II गंगा स्नान II
प्रदेश की लगभग सवा दो करोड़ की आबादी ने अगले पांच सालों के लिए शहर-सरकार और अपने खैरख्वाहों को चुनते हुए आखिर अपना फैसला सुना ही दिया। महज चंद सालों में ही शक और असुरक्षा का जो माहौल पूरे राज्य में पनपा है, जनता ने इसी के दण्डस्वरूप भाजपा को सबक सिखाते हुए कांग्रेस पर भरोसा जताया है। बढ़ता नक्सलवाद, स्वास्थ्यगत लापरवाहियों से होती निर्दोष मौतें, राशन कार्ड निरस्तीकरण, पिछड़ा वर्ग का 4 प्रतिशत आरक्षण, पर्दाफाश होते भ्रष्टाचारी ये ऐसे कारण रहे जिनके चलते जनता अंदर ही अंदर उबलती रही मगर सरकार इस गुस्से की थाह नहंी पा सकी।
इन परिणामों में तमाम तरह के संदेश छुपे हैं। पहला संदेश उन कामचोर, नाकारा और भ्रष्टाचारी लोगों के लिए है जिन्हें नकारते हुए रायगढ़ की जनता ने एक वृहन्नला को अपना महापौर चुन लिया। तस्वीर साफ है कि आप जनता का नेतृत्व कर रहे हैं तो मर्दों की तरह काम करिए अन्यथा मधु किन्नर जैसा विकल्प मौजूं है। हालांकि राजधानी रायपुर सहित पूरे प्रदेश में कई पार्षद ऐसे हैं जो लगातार तीसरी-चौथी बार चुनकर आए हैं। ऐसे नेता पार्टी की नाक साबित हुए हैं। उन्हें बधाईयां और शुभकामनाएं!
पहले बात कांग्रेस की। नक्सली हमले से कमजोर हुई पार्टी को जब विधानसभा-लोकसभा चुनावों में भी हार का सामना करना पड़ा तो पूरी पार्टी मानो मनोबल खो चुकी थी मगर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल और नेता प्रतिपक्ष टी.एस. सिंहदेव ने परिस्थितियों को नाप-तौलकर, बड़ा दिल रखकर, टीम-वर्क के साथ सरकार के खिलाफ जो आंदोलन छेड़ा, या जो आत्मविश्वास संगठन में भरा, यह जीत उसी का नतीजा है। पार्टी ने इस बार चार नगर निगम सहित पूरे प्रदेश में सम्माजनक विजय हासिल की है। यहां पर बड़ी चुनौती यह है कि रमन सरकार ने विकास की जो लकीर खींची है, आप उससे बड़ी लकीर खींचकर दिखाएं क्योंकि आगे और भी इम्तिहान होना है।
इस जीत से कांगे्रेस और उसके कार्यकर्ता उर्जावान हुए हैं और भरोसा हो गया है कि पार्टी सत्ता में आ सकती है। आगे इस विश्वास को मजबूती के साथ बनाए रखने की जरूरत है। जहां तक जोगीरूपी चुनौती का सवाल है, आप उन्हें नजरअंदाज नहीं कर सकते। ना भूलें कि उन्होंने बिलासपुर सीट पर तय उम्मीदवार का विरोध किया था और पार्टी वहां हार गई है, सो जोगी और पार्टी एक-दूसरे के महत्व को बखूबी समझें और आगे बढ़ें। पार्टी को नोट कर लेना चाहिए कि उसके परंपरागत वोट बैंक-सतनामी मुस्लिम आदिवासी, जिस पर भाजपा ने सेंध लगाई है-को वापस पाना होगा। रही बात फूल-छाप नेता और कार्यकर्ताओं की तो उनसे भूपेश बघेल ने निबटना बखूबी सीख ही लिया है!
ताजा चुनाव परिणामों से भाजपा सकते में है। बुनियादी और गहरा सवाल यह है कि बेहतर सुराज देने का दावा करने वाली भाजपा को जनता ने खारिज क्यों किया या कांग्रेस पर भरोसा क्यों जन्मा? पिछले 11 सालों तक प्रदेश का अटल चेहरा बने, जनता का दिल जीतने वाले मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह देश में ऐसे मुख्यमंत्री के तौर पर पहचाने जाते हैं जो अभी तक बेदाग बने हैं। उनका विजन और योजनाओं ने इस राज्य को विकास के शिखर पर पहुंचाया है। खुद कांग्रेस की सरकार ने उन्हें दो दर्जन से ज्यादा पुरस्कार दिए। फिर क्या कारण रहे कि पार्टी जनता के नजरों से उतरती जा रही है? वस्तुत: पिछले कुछ सालों में नैतिकता की सीमा तक सरकार में जो भ्रष्टाचार पनपा, लालफीताशाही जन्मी, अफसरराज आया, उस पर यदि नकेल कसी जाती, मौत के सौदागरों के हाथों होती निर्दोष मौतों पर लगाम लगती या भ्रष्टाचार के धनकुबेरों को जेल में डाला जाता और कार्यकर्ताओं को सरकार में एक व्यक्ति-एक पद के मुताबिक तवज्जो मिलती तो पार्टी को यह दिन ना देखने पड़ते।
अगर नरेन्द्र मोदी सहित पूरी पार्टी यह दावा करती है कि भाजपा में व्यक्ति नहीं पार्टी चुनाव लड़ती है तो यह दावा रायपुर में धराशायी हो चुका है। यहां पार्टी लगातार दूसरी बार महापौर चुनाव में धराशायी हुई है। साफ है कि पार्टी-हित के आगे पार्टी गौंण हो चुकी है। ऐसा नहीं है कि पार्टी के पास जीतने लायक चेहरे ही नहीं बचे लेकिन संगठन में प्रभावी कुछ रसूखदारों को इन चेहरों के बलवान होने से अपनी सत्ता खतरे में दिखती है इसलिए चालाकीपूर्वक इन्हें दरकिनार कर रहे हैं और खामियाजा पार्टी भुगत रही है।
इसकी शुरूआत 2009 के चुनावों में ही हो गई थी जब कांग्रेस ने तीन नगर निगम हथियाए थे लेकिन सरकार नहीं चेती। तारीफ करना होगी स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल के नेतृत्व की कि नसबंदी काण्ड के चलते पूरे देश में आलोचना का केन्द्र बनने के बावजूद उन्होंने बेहतर नेतृत्व किया और बिलासपुर में पार्टी का महापौर चुनवाकर आलोचकों का मुंह बंद कर दिया। कार्यकर्ता महसूस करते हैं कि पिछले पांच साल में कमजोर और थके चेहरों के चलते जिला संगठन भी धराशायी होता जा रहा है जिसे फिर से ऑक्सीजन देने की जरूरत है। टिकट बंटने तक पार्टी की वार्ड बैठकें तक नहीं हो सकी। यही हालात अम्बिकापुर, चिरमिरी, जांजगीर, रायगढ़ में भी दिखाई दिए। आने वाले समय में पार्टी की परीक्षा पंचायत और मंडी चुनावों में भी होनी है इसलिए जरूरत इस बात की है कि भूल और चूकों के वास्तविक कारणों का हल निकाला जाए। अहंकार के घोंघे को तोड़कर दोस्ताना और विद्वतापूर्ण ढंग से पार्टी में संवाद स्थापित हो। जनता के सरोकारों, उनकी तकलीफों को गंभीरता से लें और उसी के मुताबिक फैसले भी करें ताकि रामराज सुराज महसूस हो सके।
अनिल द्विवेदी
( लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं )
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