी की कार्यशैली भी सवालों के घेरे में है. चर्चित झालियामारी आश्रम काण्ड में उनकी निष्पक्ष और त्वरित कार्यवाही की खासी सराहना हुई थी लेकिन अली की शिकायत के निराकरण में जिस तरह की लेटलतीफी हुई या जानबूझकर होने दी गई, उससे मेडम की प्रतिष्ठा और ईमानदारीपूर्ण सेवा पर प्रश्न खड़ा हुआ है.

इस मजबूरी को समझा जा सकता है कि एक आइएएस, दूसरे साथी आइएएस के खिलाफ कार्रवाई करे तो कैसे करे? आश्चर्य कि जिस सरकार ने लोक सेवा गारंटी कानून लागू कर रखा है तथा जिसके अंतर्गत शासकीय सेवकों और नौकरशाहों को एक निश्चित अवधि के अंदर शिकायतों का निबटारा करना जरूरी होता है-वहां पर अली के आवेदन का निराकरण तीन महीने बीतने के बाद भी नहीं हो सका. एक बार मान भी लिया जाए कि रमजान ने ड्यूटी करने में लापरवाही बरती होगी लेकिन उसका वेतन रोकने का अधिकार आपको कैसे मिल गया? इसके पूर्व उसे कितने नोटिस दिये गये? निलंबन या बर्खास्तगी जैसी कार्रवाई के दौरान भी कर्मचारी को आधा वेतन या पेंशन पाने का अधिकार होता है. इस मुकाबले रमजान का गुनाह तो हल्का ही है.

लेकिन उसने अनमोल कीमत चुकाई. रमजान उन लाखों कर्मचारियों में शामिल था जिनके लिये सवेरा नई मेहनत और शाम थकान लेकर आती है. वह शासकीय कर्मचारी और ड्रायवर संघ का अध्यक्ष भी था लेकिन उसके परिवार की मदद के लिये कोई सामने नहीं आया. कर्मचारी-हितों के नाम पर कितने ही गुट-संगठन नेतागिरी करते हैं लेकिन प्रशासनिक दबाव के आगे सब बेबस नजर आ रहे. धर्म के उसूलों को आधार बनाकर बात-बात पर फतवा जारी करने वाली जमात हो या उनके नेता या फिर वोटों की खातिर अपनी राजनैतिक जमीन सींचने वाले राजनीतिक दल, रमजान अली की मौत पर आँसू बहाने का समय किसी को नहीं मिला. उसके जिंदा रहते ना सही, उसकी दुर्भागयपूर्ण और शर्मनाक मौत के जिम्मेदारों को सजा दिलाने की लड़ाई कांकेर से लेकर राजधानी तक लड़ी जानी चाहिए.

याद रखें कि यह घटना लाल आतंक में लिपटे उस जिले में हुई है, जहां आंख के बदले आंख का कबीलाई कानून लागू है लेकिन लोकतंत्र में न्याय की उम्मीद कानून के सांचे में ढली होती है. फिलहाल कमाऊ पूत के अचानक गुजर जाने से व्यथित पिता और अली का परिवार कलेक्टर के झूठे दिलासों का कफन ओढक़र सोने को मजबूर है. हुसैनी सेना, अली सेना, मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के अलावा मुस्लिम पंचायत और सीरत कमेटी जैसे संगठन हैं जिनकी एक आवाज पर पूरी कौम मदद के लिए खड़ी हो सकती है. वे चाहें तो रमजान के परिवार कोन्याय दिलाने की लड़ाई लड़ सकते हैं. यदि पत्थरों से बने आस्था-स्थलों के नाम पर जेहाद छिड़ सकता है तो रमजान को न्याय दिलाने के लिये क्यों नहीं?

अनिल द्विवेदी
लेखक पत्रकार हैं
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Wednesday, January 15, 2014

Wednesday, January 8, 2014

जिस कांग्रेस में 'बाबा' हैं
उस कांग्रेस में-जहां गांधी परिवार की मुहर ही अंतिम फैसला होती है-में इन दिनों कार्यकर्ता मन की बात कहने के लिये पार्टी फोरम नहीं बल्कि फेसबुक का सहारा ले रहे हैं! विधानसभा चुनाव में पार्टी की करारी हार से बौखलाए एक शख्स गोपाल साहू ने भड़ास निकालते हुए फेसबुक पर पोस्ट डाली. इसमें नेता प्रतिपक्ष रवीन्द्र चौबे की फोटो चस्पा करते हुए उनका एक बयान उद्धृत किया गया है. चौबे ने हार के बाद कहा था कि उम्मीदवार थोड़ा पहले तय हो जाते तो पार्टी जीत सकती थी. इस पर कार्यकर्ता ने कटाक्ष किया : आपकी टिकट तो तय थी महाराज. फिर कैसे हार गए?

यही सवाल एक साल पहले राहुल गांधी के समक्ष उठ चुका था. कार्यकर्ता भूले ना होंगे जब दुर्ग के एक कार्यकर्ता ने नेता प्रतिपक्ष रवीन्द्र चौबे की निष्क्रियता पर सवाल खड़ा करते हुए इस कदर आरोप लगाया था कि चौबे की आंखें गीली हो गई थीं. कांग्रेस की ताजा हार को लेकर जो खबरें जन्मीं, उसके मुताबिक जनमत साफ था कि निष्क्रिय, घमण्डी और बेईमान जनप्रतिनिधि नहीं चाहिये चाहे वह कांग्रेस हो या भाजपा लेकिन राहुल गांधी की इच्छा के विपरीत, नेता प्रतिपक्ष की जिद के चलते लगभग सभी विधायकों को टिकट दी गई जिनमें से सत्ताईस चुनावी मैदान में खेत हो गए. खैर.. अब पन्द्रह वर्ष का राजनीतिक वनवास बिताने को मजबूर कांग्रेस के कायाकल्प की शुरूआत हो ही गई. बदलाव के पहले शिकार प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष महंतजी हुए जिनके सर पर हार का ठीकरा फोड़ते हुए आलाकमान ने उनकी जगह तेजतर्रार और वरिष्ठ विधायक भूपेश बघेल को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया है लेकिन इन्हें मिली चुनौतियों की चर्चा बाद में.

अभी बात सरकार से लडऩे वालों की. विपरीत परिस्थितियों को साधते हुए, समझदारीभरे फैसले के साथ कांग्रेस विधायक दल को विश्वास में लेकर आलाकमान ने सरगुजा नरेश तथा वरिष्ठ विधायक टी.एस. सिंहदेव बाबा को नेता प्रतिपक्ष घोषित कर दिया. कहा तो यह जा रहा है कि गांधी परिवार से नजदीकी और महल के प्रभाव का इस्तेमाल करने के चलते सिंहदेव को यह अवसर मिला. इसे भी कौन नकारेगा कि सरगुजा में भाजपाई आंधी को थामकर सिंहदेव ने जिस तरह पार्टी की झोली में आठ में से सात सीटें डालीं, यह पद इसी का ईनाम माना जा रहा है. लेकिन राजनीति में नतीजे मायने रखते हैं, रणनीति नहीं. अब शर्माजी को ही लें. छठवीं बार विधायक बने सत्यनारायण जी नेता प्रतिपक्ष के प्रबल दावेदार थे लेकिन पार्टी में जरूरत से ज्यादा अज्ञातशत्रु पैदा कर लेना उनके लिये खतरनाक साबित हुआ. 

राजा अगर अच्छा है तो यह ईश्वर का वरदान है. यदि वह बुरा है तो मान लीजिए कि भगवान ने आपके पापों की सजा देने के लिये उसे भेजा है! नये साल में कुछ ऐसी ही उतार-चढ़ावभरी उम्मीद सरगुजा नरेश सिंहदेव से जुड़ चुकी हैं. नेक और कोमल स्वभाव वाले इस शख्स के सामने कई चुनौतियां हैं मगर राहुल गांधी की राह पर चलकर उनसे पार पाया जा सकता है. कांग्रेस का गढ़ वापस हासिल करने की तड़प के चलते कांग्रेस के युवराज ने युवा कार्यकर्ताओं के बीच टैलण्ट हाण्ट अभियान चलाया था लेकिन पार्टी उनका उपयोग कर पाती, इसके पहले बड़े नेताओं ने उनका शिकार कर लिया. सिंहदेव को भी युवा, उर्जावान और रमन सरकार के मंत्रियों को करारा जवाब देने वाले चेहरों को सामने करना होगा. लगातार तीसरी हार के बाद यदि कार्यकर्ता इस सोच के साथ घर बैठ गये हैं कि कांग्रेस का कुछ नहीं हो सकता तो उन्हें जगाने और उनमें विश्वास भरने का काम सिंहदेव को करना होगा. नब्बे विधानसभाओं में भी ऐसे चेहरे अभी से तलाशने-तराशने होंगे जो चुनाव जीतने की क्षमता रखते हों.

बड़े नेताओं के अहम और गुटबाजी से तंग आ चुके विधायकों में भरोसा जगाना बाबा के लिये तीसरी बड़ी चुनौती है. उनचालीस विधायकों में यह धारणा बलवती होती जा रही है कि भ्रष्टाचार से लेकर सरकार की खामियों तक के जिन मुद्दों को विधानसभा में वे उठाना चाहेंगे, उसके पीछे नेता प्रतिपक्ष का विश्वास और समर्थन बना रहेगा या नहीं. तीन बार से निर्वाचित हो रहे एक विधायक ने मुझसे कभी कहा था कि मयसबूतों के साथ उसने जब बलात्कार व हत्याकाण्ड का मामला पिछले विधानसभा में उठाना चाहा तो उसे चुप करा दिया गया. बाद में पता चला कि इसके बदले में नेता ने सरकार से भारी कीमत वसूल ली. यह कहने में गुरेज नहीं कि पूर्व के नेता प्रतिपक्षियों की कार्यशैली इस कदर बदनाम हो गई थी कि उन्हें रमन सरकार का चौदहवां मंत्री माना जाने लगा था. पत्रकारों ने जब इस छबि से मुक्त होने की बात सिंहदेव से पूछी तो उनका जवाब था : मैं मानता हूं कि हर आदमी की छबि उसके आचरण से तय होती है. आज के दौर में लोगों के सामने कुछ भी छुपा नहीं है. मेरे आचरण से पता चल जाएगा कि मैं क्या हूं?

आप क्या हैं, इसका अहसास होने लगा है. 2013 के चुनावों में दोबारा विधायक चुने जाने के बाद सिंहदेव पार्टी में ऐसे नेता के रूप में उभरे हैं, जिन्हें करिश्माई लीडर के तौर पर देखा जा रहा है. विधानसभा उपाध्यक्ष का विपक्षी-हक मांगने से लेकर अध्यक्ष पद पर सर्वानुमति कायम करने और लाल बत्ती को नकारने के बाद पार्टी और जनता उनके फैसलों की मुरीद हो चुकी है लेकिन सवाल यह है कि कांग्रेस कहां है और उसे कहां पहुंचाना है? क्या सिंहदेव आक्रामक और विश्वसनीय विपक्ष दे पाएंगे. इस देश में जहां पचास प्रतिशत से ज्यादा लोग युवा हैं तब कांग्रेस के अंदर बदलाव की एक बड़ी जरूरत महसूस हो रही है. जंग लगी मुरझाई सोच के थके-हारे चेहरों के बजाय कुछ कर गुजरने की सोच रखने वाले युवाओं को सामने लाना होगा. विधानसभा से लेकर संगठन और पंचायत स्तर तक में सरकार के खिलाफ धारदार हमला बोलने वाले युवा चेहरे तैयार करने होंगे. हालांकि गुटबाजी से अभिशप्त पार्टी में यह बदलाव थोड़ा समय मांगेगा मगर पांच साल कम थोड़े ही हैं.

अनिल द्विवेदी

Saturday, December 14, 2013

काँग्रेस ने अपने दुश्मन को देर से पहचाना
विधानसभा चुनाव की जंग और बयानों की उलटबांसियों के बीच एक अचरजभरा बयान केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश की ओर से आया. जीत या हार के कयासों के बीच एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि हमारी लड़ाई भाजपा से नहीं बल्कि आरएसएस यानि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से है! इस पर बात आगे बढ़े, उसके पहले एक कथा सुन लीजिये. महाभारत का आधा युद्ध खत्म हो चुका था और रणभूमि पर जिस तरह खून की नदियां बह रही थी, उससे चिंतित महाराज कृष्ण--कौरव और पाण्डव के मध्यस्थ--कौरवों को समझाने पहुंचे लेकिन कौरव नहीं माने तब कृष्ण अफसोस जताते हुए वहां से विदा होने लगे तो कौरवों ने उन्हें यह कहते हुए गिरफ्तार करने की कोशिश की कि सारा खेल इन्हीं का है. ये अर्जुन के सारथी हैं और पाण्डव इन्हीं की रणनीति पर  चलते हुए जीतते जा रहे हैं!

कांग्रेस को भी ऐन चुनाव के वक्त यह अहसास हुआ कि उसका मुकाबला भाजपा से नहीं बल्कि आरएसएस से है! रमेश ने जो सवाल उठाया है, पूर्व में भी कांग्रेस में इस पर चिंता हो चुकी है लेकिन हम यहां इस सवाल के बहाने कमजोर होती कांग्रेस और आरएसएस रूपी खाद से मजबूत होती भाजपा की चर्चा करेंगे क्योंकि आजादी के 65 साल बाद यदि कांग्रेस को अपने सही दुश्मन की पहचान हुई है तो सवाल यह खड़ा हुआ है कि वह आरएसएस से लडऩे की स्थिति में है भी या नहीं! जनसंघी दौर से लेकर 1990 की मात्र दो लोकसभा सीट से भाजपा यदि 137 तक पहुंची है और कांग्रेस का विकल्प बन चुकी है तो इसके पीछे आरएसएस की वर्षों की तपस्या है.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पहले सरसंघचालक हेडगेवार ने 1925 में नागपुर के मोहितेबाड़ा में आरएसएस का बीज बोया और पांच चुनिंदा प्रचारकों को देश के बड़े शहरों में भेजकर संघ-कार्य की शुरूआत की. नींव के पत्थर की भांति इन पांचों ने संगठित हिन्दु के लक्ष्य के साथ आरएसएस की जमीन को सींचना शुरू किया. यह वह दौर था जब लोग देखते-सुनते ही हंसने लगते थे कि क्या आप हिन्दु समाज को एकत्रित करेंगे! क्योंकि ऐसा करना मेंढक़ तौलने जैसा माना जाता है. लेकिन प्रचारकों ने धैर्य नहीं खोया. आज संघ के चार हजार से ज्यादा प्रचारक-जिनमें से कई इंजीनियर-डॉक्टर हैं-घरबार छोडक़र देश और समाज की चिंता कर रहे हैं. 50 हजार से अधिक शाखाएं और विविध क्षेत्रों में कार्यरत 30 से ज्यादा बड़े संगठनों की कार्यक्षमता के दम पर संघ ने करोड़ों भारतीयों को अपने साथ जोड़ रखा है.

बसपा के कांशीराम भी कभी संघ के कार्यों से प्रभावित हुए थे लेकिन जब विचार नहीं जमे तो उन्होंने संघ से किनारा करते हुए बहुजन समाज पार्टी का विकल्प दिया. हालांकि वहां भी उन्होंने संघ के समतामूलक समाज या दलितों को हिन्दु समाज की मुख्य धारा से जोडऩे का ही काम किया. यह स्वागतेय है कि मायावती भी उसी विजन के साथ आगे बढ़ रही हैं. नानाजी देशमुख ने चित्रकूट में जो प्रकल्प खड़ा किया या दत्तोपंत ठेंगड़ी ने जिस तरह मजदूरों के लिये काम किया, वह भी आरएसएस से ही प्रेरित रहे. देश से लेकर विदेश तक में ना सिर्फ आरएसएस खड़ा हुआ बल्कि विद्या भारती (सरस्वती शिशु मंदिर), विश्व हिन्दु परिषद, मजदूर संघ, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, स्वदेशी जागरण मंच, वनवासी कल्याण आश्रम, सेवा भारती, ग्राम भारती इत्यादि विशालकाय संगठन खड़े किये जिन्होंने जमीन से जुडक़र काम खड़ा और करोड़ों दिलों में देशभक्त संगठन के तौर पर अपनी अमिट पहचान कायम की. चाहे गांधीजी की हत्या हो या फिर भारतीय लोकतंत्र का काला अध्याय आपातकाल, नेहरू युग से लेकर हाल के सोनिया युग तक आरएसएस को बदनाम करने, रोकने की कई साजिशें रची गई, रची जा रही हैं लेकिन संघ ने इसकी परवाह कभी नहीं की.

कभी समय मिले तो छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा में होकर आइयेगा. आरएसएस के एक प्रचारक ने सालों पूर्व वहां जिस कुष्ठ आश्रम की शुरूआत की, आज वह विशालकाय वटवृक्ष बन चुका है. दस हजार से ज्यादा कुष्ठ रोगी अपना इलाज करा चुके हैं. जशपुर, रायपुर और बस्तर में आदिवासियों के लिये जो वनवासी कल्याण आश्रम चलाये जा रहे हैं, उनमें आदिवासियों का भरोसा जबरदस्त ढंग से जमा है. यह तो एक उदाहरण है. पूरे देश में संघ ऐसे हजारों प्रकल्प चला रहा है. क्या कांग्रेस या उसके मातहत काम कर रहे संगठनों ने कभी इस तरह के प्रकल्प चलाने की कोशिश की? महात्मा गांधी से लेकर अम्बेडकर तक संघ के शिविरों में पहुुंचे. वहां का दृश्य देखकर उन्होंने स्वीकारा कि जिस समतामूलक समाज की कल्पना वे करते हैं, संघ उसकी बेहतर नर्सरी साबित हो सकता है.

संघ रूपी बैसाखियों का सहारा लेकर जहां एक तरफ भाजपा मजबूत होती चली गई तो दूसरी ओर जंग लगी और मुरझाई सोच का प्रयोग करते हुए कांग्रेस अपना परम्परागत वोटबैंक खोती गई बल्कि अपनी जड़ों से कटती चली गई. उदाहरण के तौर पर कांग्रेस आरएसएस को मुस्लिमों का विरोधी बताते रही है मगर दो साल पहले संघ के समर्थन से मुस्लिम राष्ट्रीय मंच प्रारंभ हुआ तो उसे जबरदस्त सफलता मिली. शुरू में मुसलमान हिचके जरूर लेकिन बाद में उन्हें समझ में आ गया कि मन और दिमाग में छाई धुंध को साफ करना ही होगा. आज हजारों मुसलमान मंच से जुड़े चुके हैं. उन्हें समझ में आने लगा है कि धर्मनिरपेक्षता का चोला ओढक़र कांग्रेस सहित दूसरे राजनीतिक दल महज वोटबैंक की खातिर संघ का हौव्वा दिखाते रहे.

ताजा चुनाव इसके सबसे बड़े प्रतीक बनकर उभरे हैं. अभी राजस्थान में कांग्रेस ने 14 मुस्लिमों को विधानसभा के टिकट दिये लेकिन जीते एक भी नहीं. जबकि मध्य प्रदेश चुनाव में भाजपा ने चार मुस्लिमों को टिकट दिये जिनमें से दो जीतकर आ गये. संदेश स्पष्ट है कि मुसलमानों को भी कांग्र्रेस पर भरोसा नहीं रहा क्योंकि सालों तक उन्हें सिर्फ वोटबैंक समझा गया. शिशु मंदिरों से हजारों मुस्लिम बच्चे पढक़र निकलते हैं लेकिन उन्हें शिशु मंदिर कभी साम्प्रदायिक नहीं लगा. बात को लम्बा खींचने के बजाय शार्टकट में यह समझने की कोशिश करते हैं कि मात्र अल्पसंख्यकों की बात कहके कांग्रेस जिस तरह बहुसंख्यकों को नजरअंदाज कर रही है, उसका खामियाजा उसे कदर भुगतना पड़ रहा है?

संघ तो कबका ऐलान कर चुका है कि यदि कांग्रेस राष्ट्रवाद और हिन्दुत्व की चिंता करने लग जाये तो वह भी हमारा समर्थन ले सकती है. यकीन मानिए कि कांग्रेस का बुनियादी ढांचा अभी भी जमींदोज नहीं हुआ है लेकिन उसे खाद, पानी देने की जरूरत है. आज भी कांग्रेस अराजकता, अलगाववाद, आर्थिक आजादी और भारत को महाशक्ति बनाने के सपने के साथ समाज के सबसे निचले तबके तक जा सकती है लेकिन इसके लिये खुद आलाकमान को पहल करनी होगी. उसे पहला संदेश यह देना होगा कि वह सिर्फ अल्पसंख्यकों के लिये नहीं बल्कि पूरे देश की चिंता करती है. जैसे नरेन्द्र मोदी कहते हैं कि करोड़ों गुजरातियों की चिंता करता हूं.

सिर्फ भाजपा या आरएसएस ही क्यों? वामपन्थी या दक्षिणपंथी पार्टियों को देख लीजिये. द्रमुक से लेकर अन्नाद्रमुक और तृणमूल से लेकर कांशीराम-मायावती तक, सभी ने मेहनत से, नीतियों से अपनी पार्टियों को खड़ा किया जो आपकी छाती पर मूंग दल रही हैं. बसपा सहित इन सभी का वोट बैंक जिस तरह पूरे देश में बढ़ रहा है, कांग्रेस को उससे सीख लेने की जरूरत है. कांग्रेस को एक बार फिर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की ओर लौटना होगा. उसे अपनी जड़ों को सींचना होगा. उसका सपना यदि आरएसएस को पछाडऩा है तो मैं इसमें आरएसएस की हार नहीं देख रहा हूं बल्कि मन में एक उम्मीद जगी है कि कांग्रेस वाकई भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस होने जा रही है!

अनिल द्विवेदी
(लेखक राजनीतिक टिप्पणीकार हैं)

Thursday, August 15, 2013

अब दाँव पर मूछें कौन लगायेगा

‘आइ एम द किंग ऑफ रियासत बट दिस परसन इज द किंग ऑफ डेमोक्रेसी’ यानि मैं तो एक रियासत का राजा हूं लेकिन जूदेव लोकतंत्र के राजा हैं क्योंकि इन्हें जनता ने चुनती है. राजस्थान के महाराजा ने अपने विदेशी मेहमानों से दिलीपसिंह जूदेव का परिचय कभी इसी अंदाज में करवाया था. रौबीले चेहरे की शान बन चुकी घनी मूंछों पर ताव देते शख्स के तौर पर, मेरी तरह हिन्दुस्तानियों को भी दो ही चेहरे नजर आते हैं. एक थे देश की आजादी के नायक चंद्रशेखर आजाद और दूसरे जशपुर नरेश दिलीप सिंह जूदेव, जो हमारे बीच अब नहीं रहे. नईदिल्ली के मेदांता अस्पताल में कई दिनों तक जिंदगी और मौत से संघर्ष करने के बाद उन्होंने अंतिम सांसें ली.

इस दु:ख भरे क्षण में ना चाहते हुए भी यह बात कहना पड़ रही है कि गुजरे कुछ समय से जशपुर राजघराने पर अपशकुनों की छाया मंडरा रही है. हम भूले नहीं हैं कि चंद महीनों पूर्व ही उन्होंने अपने बड़े बेटे शत्रुंजय प्रताप सिंह को अकाल मृत्यु के हाथों खोया था और चंद महीनों बाद ही माँ जयादेवी का हाथ भी उनके सर से उठ गया था. ढलती उम्र और छोटी-मोटी बीमारियों से जूझ रहे जूदेव को बड़े बेटे की मौत ने हिलाकर रख दिया था. दरअसल वे उनमें अपना राजनीतिक वारिस खोज रहे थे. सब कुछ ठीक-ठाक रहता तो बिलासपुर का अगला सांसद जूदेव नहीं बल्कि उनके सुपुत्र शत्रुंजय बनते. खुद जूदेव के जनाधार का आलम देखिये कि उनके नाम पर ‘जूदेव सेना’ तक बनाई गई लेकिन इसका इस्तेमाल उन्होंने अन्य राजनीतिज्ञों की तरह कभी भी पार्टी को ब्लैकमेल करने या किसी को सबक सिखाने के लिये नहीं किया.

भाजपा के लिये अपूरणीय क्षति और हिन्दुत्व रूपी राजनीति का कभी ना भरा जाने वाला शून्य. देश की सियासत से लेकर छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पाटी का जनाधार पैदा करने वालों में जिन नेताओं को खासा याद किया जायेगा, जूदेव उनमें से एक होंगे. शरीर पर फौजी वर्दी, हाथ में हिन्दुत्व का झंडा और इसाई मिशनरियों के पुराने प्रतिद्वंद्वी लेकिन हिन्दु ह्दय सम्राट के तौर पर अपनी पहचान कायम रखने वाले दिलीपसिंह जूदेव एक ऐसे नेता थे जिनके परिवार ने पहले जनसंघ और फिर भाजपा के लिये अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया. यह कहते हुए सुकून होता है कि संघर्षशील जनसंघ से लेकर भाजपा के राजशाही युग तक जूदेव की तीसरी पीढ़ी पार्टी की सेवा में वफादारी के साथ लगी है. बहुत कम लोग जानते होंगे कि 1970 के दशक में-जब देश में एक ही पार्टी कांग्रेस का जलवा था-जूदेव के पिताजी ने मात्र एक रात के फैसले में जनसंघ की तरफ से सांसद का चुनाव लडऩे का फैसला स्वीकार किया बल्कि पूंजी लगाकर दूसरे अन्य प्रत्याशियों का हौंसला बढ़ाया. जूदेव पर परिवारवाद के लाख आरोप लगे हों लेकिन आईना दिखाता सच यह है कि राजाजी ने कई गरीब-गुरबों को फर्श से उठाकर अर्श तक पहुंचाया और मंत्री, विधायक व सांसद की कुर्सी दिलवाई.

एशिया का सबसे प्राचीनतम चर्च जशपुर में है तो अंदाजा लगाइये कि यहां पर चर्च की जड़ें कितनी मजबूत होंगी लेकिन जूदेव होश संभालते ही उनके लिए हमेशा अजेय चुनौती बने रहे. हिन्दु से इसाई बन गये लाखों लोगों को पुन: हिन्दु धर्म में लाने के लिये उन्होंने लम्बी-चौड़ी लड़ाईयां इतने प्रभावी ढंग से लड़ी कि 1988 के आसपास जशपुर की एक नन-मिशनरियों की महिला संत-को अदालत ने जिलाबदर कर दिया था.  आदिवासियों के पैर धोकर उन्हें पुन: घर-वापसी कराते हुए देखने पर यकीन नहीं होता था कि एक राजा के मन में हिन्दुत्व के प्रति कितनी श्रद्धा और विश्वास था. अब जबकि जूदेव नहीं हैं, संघ परिवार सहित हिन्दु समाज के समक्ष यह संकट आन पड़ा है कि घर वापसी अभियान की कमान किसके हाथों में होगी?

जशपुर नरेश जूदेव ताउम्र राजा की तरह जिए, राजा की तरह दहाड़े और उनकी विदाई भी राजा की तरह हुई. राजनैतिक नुमाइंदे भूले ना होंगे कि अपने राजनैतिक कैरियर की शुरूआत में उन्होंने पहला चुनाव अर्जुनसिंह के खिलाफ दमदारी से लड़ा था और उनके ‘चेले-चपाटों’ से अब तक लड़ते रहे. यह कतई छुपा नहीं है कि जोगी और जूदेव परंपरागत राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी बनकर एक-दूसरे को पछाड़ते रहे लेकिन राजनीतिक कड़ुवाहट के लिये जूदेव के मन और जुबान में कोई भेद ना था. पिछले लोकसभा चुनाव में जब उन्होंने डॉ. रेणु जोगी को हराया तो भावनाओं के प्रगटीकरण में वे मुझसे यह कहना नहीं भूले कि ‘यदि मैं हार भी जाता तो रेणु जोगी जैसी महिला से हारने का संतोष होता.‘
   
जूदेवजी दिल से राजा थे. सडक़ से लेकर संसद तक, आम से लेकर खास तक से खुद आगे बढक़र हाथ मिलाने की उनकी अदा लोगों का दिल जीतती थी. उनकी राजनीतिक पहुंच का असर देखिये कि एनडीए सरकार जाने के बाद जब यूपीए सरकार सत्ता में आई तो छत्तीसगढ़ के एक वरिष्ठ भाजपा सांसद का सामान बंगले से उठाकर बाहर फेंकवा दिया गया मगर जूदेव ताउम्र रकाबगंज स्थित अपने उसी बंगले में रहे जो उन्हें केंद्रीय राज्यमंत्री रहते हुए आबंटित हुआ था!  दोस्ती निभाने में या मेहनमानवाजी करने में उनका कोई मुकाबला नहीं था. जिस स्टिंग ऑपरेशन ने उनके राजनैतिक कैरियर पर काला धब्बा लगा दिया, उस साजिश के तथाकथित दोषी नटवर रतेरिया को-परिवार और मित्रों के लाख विरोध के बावजूद-अपने से कभी जुदा नहीं होने दिया. हालांकि इस बड़ी चूक ने उनके मुख्यमंत्री बनने के सपने को चकनाचूर कर दिया. सिद्धांतों और पार्टी की इज्जत के लिये जूदेव ‘सिंह’ की तरह लड़े. सन् 2003 में जोगी सरकार के खिलाफ ताल ठोंकने की बारी आई तो उन्होंने अपनी मूंछें दांव पर लगाकर पार्टी को ऐतिहासिक जीत दिलवाई.

अपने हमसफरों के लिये वे किसी भी स्तर की लड़ाई लड़ लेते थे. राज्य में भाजपा की सरकार दस सालों से चल रही है और मंत्रियों से लेकर मुख्यमंत्री तक से उनके कई मतभेद थे मगर पार्टी की इज्जत की खातिर दिलीप ंिसह जूदेव ने सार्वजनिक तौर पर कभी खुलकर कुछ नहीं कहा. मगर पिछले साल ही उनके बिलासपुर के एक समर्थक पर जब पुलिसिया अत्याचार हुआ और सरकार ने उनकी बातों पर कान नहीं धरे तो जूदेव प्रशासनिक आतंकवाद के खिलाफ जमकर दहाड़े. हमारे अजीज जूदेवजी तो चले गये लेकिन युद्धवीर सिंह के लिये एक निर्मम सच्चाई यह है कि वे एक ऐसे कुरूक्षेत्र में खड़े हैं जहां परिवार से लेकर क्षेत्र की जनता के लिए, अपने राजनैतिक कैरियर और पिता के सपनों को पूरा करने के लिए हर मोर्चे पर लडऩा-जीतना होगा. उम्मीद की छतरी हमने भी तानी है कि अपने नाम के मुताबिक युद्धवीर, इस महासमर में विजयी होकर निकलेंगे. गम और संकट की इस घड़ी में फिलहाल एक ही वादा : हम आपके साथ है!

अनिल द्विवेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार और शोधार्थी हैं.