Tuesday, May 5, 2015

पानी दे मौला, शराब नहीं


मुद्दा : आइपीएल क्रिकेट मैचों में वीआईपीज को शराब परोसने का. 

II गंगा स्नान II

"ये अक्ल वाले नही अहले दिल समझते हैं, क्यों शराब से पहले वुजू जरुरी है"

राज्य सरकार में ईमानदार मंत्री के रूप में ख्यात मगर इस बार विधायक का चुनाव हार चुके एक वरिष्ठ भाजपा नेता ने फोन किया और एक ही सांस में बहुत कुछ खरी-खोटी सुनाते चले गए। कहा कि आप लोग ना जाने किस-किस मुद्दे पर कलम चलाते हैं मगर जब ेेजनहित की बात हो तो स्याही क्यों सूख जाती है? वे मुझे सुनाते रहे और मैं सुनते हुए, सम्मान देते हुए मुस्कुराता रहा। प्यारभरी डांट में लिपटी मुद्दे की बात यह रही कि श्रीमान को यह गंवारा नहीं था कि जिस राज्य में आंशिक शराबबंदी हो, वहां सरकार के नियम-कायदों को अंगूठा दिखाते हुए आगामी 9 और 12 मई को होने वाले आइपीएल मैचों में वीआईपीज को या कार्पोरेट लॉबी में कंपनियों की ओर से शराब परोसी जाए।

नेताजी यही नहीं रूके बल्कि अपनी विवशता समझाते हुए बोले, क्या हो गया है पार्टी और सरकार के सिद्धातों को या फिर आरएसएस के कर्णधारों को जिन्होंने कभी शराबबंदी लागू करने का प्रस्ताव सरकार के समक्ष रखा था, आज वे ऐसे खामोश हैं मानो शराब ना हुई, दूध की नदियां बहने वाली हैं। वे यहीं नहीं रूके। बोले, चलो हमारी तो मजबूरी है कि अपनी ही सरकार में रहकर अपनों के खिलाफ कौन बोले या लड़े? लेकिन मीडिया किस दबाव में है जो इस कुप्रथा का विरोध तक नहीं कर सकता। चूंकि मुद्दा वाकई सरकार की नीतियों को ठेंगा दिखाने और जनहित के स्वास्थ्य से जुड़ा है इसलिए मैंने नेताजी से सिर्फ इतना ही कहा कि कल का अखबार देख लीजिएगा।

अब वादा किया है तो निभाना पड़ेगा ही। इसमें दो राय नही है कि मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह देश के उन चुनिंदा मुख्यमंत्रियों में शुमार हैं जिन्होंने यह जानते हुए भी कि प्रदेश के राजस्व का लगभग 20 प्रतिशत खजाना शराब बिक्री से आता है--ने बड़े साहस के साथ फैसला लेते हुए शराबबंदी की ओर कदम बढ़ाए। खासकर महिलाओं की व्यथा और दशा को समझते हुए उन्होंने यह कानून भी बना डाला कि जिस इलाके की 55 प्रतिशत महिलाएं शराबभट्टी का विरोध करेंगी, वहां से वह दुकान हटा दी जाएगी। आब.ए.आईना यह है कि राज्य में कोई 300 से अधिक शराब दुकानें बंद हो चुकी हैं। गुजरे दिनों महिलाओं के लम्बे विरोध के बाद राजधानी से लगे कुम्हारी इलाके में एक शराबभट्टी में ताला लग गया था।

फिलवक्त बड़ा और गहरा सवाल यह है कि क्या आइपीएल क्रिकेट मैचों का आयोजन हमारे लिए इतना ज्यादा प्रतिष्ठा का विषय बन गया है कि उसके लिए सारे नियम-कानूनों को धता बता दिया जाये? माना कि इसके आयोजन से छत्तीसगढ़ का नाम देश-दुनिया में गूंजता है। या एक बड़ा लालच यह भी है कि देश के कार्पोरेट जगत की निगाहें छत्तीसगढ़ की ओर दौड़ पड़ती हैं? लेकिन किसकी, कितनी कीमत चुकायेंगे, इसकी सीमा तो तय होनी ही चाहिए।

एनएसयूआई के नेता संजीव शुक्ला ने बड़ा सवाल खड़ा किया कि आज आईपीएल आयोजित करने वाली कंपनी जीएमआर ने छूट मांगी है, कल से राजधानी में कुकुरमुत्तों की तरह इवेंट आयोजित कर रही कंपनियां या फाइव स्टार हॉटल्स चाहेंगे कि उन्हें पार्टी या इवेंट्स में शराब परोसने की इजाजत दी जाए, तब कलेक्टर साहब के पास क्या जवाब होगा? वैसे भी कलेक्टर ने शराब परोसने की अनुमति किस आधार पर दी? उनसे अनुमति ली भी गई या नहीं, इन सारे प्रश्नों का जवाब जल्द तलाशना होगा। साफ है कि सरकार या अफसरशाही शराब लॉबी की गिरफ्त में है जो खुलेआम सरकारी पॉलिसी की धज्जियां उड़ते देखना चाहती है!

पिछली बार भी आईपीएल कराने वाली कंपनी को राज्य सरकार ने मनोरंजन टैक्स से छूट दे दी थी लेकिन यह नुकसान इसलिए मंजूर था क्योंकि बड़े फायदों के लिए छोटे नुकसान झेलने ही पड़ते हैं परंतु इस बार सवाल धन जाने का नहीं है बल्कि चरित्र खोने का है। आशय साफ है कि आईपीएल मैंचों की कार्पोरेट लॉबी में शराब परोसकर जिस तरह सरकार के नियम-नीतियों की धज्जियां उड़ेंगी, उससे तो यही संकेत मिलता है। और फिर ऐसा क्यों लग रहा है कि आप करो तो रामलीला और हम करें तो रासलीला। एक तरफ कंपनी धूप और पसीने से सूखते कंठ को तर करने को बैचेन सामान्य दर्शक से पानी की बॉटल तक छीन लेना चाहती है तो दूसरी ओर 20 हजार की टिकट खरीदने वाले एयरकंडीशंड के शौकीनों को पीने और पिलाने की पूरी आजादी है। वाह रे रामराज!

अनिल द्विवेदी
( लेखक वरिष्ठ पत्रकार और शोधार्थी हैं )

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