विषम कोण :
तकनीक के आगे हारी नैतिकता ?
रोहित बनाम एनडी तिवारी के मामले में यह साबित हो चुका है कि जब नैतिक-धर्म कमजोर पड़ जाता है तो विज्ञान ना सिर्फ उम्मीद के तौर पर आपके साथ है बल्कि वह दूध का दूध और पानी का पानी करने की क्षमता भी रखता है. डीएनए जांच से ही साबित हुआ कि रोहित के गुणसूत्र तिवारी से मेल खाते हैं! इसके बाद तिवारी ने आत्मसमर्पण कर दिया. विज्ञान और रोहित के हौसलों के आगे नैतिक धर्म की हार हुई है!
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पुरानी कथा है. राजा उत्तानपाद की दो पत्नियां सुनीति और सुरूचि थी जिन्हें सुनीति से धु्रव और सुरूचि से उत्तम नामक पुत्र प्राप्त हुए थे. वैसे तो सुनीति बड़ी रानी थी लेकिन राजाजी का दिल सुरूचि के लिये ज्यादा धडक़ता था. एक दिन धु्रव राजा की गोद में बैठे खेल रहा था तभी छोटी रानी सुरूचि वहां आई और उसने ध्रुव को पिता की गोद से उतारते हुए अपने पुत्र को राजा की गोद में बैठाते हुए ध्रुव से कहा : तू मेरी कोख से पैदा नहीं हुआ है इसलिए उनकी गोद में या राजसिंहासन में बैठने का अधिकार तुझे नहीं है.. कहानी का अंत और निष्कर्ष दूसरी तरह का है लेकिन यहां इसका जिक्र हम नारायण दत्त तिवारी और उनके बेटे रोहित शेखर के बीच जारी विवाद से जोडक़र देखना चाहते हैं.
नैतिकता खखारने वालों के लिये यह अतिश्योक्ति कदापि नहीं होगी कि पूर्व मुख्यमंत्री, 87 साल के नारायण दत्त तिवारी के बेटे रोहित ने जो लड़ाई लड़ी, वह धु्रुव की लड़ाई से ज्यादा सम्मानीय है. सराहनीय भी है और प्रेरणास्पद भी. पैंतीस साल तक लावारिस होने का दंश झेल रहे रोहित ने ना सिर्फ पितृ-सुख हासिल करने का अधिकार हासिल किया बल्कि सालों से सुहाग के नाम से वंचित अपनी माँ को भी न्याय दिलाया. जिस समाज के अजीबोगरीब तर्कों के आगे भगवान राम तक ने घुटने टेक दिये (सीता की अगिनपरीक्षा) उस कलियुगी समाज में सालों तक किसी महिला का बिना पति के अकेले गुजर-बसर करना कितना त्रासद भरा रहा होगा, इसका दर्द उस माँ से ज्यादा भला कौन महसूस कर सकता है? या बिना पिता का नाम लिये दोस्तों के बीच उठना-बैठना, मार्कशाीट तक में पिता के नाम के लिये तरसना, रोहित के लिये कितना अपमानजनक रहा होगा, सहज अंदाजा लगाया जा सकता है.
ऐसा नहीं है कि रोहित शेखर की माँ ने पति का अधिकार हासिल करने के लिये अनुनय-विनय नहीं किया होगा मगर एक शक्तिशाली राजनीतिज्ञ का नशा तिवारी पर इस कदर चढ़ा था कि उन्होंने इस अबला की दलीलें कई बार खारिज कर दी. एक बार तो उनके बंगले में ही खासा विवाद हुआ था. रोहित की मां उज्जवला शर्मा, पूर्व केन्द्रीय मंत्री प्रो. शेरसिंह की पुत्री हैं और तिवारी जब उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री थे, तब उनके संपर्क में आई थीं. चंद मुलाकातों में ही दोनों के बीच रिश्ते बन गये. सत्ता की संवेदनाओं की बंजर जमीन पर पकती आंकांक्षा और उत्तेजना की फसल से बेखबर, एनडी ने उनकी काफी मदद भी की और इतना शक्तिशाली बना दिया था कि उज्जवला के बिना सीएम हाउस का पत्ता तक नहीं खडक़ता था लेकिन जब वे गर्भवती हुईं तो तिवारी ने उन्हें शादीशुदा होने का हवाला देते हुए अपनाने से साफ इंकार कर दिया.
बहस-तर्क और परेशानी झेलने के बाद भी जब ढीठ राजनीतिक एनडी तिवारी नहीं माने तो रोहित पितृत्व हासिल करने और मां को उसका पति-अधिकार दिलाने के लिये न्यायालय की शरण में चले गये. जिरह के दौरान न्यायालय ने जब डीएनए टेस्ट करने का आदेश दिया तो राजनीतिक दर्शन का मुलम्मा चढ़ाकर अब तक बचते आये रसिकमिजाज तिवारी अंतत: उन्हें यह टेस्ट देना पड़ा. उसके बाद आई रिपोर्ट में यह साफ हो गया कि तिवारी ही रोहित के पिता हैं!
सत्ता के बाएँ रहने वाले लोग मानते हैं कि तिवारी की रासलीलाओं का खेल नया नहीं है. यह तब से चल रहा है जब वे पहली बार विधायक और मुख्यमंत्री बने. पहले उत्तरप्रदेश और अब उत्तराखण्ड में उनके रसिकमिजाज के चटखारे लोग लेते ही रहते हैं. उत्तराखण्ड का मुख्यमंत्री बनने के बाद तिवारी की लीलाएं जारी रहीं. स्टैला डेविड कांड लोग भूले नहीं हैं. उनके वर्षों पुराने एक निजी सचिव को संदिग्ध परिस्थितियों में बाथरूम में मृत अवस्था में पाया गया था लेकिन मामला मीडिया प्रबंधन के जरिए हवा-हवाई हो गया. हालांकि तिवारी, अमरमणि, मदेरणा, चंद्रभान या गोपाल काण्डा की तरह दोगले नही हैं जो प्यार के नाम पर अवैध संबंधों का खेल खेलते हैं, फिर प्रेमिका को या तो मरवा देते हैं या आत्महत्या के लिये विवश कर देते हैं लेकिन पाप छुपाने का प्रयास तो तिवारी ने बेशर्मी की हद तक किया ही.
विकासशील दौर में यह बहस अभी भी जिंदा है कि विज्ञान बड़ा या धर्म लेकिन रोहित बनाम एनडी तिवारी के मामले में यह साबित हो चुका है कि जब नैतिक-धर्म कमजोर पड़ जाता है तो विज्ञान ना सिर्फ उम्मीद के तौर पर आपके साथ है बल्कि वह दूध का दूध और पानी का पानी करने की क्षमता भी रखता है. रोहित-एनडी तिवारी प्रकरण का सत्य उजागर करने में डीएनए यानि जीवनसूत्र नामक चिकित्सा तकनीक की अहम भूमिका रही है. आयु के साथ व्यक्ति के डीएनए यानि जीवन-सूत्र में कोई बदलाव नहीं आता है अत: जन्म से मृत्यु पर्यंत डीएनए एक सा ही रहता है. अपने जैविक माता-पिता से प्राप्त इस जीवन-सूत्र में छिपी हुई सूक्ष्म विभिन्नताओं के आधार पर प्रत्येक जीव को किसी भी अन्य जीव से अलग पहचाना जा सकता है. रोहित को उसका पितृत्व अधिकार दिलाने में इसी तकनीक ने अहम भूमिका अदा की. न्यायालय के निर्देश पर हुई डीएनए जांच में स्पष्ट हो गया कि रोहित के गुणसूत्र तिवारी से मेल खाते हैं! इसके बाद तिवारी ने आत्मसमर्पण कर दिया. साफ है कि विज्ञान और रोहित के हौसलों के आगे नैतिक धर्म की हार हुई है!
अनिल द्विवेदी
(लेखक रिसॅर्च स्कॉलर हैं)
तकनीक के आगे हारी नैतिकता ?
रोहित बनाम एनडी तिवारी के मामले में यह साबित हो चुका है कि जब नैतिक-धर्म कमजोर पड़ जाता है तो विज्ञान ना सिर्फ उम्मीद के तौर पर आपके साथ है बल्कि वह दूध का दूध और पानी का पानी करने की क्षमता भी रखता है. डीएनए जांच से ही साबित हुआ कि रोहित के गुणसूत्र तिवारी से मेल खाते हैं! इसके बाद तिवारी ने आत्मसमर्पण कर दिया. विज्ञान और रोहित के हौसलों के आगे नैतिक धर्म की हार हुई है!
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पुरानी कथा है. राजा उत्तानपाद की दो पत्नियां सुनीति और सुरूचि थी जिन्हें सुनीति से धु्रव और सुरूचि से उत्तम नामक पुत्र प्राप्त हुए थे. वैसे तो सुनीति बड़ी रानी थी लेकिन राजाजी का दिल सुरूचि के लिये ज्यादा धडक़ता था. एक दिन धु्रव राजा की गोद में बैठे खेल रहा था तभी छोटी रानी सुरूचि वहां आई और उसने ध्रुव को पिता की गोद से उतारते हुए अपने पुत्र को राजा की गोद में बैठाते हुए ध्रुव से कहा : तू मेरी कोख से पैदा नहीं हुआ है इसलिए उनकी गोद में या राजसिंहासन में बैठने का अधिकार तुझे नहीं है.. कहानी का अंत और निष्कर्ष दूसरी तरह का है लेकिन यहां इसका जिक्र हम नारायण दत्त तिवारी और उनके बेटे रोहित शेखर के बीच जारी विवाद से जोडक़र देखना चाहते हैं.
नैतिकता खखारने वालों के लिये यह अतिश्योक्ति कदापि नहीं होगी कि पूर्व मुख्यमंत्री, 87 साल के नारायण दत्त तिवारी के बेटे रोहित ने जो लड़ाई लड़ी, वह धु्रुव की लड़ाई से ज्यादा सम्मानीय है. सराहनीय भी है और प्रेरणास्पद भी. पैंतीस साल तक लावारिस होने का दंश झेल रहे रोहित ने ना सिर्फ पितृ-सुख हासिल करने का अधिकार हासिल किया बल्कि सालों से सुहाग के नाम से वंचित अपनी माँ को भी न्याय दिलाया. जिस समाज के अजीबोगरीब तर्कों के आगे भगवान राम तक ने घुटने टेक दिये (सीता की अगिनपरीक्षा) उस कलियुगी समाज में सालों तक किसी महिला का बिना पति के अकेले गुजर-बसर करना कितना त्रासद भरा रहा होगा, इसका दर्द उस माँ से ज्यादा भला कौन महसूस कर सकता है? या बिना पिता का नाम लिये दोस्तों के बीच उठना-बैठना, मार्कशाीट तक में पिता के नाम के लिये तरसना, रोहित के लिये कितना अपमानजनक रहा होगा, सहज अंदाजा लगाया जा सकता है.
ऐसा नहीं है कि रोहित शेखर की माँ ने पति का अधिकार हासिल करने के लिये अनुनय-विनय नहीं किया होगा मगर एक शक्तिशाली राजनीतिज्ञ का नशा तिवारी पर इस कदर चढ़ा था कि उन्होंने इस अबला की दलीलें कई बार खारिज कर दी. एक बार तो उनके बंगले में ही खासा विवाद हुआ था. रोहित की मां उज्जवला शर्मा, पूर्व केन्द्रीय मंत्री प्रो. शेरसिंह की पुत्री हैं और तिवारी जब उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री थे, तब उनके संपर्क में आई थीं. चंद मुलाकातों में ही दोनों के बीच रिश्ते बन गये. सत्ता की संवेदनाओं की बंजर जमीन पर पकती आंकांक्षा और उत्तेजना की फसल से बेखबर, एनडी ने उनकी काफी मदद भी की और इतना शक्तिशाली बना दिया था कि उज्जवला के बिना सीएम हाउस का पत्ता तक नहीं खडक़ता था लेकिन जब वे गर्भवती हुईं तो तिवारी ने उन्हें शादीशुदा होने का हवाला देते हुए अपनाने से साफ इंकार कर दिया.
बहस-तर्क और परेशानी झेलने के बाद भी जब ढीठ राजनीतिक एनडी तिवारी नहीं माने तो रोहित पितृत्व हासिल करने और मां को उसका पति-अधिकार दिलाने के लिये न्यायालय की शरण में चले गये. जिरह के दौरान न्यायालय ने जब डीएनए टेस्ट करने का आदेश दिया तो राजनीतिक दर्शन का मुलम्मा चढ़ाकर अब तक बचते आये रसिकमिजाज तिवारी अंतत: उन्हें यह टेस्ट देना पड़ा. उसके बाद आई रिपोर्ट में यह साफ हो गया कि तिवारी ही रोहित के पिता हैं!
सत्ता के बाएँ रहने वाले लोग मानते हैं कि तिवारी की रासलीलाओं का खेल नया नहीं है. यह तब से चल रहा है जब वे पहली बार विधायक और मुख्यमंत्री बने. पहले उत्तरप्रदेश और अब उत्तराखण्ड में उनके रसिकमिजाज के चटखारे लोग लेते ही रहते हैं. उत्तराखण्ड का मुख्यमंत्री बनने के बाद तिवारी की लीलाएं जारी रहीं. स्टैला डेविड कांड लोग भूले नहीं हैं. उनके वर्षों पुराने एक निजी सचिव को संदिग्ध परिस्थितियों में बाथरूम में मृत अवस्था में पाया गया था लेकिन मामला मीडिया प्रबंधन के जरिए हवा-हवाई हो गया. हालांकि तिवारी, अमरमणि, मदेरणा, चंद्रभान या गोपाल काण्डा की तरह दोगले नही हैं जो प्यार के नाम पर अवैध संबंधों का खेल खेलते हैं, फिर प्रेमिका को या तो मरवा देते हैं या आत्महत्या के लिये विवश कर देते हैं लेकिन पाप छुपाने का प्रयास तो तिवारी ने बेशर्मी की हद तक किया ही.
विकासशील दौर में यह बहस अभी भी जिंदा है कि विज्ञान बड़ा या धर्म लेकिन रोहित बनाम एनडी तिवारी के मामले में यह साबित हो चुका है कि जब नैतिक-धर्म कमजोर पड़ जाता है तो विज्ञान ना सिर्फ उम्मीद के तौर पर आपके साथ है बल्कि वह दूध का दूध और पानी का पानी करने की क्षमता भी रखता है. रोहित-एनडी तिवारी प्रकरण का सत्य उजागर करने में डीएनए यानि जीवनसूत्र नामक चिकित्सा तकनीक की अहम भूमिका रही है. आयु के साथ व्यक्ति के डीएनए यानि जीवन-सूत्र में कोई बदलाव नहीं आता है अत: जन्म से मृत्यु पर्यंत डीएनए एक सा ही रहता है. अपने जैविक माता-पिता से प्राप्त इस जीवन-सूत्र में छिपी हुई सूक्ष्म विभिन्नताओं के आधार पर प्रत्येक जीव को किसी भी अन्य जीव से अलग पहचाना जा सकता है. रोहित को उसका पितृत्व अधिकार दिलाने में इसी तकनीक ने अहम भूमिका अदा की. न्यायालय के निर्देश पर हुई डीएनए जांच में स्पष्ट हो गया कि रोहित के गुणसूत्र तिवारी से मेल खाते हैं! इसके बाद तिवारी ने आत्मसमर्पण कर दिया. साफ है कि विज्ञान और रोहित के हौसलों के आगे नैतिक धर्म की हार हुई है!
अनिल द्विवेदी
(लेखक रिसॅर्च स्कॉलर हैं)
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