जिस कांग्रेस में 'बाबा' हैं
उस कांग्रेस में-जहां गांधी परिवार की मुहर ही अंतिम फैसला होती है-में इन दिनों कार्यकर्ता मन की बात कहने के लिये पार्टी फोरम नहीं बल्कि फेसबुक का सहारा ले रहे हैं! विधानसभा चुनाव में पार्टी की करारी हार से बौखलाए एक शख्स गोपाल साहू ने भड़ास निकालते हुए फेसबुक पर पोस्ट डाली. इसमें नेता प्रतिपक्ष रवीन्द्र चौबे की फोटो चस्पा करते हुए उनका एक बयान उद्धृत किया गया है. चौबे ने हार के बाद कहा था कि उम्मीदवार थोड़ा पहले तय हो जाते तो पार्टी जीत सकती थी. इस पर कार्यकर्ता ने कटाक्ष किया : आपकी टिकट तो तय थी महाराज. फिर कैसे हार गए?
यही सवाल एक साल पहले राहुल गांधी के समक्ष उठ चुका था. कार्यकर्ता भूले ना होंगे जब दुर्ग के एक कार्यकर्ता ने नेता प्रतिपक्ष रवीन्द्र चौबे की निष्क्रियता पर सवाल खड़ा करते हुए इस कदर आरोप लगाया था कि चौबे की आंखें गीली हो गई थीं. कांग्रेस की ताजा हार को लेकर जो खबरें जन्मीं, उसके मुताबिक जनमत साफ था कि निष्क्रिय, घमण्डी और बेईमान जनप्रतिनिधि नहीं चाहिये चाहे वह कांग्रेस हो या भाजपा लेकिन राहुल गांधी की इच्छा के विपरीत, नेता प्रतिपक्ष की जिद के चलते लगभग सभी विधायकों को टिकट दी गई जिनमें से सत्ताईस चुनावी मैदान में खेत हो गए. खैर.. अब पन्द्रह वर्ष का राजनीतिक वनवास बिताने को मजबूर कांग्रेस के कायाकल्प की शुरूआत हो ही गई. बदलाव के पहले शिकार प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष महंतजी हुए जिनके सर पर हार का ठीकरा फोड़ते हुए आलाकमान ने उनकी जगह तेजतर्रार और वरिष्ठ विधायक भूपेश बघेल को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया है लेकिन इन्हें मिली चुनौतियों की चर्चा बाद में.
अभी बात सरकार से लडऩे वालों की. विपरीत परिस्थितियों को साधते हुए, समझदारीभरे फैसले के साथ कांग्रेस विधायक दल को विश्वास में लेकर आलाकमान ने सरगुजा नरेश तथा वरिष्ठ विधायक टी.एस. सिंहदेव बाबा को नेता प्रतिपक्ष घोषित कर दिया. कहा तो यह जा रहा है कि गांधी परिवार से नजदीकी और महल के प्रभाव का इस्तेमाल करने के चलते सिंहदेव को यह अवसर मिला. इसे भी कौन नकारेगा कि सरगुजा में भाजपाई आंधी को थामकर सिंहदेव ने जिस तरह पार्टी की झोली में आठ में से सात सीटें डालीं, यह पद इसी का ईनाम माना जा रहा है. लेकिन राजनीति में नतीजे मायने रखते हैं, रणनीति नहीं. अब शर्माजी को ही लें. छठवीं बार विधायक बने सत्यनारायण जी नेता प्रतिपक्ष के प्रबल दावेदार थे लेकिन पार्टी में जरूरत से ज्यादा अज्ञातशत्रु पैदा कर लेना उनके लिये खतरनाक साबित हुआ.
राजा अगर अच्छा है तो यह ईश्वर का वरदान है. यदि वह बुरा है तो मान लीजिए कि भगवान ने आपके पापों की सजा देने के लिये उसे भेजा है! नये साल में कुछ ऐसी ही उतार-चढ़ावभरी उम्मीद सरगुजा नरेश सिंहदेव से जुड़ चुकी हैं. नेक और कोमल स्वभाव वाले इस शख्स के सामने कई चुनौतियां हैं मगर राहुल गांधी की राह पर चलकर उनसे पार पाया जा सकता है. कांग्रेस का गढ़ वापस हासिल करने की तड़प के चलते कांग्रेस के युवराज ने युवा कार्यकर्ताओं के बीच टैलण्ट हाण्ट अभियान चलाया था लेकिन पार्टी उनका उपयोग कर पाती, इसके पहले बड़े नेताओं ने उनका शिकार कर लिया. सिंहदेव को भी युवा, उर्जावान और रमन सरकार के मंत्रियों को करारा जवाब देने वाले चेहरों को सामने करना होगा. लगातार तीसरी हार के बाद यदि कार्यकर्ता इस सोच के साथ घर बैठ गये हैं कि कांग्रेस का कुछ नहीं हो सकता तो उन्हें जगाने और उनमें विश्वास भरने का काम सिंहदेव को करना होगा. नब्बे विधानसभाओं में भी ऐसे चेहरे अभी से तलाशने-तराशने होंगे जो चुनाव जीतने की क्षमता रखते हों.
बड़े नेताओं के अहम और गुटबाजी से तंग आ चुके विधायकों में भरोसा जगाना बाबा के लिये तीसरी बड़ी चुनौती है. उनचालीस विधायकों में यह धारणा बलवती होती जा रही है कि भ्रष्टाचार से लेकर सरकार की खामियों तक के जिन मुद्दों को विधानसभा में वे उठाना चाहेंगे, उसके पीछे नेता प्रतिपक्ष का विश्वास और समर्थन बना रहेगा या नहीं. तीन बार से निर्वाचित हो रहे एक विधायक ने मुझसे कभी कहा था कि मयसबूतों के साथ उसने जब बलात्कार व हत्याकाण्ड का मामला पिछले विधानसभा में उठाना चाहा तो उसे चुप करा दिया गया. बाद में पता चला कि इसके बदले में नेता ने सरकार से भारी कीमत वसूल ली. यह कहने में गुरेज नहीं कि पूर्व के नेता प्रतिपक्षियों की कार्यशैली इस कदर बदनाम हो गई थी कि उन्हें रमन सरकार का चौदहवां मंत्री माना जाने लगा था. पत्रकारों ने जब इस छबि से मुक्त होने की बात सिंहदेव से पूछी तो उनका जवाब था : मैं मानता हूं कि हर आदमी की छबि उसके आचरण से तय होती है. आज के दौर में लोगों के सामने कुछ भी छुपा नहीं है. मेरे आचरण से पता चल जाएगा कि मैं क्या हूं?
आप क्या हैं, इसका अहसास होने लगा है. 2013 के चुनावों में दोबारा विधायक चुने जाने के बाद सिंहदेव पार्टी में ऐसे नेता के रूप में उभरे हैं, जिन्हें करिश्माई लीडर के तौर पर देखा जा रहा है. विधानसभा उपाध्यक्ष का विपक्षी-हक मांगने से लेकर अध्यक्ष पद पर सर्वानुमति कायम करने और लाल बत्ती को नकारने के बाद पार्टी और जनता उनके फैसलों की मुरीद हो चुकी है लेकिन सवाल यह है कि कांग्रेस कहां है और उसे कहां पहुंचाना है? क्या सिंहदेव आक्रामक और विश्वसनीय विपक्ष दे पाएंगे. इस देश में जहां पचास प्रतिशत से ज्यादा लोग युवा हैं तब कांग्रेस के अंदर बदलाव की एक बड़ी जरूरत महसूस हो रही है. जंग लगी मुरझाई सोच के थके-हारे चेहरों के बजाय कुछ कर गुजरने की सोच रखने वाले युवाओं को सामने लाना होगा. विधानसभा से लेकर संगठन और पंचायत स्तर तक में सरकार के खिलाफ धारदार हमला बोलने वाले युवा चेहरे तैयार करने होंगे. हालांकि गुटबाजी से अभिशप्त पार्टी में यह बदलाव थोड़ा समय मांगेगा मगर पांच साल कम थोड़े ही हैं.
अनिल द्विवेदी
उस कांग्रेस में-जहां गांधी परिवार की मुहर ही अंतिम फैसला होती है-में इन दिनों कार्यकर्ता मन की बात कहने के लिये पार्टी फोरम नहीं बल्कि फेसबुक का सहारा ले रहे हैं! विधानसभा चुनाव में पार्टी की करारी हार से बौखलाए एक शख्स गोपाल साहू ने भड़ास निकालते हुए फेसबुक पर पोस्ट डाली. इसमें नेता प्रतिपक्ष रवीन्द्र चौबे की फोटो चस्पा करते हुए उनका एक बयान उद्धृत किया गया है. चौबे ने हार के बाद कहा था कि उम्मीदवार थोड़ा पहले तय हो जाते तो पार्टी जीत सकती थी. इस पर कार्यकर्ता ने कटाक्ष किया : आपकी टिकट तो तय थी महाराज. फिर कैसे हार गए?
यही सवाल एक साल पहले राहुल गांधी के समक्ष उठ चुका था. कार्यकर्ता भूले ना होंगे जब दुर्ग के एक कार्यकर्ता ने नेता प्रतिपक्ष रवीन्द्र चौबे की निष्क्रियता पर सवाल खड़ा करते हुए इस कदर आरोप लगाया था कि चौबे की आंखें गीली हो गई थीं. कांग्रेस की ताजा हार को लेकर जो खबरें जन्मीं, उसके मुताबिक जनमत साफ था कि निष्क्रिय, घमण्डी और बेईमान जनप्रतिनिधि नहीं चाहिये चाहे वह कांग्रेस हो या भाजपा लेकिन राहुल गांधी की इच्छा के विपरीत, नेता प्रतिपक्ष की जिद के चलते लगभग सभी विधायकों को टिकट दी गई जिनमें से सत्ताईस चुनावी मैदान में खेत हो गए. खैर.. अब पन्द्रह वर्ष का राजनीतिक वनवास बिताने को मजबूर कांग्रेस के कायाकल्प की शुरूआत हो ही गई. बदलाव के पहले शिकार प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष महंतजी हुए जिनके सर पर हार का ठीकरा फोड़ते हुए आलाकमान ने उनकी जगह तेजतर्रार और वरिष्ठ विधायक भूपेश बघेल को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया है लेकिन इन्हें मिली चुनौतियों की चर्चा बाद में.
अभी बात सरकार से लडऩे वालों की. विपरीत परिस्थितियों को साधते हुए, समझदारीभरे फैसले के साथ कांग्रेस विधायक दल को विश्वास में लेकर आलाकमान ने सरगुजा नरेश तथा वरिष्ठ विधायक टी.एस. सिंहदेव बाबा को नेता प्रतिपक्ष घोषित कर दिया. कहा तो यह जा रहा है कि गांधी परिवार से नजदीकी और महल के प्रभाव का इस्तेमाल करने के चलते सिंहदेव को यह अवसर मिला. इसे भी कौन नकारेगा कि सरगुजा में भाजपाई आंधी को थामकर सिंहदेव ने जिस तरह पार्टी की झोली में आठ में से सात सीटें डालीं, यह पद इसी का ईनाम माना जा रहा है. लेकिन राजनीति में नतीजे मायने रखते हैं, रणनीति नहीं. अब शर्माजी को ही लें. छठवीं बार विधायक बने सत्यनारायण जी नेता प्रतिपक्ष के प्रबल दावेदार थे लेकिन पार्टी में जरूरत से ज्यादा अज्ञातशत्रु पैदा कर लेना उनके लिये खतरनाक साबित हुआ.
राजा अगर अच्छा है तो यह ईश्वर का वरदान है. यदि वह बुरा है तो मान लीजिए कि भगवान ने आपके पापों की सजा देने के लिये उसे भेजा है! नये साल में कुछ ऐसी ही उतार-चढ़ावभरी उम्मीद सरगुजा नरेश सिंहदेव से जुड़ चुकी हैं. नेक और कोमल स्वभाव वाले इस शख्स के सामने कई चुनौतियां हैं मगर राहुल गांधी की राह पर चलकर उनसे पार पाया जा सकता है. कांग्रेस का गढ़ वापस हासिल करने की तड़प के चलते कांग्रेस के युवराज ने युवा कार्यकर्ताओं के बीच टैलण्ट हाण्ट अभियान चलाया था लेकिन पार्टी उनका उपयोग कर पाती, इसके पहले बड़े नेताओं ने उनका शिकार कर लिया. सिंहदेव को भी युवा, उर्जावान और रमन सरकार के मंत्रियों को करारा जवाब देने वाले चेहरों को सामने करना होगा. लगातार तीसरी हार के बाद यदि कार्यकर्ता इस सोच के साथ घर बैठ गये हैं कि कांग्रेस का कुछ नहीं हो सकता तो उन्हें जगाने और उनमें विश्वास भरने का काम सिंहदेव को करना होगा. नब्बे विधानसभाओं में भी ऐसे चेहरे अभी से तलाशने-तराशने होंगे जो चुनाव जीतने की क्षमता रखते हों.
बड़े नेताओं के अहम और गुटबाजी से तंग आ चुके विधायकों में भरोसा जगाना बाबा के लिये तीसरी बड़ी चुनौती है. उनचालीस विधायकों में यह धारणा बलवती होती जा रही है कि भ्रष्टाचार से लेकर सरकार की खामियों तक के जिन मुद्दों को विधानसभा में वे उठाना चाहेंगे, उसके पीछे नेता प्रतिपक्ष का विश्वास और समर्थन बना रहेगा या नहीं. तीन बार से निर्वाचित हो रहे एक विधायक ने मुझसे कभी कहा था कि मयसबूतों के साथ उसने जब बलात्कार व हत्याकाण्ड का मामला पिछले विधानसभा में उठाना चाहा तो उसे चुप करा दिया गया. बाद में पता चला कि इसके बदले में नेता ने सरकार से भारी कीमत वसूल ली. यह कहने में गुरेज नहीं कि पूर्व के नेता प्रतिपक्षियों की कार्यशैली इस कदर बदनाम हो गई थी कि उन्हें रमन सरकार का चौदहवां मंत्री माना जाने लगा था. पत्रकारों ने जब इस छबि से मुक्त होने की बात सिंहदेव से पूछी तो उनका जवाब था : मैं मानता हूं कि हर आदमी की छबि उसके आचरण से तय होती है. आज के दौर में लोगों के सामने कुछ भी छुपा नहीं है. मेरे आचरण से पता चल जाएगा कि मैं क्या हूं?
आप क्या हैं, इसका अहसास होने लगा है. 2013 के चुनावों में दोबारा विधायक चुने जाने के बाद सिंहदेव पार्टी में ऐसे नेता के रूप में उभरे हैं, जिन्हें करिश्माई लीडर के तौर पर देखा जा रहा है. विधानसभा उपाध्यक्ष का विपक्षी-हक मांगने से लेकर अध्यक्ष पद पर सर्वानुमति कायम करने और लाल बत्ती को नकारने के बाद पार्टी और जनता उनके फैसलों की मुरीद हो चुकी है लेकिन सवाल यह है कि कांग्रेस कहां है और उसे कहां पहुंचाना है? क्या सिंहदेव आक्रामक और विश्वसनीय विपक्ष दे पाएंगे. इस देश में जहां पचास प्रतिशत से ज्यादा लोग युवा हैं तब कांग्रेस के अंदर बदलाव की एक बड़ी जरूरत महसूस हो रही है. जंग लगी मुरझाई सोच के थके-हारे चेहरों के बजाय कुछ कर गुजरने की सोच रखने वाले युवाओं को सामने लाना होगा. विधानसभा से लेकर संगठन और पंचायत स्तर तक में सरकार के खिलाफ धारदार हमला बोलने वाले युवा चेहरे तैयार करने होंगे. हालांकि गुटबाजी से अभिशप्त पार्टी में यह बदलाव थोड़ा समय मांगेगा मगर पांच साल कम थोड़े ही हैं.
अनिल द्विवेदी
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