Saturday, May 16, 2015

यहां लिबास की कीमत है, आदमी की नहीं

II संदर्भ : आइएएस अमित कटारिया का डेे्रस कोड विवाद II

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की बस्तर-यात्रा के दौरान दो बड़े हादसे हुए। एक तो रायपुर में जो उनकी सभा होनी थी, उसका मंच बनते-बनते धराशायी हो गया जिसमें एक काल-कलवित हो गया और बाकी अभी अस्पताल में ईलाज करवा रहे हैं। दूसरा 'हादसा' यह रहा कि प्रधानमंत्री के समक्ष आइएएस अमित कटारिया पैंट, शर्ट और चश्मे के साथ मुखातिब हुए जिस पर प्रधानमंत्री ने कुछ टिप्पणी की और उसके बाद यह बहस आग पकड़ चुकी है कि एक आइएएस को वीआईपी के समक्ष किस कदर पेश होना चाहिए? अफसोस कि घटना के एक सप्ताह बाद भी हम उस गले की पकड़ से दूर हैं जो पंडाल के गिरने, उससे हुई मौतें या दर्जनों घायलों की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार है लेकिन प्रधानमंत्री के समक्ष काला चश्मा लगाकर खड़े होने वाले आइएएस का गला नापने के लिए कई तैयार खड़े हैं। 

स्कूल में बच्चों-टीचर के लिए ड्रेस कोड है, सेना में अफसर-सैनिकों के लिए है। न्यायालय में न्यायाधीश-वकीलों के लिए है। पुलिस में सभी के लिए है। अस्पताल में है I कार्पोरेट हाऊजेस में भी ड्रेस कोड लागू है। वहां पर सिवाय शनिवार के बाकी दिन आपको पेंट, शर्ट और टाई में दिखना होगा। इसी तरह प्रशासन में भी ड्रेस की आचार संहिता है। प्रशिक्षु आइएएस जब प्रशिक्षण ले रहे होते हैं तभी से इसकी आदत डाल दी जाती है। इसके पीछे का एक मकसद समानता और अनुशासन का भाव स्थापित करना है। यहां तक कि बतौर आइएएस यदि आप न्यायाधीश के समक्ष हाजिर हो रहे हैं तो ड्रेस कोड जरूरी हो जाता है और ऐसी चूकें करने वालों को अदालतों ने फटकार भी लगाई है। 

और ऐसा सिर्फ भारत में ही नहीं है। हमने देखा हैकि अमरीकी राष्ट्रपति से लेकर दुनियाभर के प्रधानमंत्री के साथ जो अफसर होते हैं, ड्रेस कोड में ही झलकते हैं। 1984 में रोनाल्ड रीगन जब अमरीका के राष्ट्रपति थे तो उनकी सुरक्षा में लगे एक अफसर को ऐनवक्त पर हवाईजहाज में चढ़ने से रोक दिया गया था क्योंकि उसके सूटकेश का रंग सुरक्षा जांच से मेल नहीं खाता था। प्रधानमंत्री मोदी जब बस्तर पहुंचे तो मुख्य सचिव से लेकर सीएम के सचिव अमन सिंह, अपर मुख्य सचिव बैजेन्द्र कुमार तथा पुलिस महानिदेशक तक सभी ड्रेस कोड में थे। तस्वीर देखने से स्पष्ट है कि खुद मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने जैकेट और सफेद कुर्ता-पायजामा (नेताओं का ड्रेस कोड) पहनकर, प्रधानमंत्री मोदी का स्वागत किया; खुद प्रधानमंत्री जी ड्रेस कोड को लेकर गंभीर रहते दीखते आये हैं।

याद कीजिये उस वाकये को जब मोदी सरकार के केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर एक सरकारी आयोजन में जींस टी शर्ट्स पहनकर पहुंचे थे जिसे पीएम ने उचित नहीं माना था। उसके बाद जावड़ेकर वापस गए और जीन्स के ऊपर ब्लेज़र डालकर आये थे। हांलांकि इसकी पुष्टि नहीं हो सकी थी लेकिन संकेत साफ़ हैं कि कुछ जगहों पर ड्रेस कोड अनिवारयतः लागू होना चाहिए। लेकिन कटारिया जो कि उस जिले के कलेक्टर यानि प्रशासन के मुखिया थे, ने इसे संभवत: हल्के में लिया। उन्होंने पीएम मोदी का स्वागत पैंट, शर्ट और आंखों में चश्मा डालकर किया इसलिए पहली नजर में वे ड्रेस की आचार संहिता का अपमान करने के दोषी तो दिखते ही हैं। 

मगर सिर्फ कटारिया ही क्यों, छत्तीसगढ़ में ड्रेस कोड की धज्जियां तो कई बार उड़ाई गई हैं और वो भी मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के सामने। एक आइएएस राजनेताओं की तरह व्यवहार करने लगे, यह किस आचार संहिता में लिखा है? महीनों पूर्व सिविल लाइंस स्थित सर्किट हाऊस में मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह एक सरकारी योजना का लोकार्पण करने पहुंचे थे तब तत्कालीन अपर मुख्य सचिव स्तर के वरिष्ठ आइएएस अफसर ने जींस के ऊपर कुर्ता ओढ़ रखा था। संयोग देखिए कि खुद मुख्यमंत्री भी कुर्ता और जैकेट में थे तब मैंने मजाकिया अंदाज में अफसर से पूछा था कि आज तो ड्रेस कोड से अलग दिख रहे हैं तब उन्होंने हंसते हुए इसे टाल दिया था। राज्य में ड्रेस कोड की धज्जियां अफसरों के इस कदर उड़ाई हैं कि ब्लेज़र की जगह अब नेहरू जैकेट ने ले ली है। 

बात साफ है कि यदि प्रधानमंत्री के समक्ष कोई आइएएस पैंट, शर्ट या चश्मा पहनकर आने पर अनुशासनहीनता का दोषी हो सकता है तो मुख्यमंत्री के समक्ष जींस-कुर्ता पहने और चश्मा लगाकर खड़ा होना कैसे स्वीकार्य हो सकता है? लेकिन यह सब इसलिए चल रहा है या नजरअंदाज किया जा रहा है क्योंकि मखमली दिल वाले मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने आंखें तरेरने का स्वभाव कभी रखा ही नहीं। 
बहस-मुबाहिसों के बीच फेसबुक पर वरिष्ठ पत्रकार बरूणा सखाजी की  टिप्पणी पढ़ने को मिली कि हमें स्मार्ट सिटी और स्मार्ट फोन तो चाहिए मगर स्मार्ट अफसर नहीं। आइएएस अमित कटारिया उन चुनिंदा अफसरों में शुमार हैं जिन्होंने अपने कार्य-व्यवहार से लोगों का दिल इस कदर जीता है कि रायपुर से जब उनका स्थानांतरण हुआ था तो इसके खिलाफ सैकड़ों लोग सड़कों पर उतर आए थे और हस्ताक्षर अभियान चलाया था। वे अकेले अफसर होंगे जो सेलेरी के तौर पर मात्र एक रूपया लेते रहे हैं। यह भी सच है कि प्रधानमंत्री के समक्ष यूं पेश होना, घण्टों तक उमसभरी तीखी धूप से बचने की एक कवायद भर रही होगी लेकिन यहां सवाल ड्रेस कोड की एकरूपता के साथ-साथ नियम और अनुशासन में बने रहने तथा प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति का सम्मान ज्यादा अहम है। 

गुजरे साल तत्कालीन केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री जयराम रमेश एक विश्वविद्यालय में थे जहां उन्हें बतौर मुख्य अतिथि स्नातक छात्रों को डिग्रियां बांटनी थी और अचानक उन्होंने अपने शरीर ओढ़ा लबादा उतारकर फेंक दिया था। उनका तर्क था कि अंग्रेजों की दी हुई यह परम्परा हम कब तक ढोएंगे? संभवत: कटारिया ने भी एक नया संदेश देने की कोशिश की है जिसे स्वीकार करने की दरियादिली हमें दिखानी होगी। 

अनिल द्विवेदी 
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं 

Tuesday, May 5, 2015

पानी दे मौला, शराब नहीं


मुद्दा : आइपीएल क्रिकेट मैचों में वीआईपीज को शराब परोसने का. 

II गंगा स्नान II

"ये अक्ल वाले नही अहले दिल समझते हैं, क्यों शराब से पहले वुजू जरुरी है"

राज्य सरकार में ईमानदार मंत्री के रूप में ख्यात मगर इस बार विधायक का चुनाव हार चुके एक वरिष्ठ भाजपा नेता ने फोन किया और एक ही सांस में बहुत कुछ खरी-खोटी सुनाते चले गए। कहा कि आप लोग ना जाने किस-किस मुद्दे पर कलम चलाते हैं मगर जब ेेजनहित की बात हो तो स्याही क्यों सूख जाती है? वे मुझे सुनाते रहे और मैं सुनते हुए, सम्मान देते हुए मुस्कुराता रहा। प्यारभरी डांट में लिपटी मुद्दे की बात यह रही कि श्रीमान को यह गंवारा नहीं था कि जिस राज्य में आंशिक शराबबंदी हो, वहां सरकार के नियम-कायदों को अंगूठा दिखाते हुए आगामी 9 और 12 मई को होने वाले आइपीएल मैचों में वीआईपीज को या कार्पोरेट लॉबी में कंपनियों की ओर से शराब परोसी जाए।

नेताजी यही नहीं रूके बल्कि अपनी विवशता समझाते हुए बोले, क्या हो गया है पार्टी और सरकार के सिद्धातों को या फिर आरएसएस के कर्णधारों को जिन्होंने कभी शराबबंदी लागू करने का प्रस्ताव सरकार के समक्ष रखा था, आज वे ऐसे खामोश हैं मानो शराब ना हुई, दूध की नदियां बहने वाली हैं। वे यहीं नहीं रूके। बोले, चलो हमारी तो मजबूरी है कि अपनी ही सरकार में रहकर अपनों के खिलाफ कौन बोले या लड़े? लेकिन मीडिया किस दबाव में है जो इस कुप्रथा का विरोध तक नहीं कर सकता। चूंकि मुद्दा वाकई सरकार की नीतियों को ठेंगा दिखाने और जनहित के स्वास्थ्य से जुड़ा है इसलिए मैंने नेताजी से सिर्फ इतना ही कहा कि कल का अखबार देख लीजिएगा।

अब वादा किया है तो निभाना पड़ेगा ही। इसमें दो राय नही है कि मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह देश के उन चुनिंदा मुख्यमंत्रियों में शुमार हैं जिन्होंने यह जानते हुए भी कि प्रदेश के राजस्व का लगभग 20 प्रतिशत खजाना शराब बिक्री से आता है--ने बड़े साहस के साथ फैसला लेते हुए शराबबंदी की ओर कदम बढ़ाए। खासकर महिलाओं की व्यथा और दशा को समझते हुए उन्होंने यह कानून भी बना डाला कि जिस इलाके की 55 प्रतिशत महिलाएं शराबभट्टी का विरोध करेंगी, वहां से वह दुकान हटा दी जाएगी। आब.ए.आईना यह है कि राज्य में कोई 300 से अधिक शराब दुकानें बंद हो चुकी हैं। गुजरे दिनों महिलाओं के लम्बे विरोध के बाद राजधानी से लगे कुम्हारी इलाके में एक शराबभट्टी में ताला लग गया था।

फिलवक्त बड़ा और गहरा सवाल यह है कि क्या आइपीएल क्रिकेट मैचों का आयोजन हमारे लिए इतना ज्यादा प्रतिष्ठा का विषय बन गया है कि उसके लिए सारे नियम-कानूनों को धता बता दिया जाये? माना कि इसके आयोजन से छत्तीसगढ़ का नाम देश-दुनिया में गूंजता है। या एक बड़ा लालच यह भी है कि देश के कार्पोरेट जगत की निगाहें छत्तीसगढ़ की ओर दौड़ पड़ती हैं? लेकिन किसकी, कितनी कीमत चुकायेंगे, इसकी सीमा तो तय होनी ही चाहिए।

एनएसयूआई के नेता संजीव शुक्ला ने बड़ा सवाल खड़ा किया कि आज आईपीएल आयोजित करने वाली कंपनी जीएमआर ने छूट मांगी है, कल से राजधानी में कुकुरमुत्तों की तरह इवेंट आयोजित कर रही कंपनियां या फाइव स्टार हॉटल्स चाहेंगे कि उन्हें पार्टी या इवेंट्स में शराब परोसने की इजाजत दी जाए, तब कलेक्टर साहब के पास क्या जवाब होगा? वैसे भी कलेक्टर ने शराब परोसने की अनुमति किस आधार पर दी? उनसे अनुमति ली भी गई या नहीं, इन सारे प्रश्नों का जवाब जल्द तलाशना होगा। साफ है कि सरकार या अफसरशाही शराब लॉबी की गिरफ्त में है जो खुलेआम सरकारी पॉलिसी की धज्जियां उड़ते देखना चाहती है!

पिछली बार भी आईपीएल कराने वाली कंपनी को राज्य सरकार ने मनोरंजन टैक्स से छूट दे दी थी लेकिन यह नुकसान इसलिए मंजूर था क्योंकि बड़े फायदों के लिए छोटे नुकसान झेलने ही पड़ते हैं परंतु इस बार सवाल धन जाने का नहीं है बल्कि चरित्र खोने का है। आशय साफ है कि आईपीएल मैंचों की कार्पोरेट लॉबी में शराब परोसकर जिस तरह सरकार के नियम-नीतियों की धज्जियां उड़ेंगी, उससे तो यही संकेत मिलता है। और फिर ऐसा क्यों लग रहा है कि आप करो तो रामलीला और हम करें तो रासलीला। एक तरफ कंपनी धूप और पसीने से सूखते कंठ को तर करने को बैचेन सामान्य दर्शक से पानी की बॉटल तक छीन लेना चाहती है तो दूसरी ओर 20 हजार की टिकट खरीदने वाले एयरकंडीशंड के शौकीनों को पीने और पिलाने की पूरी आजादी है। वाह रे रामराज!

अनिल द्विवेदी
( लेखक वरिष्ठ पत्रकार और शोधार्थी हैं )

Tuesday, February 10, 2015

एके49 से एके67 तक

II हारता सावन II

"मोदी सरकार के नौ महीने पूरे हो गये। उसके पेट से जो विकासरूपी बालक जन्मा है, उसका नाम केजरीवाल है : फेसबुक पर वायरल हुआ एक चुटकुला।"

जैसे किसी ने बहते हुए दरिया को बोतल में बंद कर दिया हो और उसका जल उछलने को छटपटा रहा है, कुछ ऐसा हम भाजपा के साथ होता महसूस कर रहे हैं। इसे वरदान नहीं विडम्बना कह लीजिये कि मात्र नौ महीने पहले जिस नरेन्द्र मोदी को दिल्ली की जनता ने सातों लोकसभा सीटें देते हुए सरआंखों पर चढ़ाया था, आज उसी जनता ने भाजपा को उसकी सबसे शर्मनाक पराजय तक ला पटका है। धमाकेदार जीत के साथ केजरीवाल आज प्रासंगिक तो हैं ही, कालजयी भी हो गये हैं। उनके विजन, मेहनत और जीतने योगय रणनीति को लाखों सलाम! शुभकामनाएँ!  

तमाम दुष्प्रचारों को धता बताते हुए दिल्ली की जनता ने जिस तरह आम आदमी पार्टी पर दुबारा भरोसा जताया है, वह भाजपा-कांग्रेस सहित दूसरे राजनीतिक दलों के लिए खतरे की घण्टी की तरह है। सोलह सालों से राजनीतिक वनवास भोग रही भाजपा, इस दावे के साथ किरण बेदी को लेकर आई थी कि बेदी नया चेहरा हैं और दिल्ली में वे खासी लोकप्रिय हैं, लेकिन यह मृगमरीचिका तब साबित हुई जब बेदी भाजपा का गढ़ माने जाने वाले कृष्णा नगर सीट से चुनाव हार गईं। एक न्यूज चैनल पर भाजपा कार्यकर्ता ने उनकी हार पर आक्रोश व्यक्त करते हुए कहा : जिस बेदी ने कभी ब्यूरोक्रेट्स रहते हुए कार्यकर्ताओं पर लाठियां भांजी थीं, हम उन्हें मुख्यमंत्री कैसे बनते देखते? दूध का जला छाछ भी फूंककर पीता है लेकिन भाजपा ने पिछली गल्तियों से कोई सबक नहीं लिया। 

भूले नहीं होंगे कि 2005 के लोकसभा चुनावों में भाजपा ने छत्तीसगढ़ की महासमुंद सीट से कांग्रेस के वरिष्ठ नेता स्व. विद्याचरण शुक्ल को बतौर उम्मीदवार बनाकर उतारा था तब भाजपा-संघ के कार्यकर्ताओं ने उन्हें सिरे से खारिज कर दिया था और शुुक्ल एक लाख से ज्यादा मतों से हार गए थे। यह सवाल रह-रहकर फन फैला रहा है कि जब पार्टी के पास पेशेवर नेताओं की फौज थी तो उसने सबको धकियाते हुए किरण बेदी को क्यों ला खड़ा किया? सभी बड़े नेता अनुशासन का डण्डा चलने के डर से मन मसोसकर शांत हो गए थे लेकिन देवतुल्य भाजपा कार्यकर्ताओं को लगा कि झूठे दिलासों के कफन ओढ़कर कब तक इंतजार करेंगे सो वे ना सिर्फ घर बैठ गए! 

और सिर्फ कार्यकर्ता ही क्यों, भारतीय लोकतंत्र की यही खासियत है कि वह अधिनायकवादी फैसलों के आगे कभी नहीं झुका। चाहे इंदिरा गांधी का दौर रहा हो या फिर वर्तमान में मोदी और शाह का। इस हार-जीत को हम जिस उजाले में देखने का प्रयास कर रहे हैं, उसके मुताबिक दिल्ली विधानसभा चुनाव के मीठे-खट्ठे परिणामों के बीच तीन प्रमुख कारण निकलकर आए हैं : पहला है ईमानदार चेहरा, दूसरा केडरबेस काम और तीसरा रणनीतिपूर्वक आगे बढ़ना। आश्चर्य कि आप पार्टी इसमें सफल रही जबकि भाजपा की चाल डगमगाती रही। 
केजरीवाल ने मोदी और शाह की तरह पार्टी को अपनी दृष्टि से नहीं बल्कि जनता की दृष्टि से गढ़ने की कोशिश की। 

जबान की फिसलन भी भाजपा को ले डूबी। एक तरफ भाजपा नेता ऐलानियां आप को धमकाते रहे तो दूसरी ओर केजरीवाल का आत्मविश्वास आकार लेता गया। मोदी और भाजपा जहां केजरीवाल को एके47, नक्सली, हरामजादा और चोर बताते रहे, वहीं दूसरी ओर आप के कार्यकर्ता और नेता पिछली गल्तियों के लिए जनता से माफी मांगते हुए दिल जीतते चले गए। केजरीवाल ने छप्पर फाड़ जीत हासिल कर 67 सीटें जीतकर एके47 का करारा जवाब दिया है। एक बानगी देखिए कि मतदान के एक दिन पहले प्रवक्ता आशुतोष ने बयान दिया कि हमें बुखारी का समर्थन नहीं चाहिए क्योंकि नवाज शरीफ को आमंत्रण देकर उन्होंने देश के प्रधानमंत्री का अपमान किया था। यह बयान भी भाजपा की जीत के लिए अंतिम कील साबित हुआ। 

समय से बहस करते हुए भाजपा की हार को धड़कनों की समग्रता में महसूस करने की जरूरत है। पार्टी और नेताओं को सर्वानुमति का सम्मान करना होगा। आरएसएस को भी भाजपा के उन बुलडोजरी फैसलों का विरोध करना सीखना होगा जिसमें अधिनायकवाद की बू आती है अन्यथा आज भाजपा कार्यकर्ता घर बैठे हैं, कल से स्वयंसेवक भी गंभीरता से लेना बंद कर देंगे। 

चलिए जो जीता, वो सिकंदर। बहुत उम्मीद और भरोसे के साथ केजरीवाल में जनता ने एक ऐसे सुपर स्टार को देखा है जिससे ढेरों आशाएं और उम्मीदें जुड़ी हैं। दिल्ली ने पिछले सालों में लाखों बेरोजगार उगले हैं। सुरक्षा, बिजली और पानी की गारंटी भी बड़ी चुनौती है। उम्मीर करें कि पांच साल बाद अरविंद केजरीवाल की सरकार, कांग्रेस की शीला दीक्षित सरकार से ज्यादा बड़ी लकीर खींचकर दिखाएगी। 

अनिल द्विवेदी ( लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं )


Monday, January 5, 2015

जीत-हार को इस तरह लीजिए


II गंगा स्नान II

प्रदेश की लगभग सवा दो करोड़ की आबादी ने अगले पांच सालों के लिए शहर-सरकार और अपने खैरख्वाहों को चुनते हुए आखिर अपना फैसला सुना ही दिया। महज चंद सालों में ही शक और असुरक्षा का जो माहौल पूरे राज्य में पनपा है, जनता ने इसी के दण्डस्वरूप भाजपा को सबक सिखाते हुए कांग्रेस पर भरोसा जताया है। बढ़ता नक्सलवाद, स्वास्थ्यगत लापरवाहियों से होती निर्दोष मौतें, राशन कार्ड निरस्तीकरण, पिछड़ा वर्ग का 4 प्रतिशत आरक्षण, पर्दाफाश होते भ्रष्टाचारी ये ऐसे कारण रहे जिनके चलते जनता अंदर ही अंदर उबलती रही मगर सरकार इस गुस्से की थाह नहंी पा सकी। 

इन परिणामों में तमाम तरह के संदेश छुपे हैं। पहला संदेश उन कामचोर, नाकारा और भ्रष्टाचारी लोगों के लिए है जिन्हें नकारते हुए रायगढ़ की जनता ने एक वृहन्नला को अपना महापौर चुन लिया। तस्वीर साफ है कि आप जनता का नेतृत्व कर रहे हैं तो मर्दों की तरह काम करिए अन्यथा मधु किन्नर जैसा विकल्प मौजूं है। हालांकि राजधानी रायपुर सहित पूरे प्रदेश में कई पार्षद ऐसे हैं जो लगातार तीसरी-चौथी बार चुनकर आए हैं। ऐसे नेता पार्टी की नाक साबित हुए हैं। उन्हें बधाईयां और शुभकामनाएं!

पहले बात कांग्रेस की। नक्सली हमले से कमजोर हुई पार्टी को जब विधानसभा-लोकसभा चुनावों में भी हार का सामना करना पड़ा तो पूरी पार्टी मानो मनोबल खो चुकी थी मगर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल और नेता प्रतिपक्ष टी.एस. सिंहदेव ने परिस्थितियों को नाप-तौलकर, बड़ा दिल रखकर, टीम-वर्क के साथ सरकार के खिलाफ जो आंदोलन छेड़ा, या जो आत्मविश्वास संगठन में भरा, यह जीत उसी का नतीजा है। पार्टी ने इस बार चार नगर निगम सहित पूरे प्रदेश में सम्माजनक विजय हासिल की है। यहां पर बड़ी चुनौती यह है कि रमन सरकार ने विकास की जो लकीर खींची है, आप उससे बड़ी लकीर खींचकर दिखाएं क्योंकि आगे और भी इम्तिहान होना है। 

इस जीत से कांगे्रेस और उसके कार्यकर्ता उर्जावान हुए हैं और भरोसा हो गया है कि पार्टी सत्ता में आ सकती है। आगे इस विश्वास को मजबूती के साथ बनाए रखने की जरूरत है। जहां तक जोगीरूपी चुनौती का सवाल है, आप उन्हें नजरअंदाज नहीं कर सकते। ना भूलें कि उन्होंने बिलासपुर सीट पर तय उम्मीदवार का विरोध किया था और पार्टी वहां हार गई है, सो जोगी और पार्टी एक-दूसरे के महत्व को बखूबी समझें और आगे बढ़ें। पार्टी को नोट कर लेना चाहिए कि उसके परंपरागत वोट बैंक-सतनामी मुस्लिम आदिवासी, जिस पर भाजपा ने सेंध लगाई है-को वापस पाना होगा। रही बात फूल-छाप नेता और कार्यकर्ताओं की तो उनसे भूपेश बघेल ने निबटना बखूबी सीख ही लिया है!

ताजा चुनाव परिणामों से भाजपा सकते में है। बुनियादी और गहरा सवाल यह है कि बेहतर सुराज देने का दावा करने वाली भाजपा को जनता ने खारिज क्यों किया या कांग्रेस पर भरोसा क्यों जन्मा? पिछले 11 सालों तक प्रदेश का अटल चेहरा बने, जनता का दिल जीतने वाले मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह देश में ऐसे मुख्यमंत्री के तौर पर पहचाने जाते हैं जो अभी तक बेदाग बने हैं। उनका विजन और योजनाओं ने इस राज्य को विकास के शिखर पर पहुंचाया है। खुद कांग्रेस की सरकार ने उन्हें दो दर्जन से ज्यादा पुरस्कार दिए। फिर क्या कारण रहे कि पार्टी जनता के नजरों से उतरती जा रही है? वस्तुत: पिछले कुछ सालों में नैतिकता की सीमा तक सरकार में जो भ्रष्टाचार पनपा, लालफीताशाही जन्मी, अफसरराज आया, उस पर यदि नकेल कसी जाती, मौत के सौदागरों के हाथों होती निर्दोष मौतों पर लगाम लगती या भ्रष्टाचार के धनकुबेरों को जेल में डाला जाता और कार्यकर्ताओं को सरकार में एक व्यक्ति-एक पद के मुताबिक तवज्जो मिलती तो पार्टी को यह दिन ना देखने पड़ते। 

अगर नरेन्द्र मोदी सहित पूरी पार्टी यह दावा करती है कि भाजपा में व्यक्ति नहीं पार्टी चुनाव लड़ती है तो यह दावा रायपुर में धराशायी हो चुका है। यहां पार्टी लगातार दूसरी बार महापौर चुनाव में धराशायी हुई है। साफ है कि पार्टी-हित के आगे पार्टी गौंण हो चुकी है। ऐसा नहीं है कि पार्टी के पास जीतने लायक चेहरे ही नहीं बचे लेकिन संगठन में प्रभावी कुछ रसूखदारों को इन चेहरों के बलवान होने से अपनी सत्ता खतरे में दिखती है इसलिए चालाकीपूर्वक इन्हें दरकिनार कर रहे हैं और खामियाजा पार्टी भुगत रही है। 

इसकी शुरूआत 2009 के चुनावों में ही हो गई थी जब कांग्रेस ने तीन नगर निगम हथियाए थे लेकिन सरकार नहीं चेती। तारीफ करना होगी स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल के नेतृत्व की कि नसबंदी काण्ड के चलते पूरे देश में आलोचना का केन्द्र बनने के बावजूद उन्होंने बेहतर नेतृत्व किया और बिलासपुर में पार्टी का महापौर चुनवाकर आलोचकों का मुंह बंद कर दिया। कार्यकर्ता महसूस करते हैं कि पिछले पांच साल में कमजोर और थके चेहरों के चलते जिला संगठन भी धराशायी होता जा रहा है जिसे फिर से ऑक्सीजन देने की जरूरत है। टिकट बंटने तक पार्टी की वार्ड बैठकें तक नहीं हो सकी। यही हालात अम्बिकापुर, चिरमिरी, जांजगीर, रायगढ़ में भी दिखाई दिए। आने वाले समय में पार्टी की परीक्षा पंचायत और मंडी चुनावों में भी होनी है इसलिए जरूरत इस बात की है कि भूल और चूकों के वास्तविक कारणों का हल निकाला जाए। अहंकार के घोंघे को तोड़कर दोस्ताना और विद्वतापूर्ण ढंग से पार्टी में संवाद स्थापित हो। जनता के सरोकारों, उनकी तकलीफों को गंभीरता से लें और उसी के मुताबिक फैसले भी करें ताकि रामराज सुराज महसूस हो सके। 

अनिल द्विवेदी 
( लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं )


Tuesday, November 25, 2014

किसका कोड़ा, किसकी पीठ

।। गंगा स्नान।।

पहले एक बयान : एक माँ का श्राप है जिम्मेदार कभी सुखी नही रहेंगे, यह दर्द दुलौरिन की सास के हैं जिसने बिलासपुर नसबंदी काण्ड में अपनी बहू को खो दिया है.

अब वाट्स अप पर आए मजाकिया संदेश पर गौर करें : मुख्यमंत्री कहते हैं : ऑपरेशन स्वास्थ्य मंत्री नहीं करता. स्वास्थ्य मंत्री कहते हैं कि स्वास्थ्य विभाग की गलती नहीं. डॉक्टर-संघ कह रहा है : मरीज गलत दवा खाने से मरे. फार्मा संघ कह रहा है : चूहा मार दवा इतनी नहीं थी कि उससे इंसान की मौत हो जाए लेकिन पीडि़त कह रहा है : बस कर ददा. गलती हमरे रहिच..हमरे मन करत रहिच मरे के..!

मजाकिया अंदाज लिए इस संदेश के अंतिम शब्द गंभीरता और सच्चाई ओढ़े हैं। काश यह तेजाब बन जाते और हर उस शख्स को झुलसा दें जो इस नसबंदी हत्याकाण्ड के जिम्मेदार माने जा रहे हैं। बिलासपुर के पेंडारी में हुआ नसबंदी हादसा या यूं कह लें कि एक ऐसा हत्याकाण्ड है जिसे मानव समूह की लापरवाही ने रचा। फिलवक्त 18 जानें गई हैं और अभी भी मौत मजे ले-लेकर लील रही है। चूक कहां हुई, कैसे हुई, समूची इंसानियत इसके जवाब के लिये बेकरार है लेकिन सही उत्तर नदारद है। यहां वाजिब सवाल यह खड़ा है कि जनसंख्या स्थरीकरण के लिए केन्द्र सरकार, जो नसबंदी योजना चला रही है, क्या वह सिर्फ एक समुदाय के लिए ही है क्योंकि मौतों का आंकड़ा इस पर अपनी मुहर लगा चुका है। 

यह अफसोसजनक हादसा ऐसे राज्य में हुआ है जिसके मुखिया यानि मुख्यमंत्री खुद डॉक्टर हैं। रमनसिंह जी की जो बड़ी खासियत है, वह यह कि उन्हें तौलकर बोलने में महारत हासिल है लेकिन उन्होंने मन को चुभने और गले ना उतरने वाला बयान देकर चौंका दिया। सवाल स्वास्थ्य मंत्री के इस्तीफे को लेकर दागा गया था जिसके जवाब में उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य मंत्री ऑपरेशन नहीं करते! कमाल है भाई! अगर सालों पहले रेल हादसे से विचलित एक रेल मंत्री ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था तो क्या इसका मतलब यह कि रेल मंत्री ही रेल चलाते हैं। यह तो नैतिकता का तकाजा है और इस्तीफा उसका सुबूत। एक नरेन्द्र मोदी हैं जिन्होंने छह महीने में ही परफारमेंस ना देने वाले मंत्रियों को सबक सिखाते हुए उनके विभाग छीन लिए। और एक आप हैं कि कोई कार्रवाई ना करना ही मानो असली काम बन चुका है। 

अपने परिजनों को खो चुके लोग दु:ख से सूखे जा रहे हैं और राजनीतिज्ञ हैं कि मौत को मनोरंजक बनाते हुए उलजुलूल बयान दे रहे हैं। फिलवक्त किसी कार्रवाई की उम्मीद करना बेमानी होगा क्योंकि बचने-बचाने का खेल शुरू हो चुका है। शुरूआत आरोपी डॉक्टर से करते हैं जिसकी गिरफतारी का विरोध इंडियन मेडिकल एसोसिएशन कर रहा है। डॉक्टरों के संघ ने जिन दो मांगों के साथ प्रदर्शन किया, उसमें एफआईआर से हत्या की धारा हटाने तथा रिहाई की मांग जुड़ी है। परंतु शवों पर अपने तर्कों के अट्ठहास लगाने वाले स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल ने स्वागतयोगय लेकिन घुडक़ीभरे अंदाज में कहा कि फिलहाल जो मौतें हुई हैं, उनमें से कुछ की वजह इंफेक्शन बताया जा रहा है जिसके लिए डॉक्टर जिम्मेदार है। 

जिस राज्य में पिछले 12 सालों तक निजी नर्सिंग होम एक्ट लागू ना हो सका हो, अंदाजा लगाया जा सकता है कि डॉक्टरों के बचने या बचाने की किस कदर छूट मिली हुई है! आंखफोड़वा काण्ड, गर्भाशय काण्ड, मलेरिया से होती बेगुनाह मौतें, स्वास्थ्य कार्ड के नाम पर लूट जैसे कई हादसे हमने देखे और हर वक्त इस उम्मीद के साथ मन मसोसकर चुप हो गए कि कभी तो स्थिति बदलेगी, सिस्टम सुधरेगा या डॉक्टरों में मानवीयता जागेगी मगर अफसोस कि गरीबों की जान के साथ खेलना मानो इनका असली पेशा बन चुका है। 

इस मखौल में सब शामिल हैं तभी तो विपक्षी कांग्रेस को जैसे अंधेरे में तीर चलाने का बहाना मिल गया। जनता को तो याद है परन्तु पार्टी ना भूले कि चंद महीनों पहले ही राजधानी रायपुर में पीलिया से हुई मौतों में तीन दर्जन से ज्यादा जिंदगियां होम हो गई थीं! क्या महापौर डॉ. किरणमयी नायक उन चेहरों को गिना सकती हैं जो इस काण्ड के लिए जिम्मेदार थे और उन्होंने उन पर बड़ी या कड़ी कार्रवाई की? नतीजा सिफर रहा है। लेकिन जनता न्याय करना चाहती है और वह नगर निगम चुनाव का इंतजार कर रही है। अब वापस नसबंदी काण्ड पर लौटते हैं जिस पर राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए सुरक्षित घरों में बैठे तमाम इच्छाधारी फुफकारते हुए बाहर निकल आए। इन्हीं में से एक कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी। दुर्घटना के पीडि़तों को रमन सरकार ने जो मुआवजा बांटा, वह न्यायानुकूल तो नहीं लगा मगर वह उसका धर्म था और निभाया भी लेकिन कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी से लेकर छुटभैया नेताओं ने आश्वासन और वादों के अलावा कुछ नहीं दिया। 

मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि राहुल जब पीडि़तों से मिल रहे थे तो वे लडख़ड़ाती सांसों के साथ यह उम्मीद बांधे बैठे थे कि कांग्रेस के युवराज उस पार्टी के सर्वोच्च नेता हैं जिसकी तिजोरी अरबों के चंदे से भरी पड़ी है? क्या उसका मुंह इन पीडि़तों की मदद के लिए नहीं खोला जा सकता था? राहुल ने महज सुर्खियां बटोरीं, वादों और आश्वासनों का मलहम लगाया और चलते बने। इसके ठीक विपरीत कांग्रेस के युवा विधायक अमित जोगी के पहल की दाद देनी होगी कि उन्होंने ना सिर्फ पीडि़तों के दु:ख-दर्द को बांटा बल्कि एक अनाथ बिटिया को उसकी परवरिश करने के लिए गोद भी लिया। राज्य में 90 विधायक हैं। अगर एक-एक परिवार को भी गोद लेंगे तो अभागे परिवारों के दर्द और आंसुओं पर कुछ तो मलहम लगेगा ही। 

आप भूलें ना हों तो याद दिला दूं कि पूर्व गृह मंत्री ननकीराम कंवर ने तीन साल पहले राजधानी के मेडिकल स्टोर में पुलिस के दस्ते भेजकर छापे पड़वाए थे। कारण यह कि उन्हें नौ रूपये की टेबलेट नब्बे रूपये में बेची गई थी। तब छापे में आश्चर्यजनक खुलासा हुआ था कि मेडिकल स्टोर्स में नकली दवाईयां खपाई जाती हैं। कंवर का यह अभियान जनता के हित से जुड़ा था या उनकी व्यक्तिगत भड़ास रही हो, परन्तु पब्लिक ने उसे खासा रिस्पांस दिया था। हालांकि  स्वास्थ्य विभाग को दीमक की तरह चाट रहे दलाल ठेकेदारों तथा कुछ राजनीतिज्ञों ने हायतौबा मचाते हुए कार्रवाई को कटघरे में खड़ा किया था परन्तु शीशे की तरह साफ है कि पूरे राज्य में दवा व्यवसाय का काला धन्धा फल-फूल रहा है और उसे सरकार के राइट-लेफट में बैठे शुभचिंतक संरक्षित करते रहे हैं, इन्हें बचाने का खेल बड़ी चालाकी से खेलते हैं। 

महावर दवा कंपनी को ही लीजिये : सन् 2012 में उसका लाइसेंस रद्द हुआ था लेकिन जल्द ही उसे श्रेष्ठ गुणवत्ता का प्रमाण-पत्र पकड़ा दिया गया। महावर को सांसद रमेश बैस के चुनाव कार्यालय प्रभारी के तौर पर मैंने खुद देखा है। मन में यह सुगबुगाहट उठना स्वाभाविक है कि सरकारी अस्पतालों में दवाईयां खपाने से लेकर राजनीतिक मदद करने तक में किसने साथ दिया होगा? हालांकि श्री बैस का साफगोईपना देखिए कि उन्होंने खुद ही खुलासा किया कि जिस दवा कंपनी की दवाईयां मरीजों को दी गईं, उसे कुछ साल पहले ब्लैकलिस्टेड किया जा चुका है। नसबंदी काण्ड पहला मामला थोड़े ही है। इसके पहले शर्मिंदा करने वाले वाकयों को अंजाम दिया गया था, उसके दोषी डॉक्टर नाममात्र के लिये निलंबित हुए और चंद महीनों में ही बहाल कर दिए गए। गर्भाशय काण्ड में जिन डॉक्टरों के लाइसेंस रद्द हुए, उसमें से कितने ही फिर से अपनी प्रेक्टिस पर लौट आए हैं। कहने का तात्पर्य यह कि सजा ऐसी दीजिये कि नैतिकता का थर्मामीटर टूट जाए। बहकावे में आकर या कह लें कि चंद रूपये पाने का लालच ही सही, आंखों में सपने पालने वालों ने सिस्टम पर भरोसा करने की जो कीमतचुकाई है, शैतानों को उसका पाई-पाई का हिसाब अभी ना सही, कभी ना कभी तो चुकाना पड़ेगा ही, वह भी जिंदा रहते हुए। रही न्याय की बात तो आप देखिएगा, आंखफोड़वा काण्ड, गर्भाशय काण्ड या बालको चिमनी हादसा की तरह ही नसबंदी काण्ड भी अपनी मौत मर जाएगा यानि इंसाफ समय की गर्द में दफन हो चुका होगा। 


अनिल द्विवेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार और शोधार्थी हैं 
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Wednesday, April 2, 2014

राजनीति का नया अभिषेक



आसान जीत की ओर बढ़ रहे अभिषेक सिंह का राजतिलक लगभग तय है लेकिन इसके बाद खुद को साबित करने की चुनौती मुंहबांये खड़ी है. अब तक राजनांदगांव से खुद को दाँव पर लगाने वालों की सच्चाई यह है कि राजनीतिक रोटियां सेंकने के सिवाय वे कोई खास चमत्कार नहीं कर सके अत: परिवार से लेकर जनता-जनार्दन तक में आशा की यह डोर बंधी है कि शुक्ल-युग का अवसान होने के बाद देश के राजनीतिक-शीर्ष पर युवा छत्तीसगढिय़ा की जो कमी राज्य महसूस कर रहा है, उम्मीद है कि अभिषेक इसे भरने में कामयाब होंगे. ठीक राहुल गांधी, सचिन पायलट और ज्योतिरादित्य सिंधिया की तरह. राजनांदगांव संसदीय क्षेत्र से विशेष रिपोर्ट :
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जादुई स्पर्श लिए मुस्कान और अदाभरी शालीन चुप्पी के साथ अभिषेक सिंह जब चुनाव-प्रचार के लिये घर से निकलते हैं तो छह फीट से अधिक की काया वाले इस शख्स से हाथ मिलाने को लोग बेताब हो उठते हैं. बुढ़ापा ओढ़े दो शख्स के बीच खड़ी एक नन्हीं बिटिया के सर पर बाबा हाथ फेरते हैं और बुजुर्गों से कहते हैं, ‘इस क्षेत्र की सेवा करना चाहता हूं. आपका आर्शीवाद चाहिये.’ जोश से भरी युवाओं की टोली नारे लगाती है और काफिला आगे बढ़ जाता है. लेकिन कांगे्रस-जोकि विपक्षी चुनौती के तौर पर सामने है-के झण्डे-बैनर देखना मुश्किल पड़ रहा है. इसकी वजह साफ करते हुए पार्टी के वरिष्ठ नेता कहते हैं, ‘जनमत का दबाव या सत्ता के लोभ का असर कह लीजिये, विद्रोह और विरोध की हर चिंगारी जलने से पहले ही बुझ गई.’

लेकिन राजा-रजवाड़ों के प्रभुत्व वाले इस शहर में ऐसा कब नहीं हुआ? सत्ता का तो चरित्र ही यही है. क्षेत्र का संसदीय इतिहास गवाह है कि राजा वीरेन्द्र बहादुर सिंह से लेकर रानी पद्मावती देवी, शिवेंद्र बहादुर सिंह, मोतीलाल वोरा, राजा देवव्रत सिंह, डॉ. रमनसिंह और मधुसूदन यादव तक में मात्र यादव ही तो थे जो महल बनाम हल की लड़ाई जीतकर संसद पहुंचे और अब यह नारा कांग्रेस प्रत्याशी कमलेश्वर वर्मा लगा रहे हैं. अभिषेक पर अप्रत्यक्ष प्रहार करते हुए वे कहते हैं, ‘मतदाता चाहकर भी महल के प्रत्याशी (अभिषेक सिंह) से नहीं मिल पायेंगे.’ अभिषेक इसके जवाब में मौन साध लेते हैं.

पन्द्रह लाख से ज्यादा की आबादी वाले राजनांदगांव लोकसभा में चुनावी बिसात सज चुकी है. हाथों में मुद्दे और आरोपरूपी तलवार के साथ मोहरे मैदान में हैं और पार्टी के दिगगज रणनीतियों के साथ एक-दूसरे को धराशायी करने में लगे हैं. तस्वीर साफ है कि गुजरे विधानसभा में भाजपा और कांग्रेसचार-चार सीटें जीतकर बराबरी पर रही थीं और यदि कांग्रेस ने वर्तमान की तुलना में मजबूत प्रत्याश्ी उतारा होता तो अभिषेक को गहरी चुनौती से जूझना पड़ता लेकिन अब खुला खेल फर्रूखाबादी हो चला है. राजनीतिक पंडितों का आंकलन है कि जब प्रदेश की राजनीति में नई जमात दहाड़ रही है तब अभिषेक ने धमाकेदार एण्ट्री मारी है.

लडख़ड़ाहटों के साथ ही सही, अभिषेक ने अपने राजनीतिक कैरियर की शानदार शुरूआत की है. कुछ अभिषेक को पैराशूट कैंडीडेट मान रहे हैं मगर वे गफलत में हैं. विरोधी तर्क देते हैं कि उनका कोई राजनीतिक अनुभव नहीं है और सिर्फ एक ही योगयता है कि वे मुख्यमंत्री के सुपुत्र हैं. इसके बचाव में वरिष्ठ पत्रकार विजय कानूगा कहते हैं, ‘ऐसे लोगों के लिये सचिन पायलट और ज्योतिरादित्य सिंधिया को याद करना चाहिये जिन्होंने कम अनुभव के बावजूद पिता की विरासत संभाली और राजनीति में सफल हुए. आप देखिएगा अभिषेक की जीत एक लाख से ज्यादा मतों से होगी.’

दरअसल राजनांदगांव लोकसभा क्षेत्र पर बाबा की नजर तीन साल पहले लग गई थी. सीट तय होने के बाद मुख्यमंत्री डॉ. रमनसिंह के सलाहकार विवेक सक्सेना को वहां का प्रभार सौंपा गया जिन्होंने दिन-रात एक करके स्थानीय समीकरणों को साधा, रास्ते की रूकावटों को साफ किया, असंतुष्टों को मनाया और सरकारी मशीनरी को झोंकते हुए विकास की गंगा बहा दी. इलाका चमन हो चुका है और यहां के सडक़ मार्ग से गुजरते वक्त आप इसका नजारा बखूबी देख सकते हैं.

गुजरे विधानसभा चुनाव में बाबा की नेतृत्व-क्षमता को परखने का वक्त था सो पर्दे के पीछे रखते हुए उन्हें राजनांदगांव सीट का चुनाव संचालक बनाया गया. पूरे दो महीने तक अभिषेक ने जिस सूझबूझ से चुनाव संचालन किया और पिताश्री को पैंतीस हजार से ज्यादा की लीड से विजयश्री का वरण कराया, उसने भाजपा संगठन, आम आदमी और पिता का दिल जीत लिया. इस सफलता के बाद इस बात पर मुहर लग गई थी कि अगला लोकसभा चुनाव अभिषेक ही लड़ेंगे. ऐसा नहीं है कि वर्तमान सांसद मधुसूदन यादव की टिकट काटने से पार्टी और संगठन में खदबदाहटें नहीं हुईं लेकिन उसे जादू की झप्पी के साथ बेहद खामोशी से दफन कर दिया गया. सुना है कि इस कुर्बानी के बदले मधुसूदन को लालबत्ती से नवाजते हुए युवा आयोग का अध्यक्ष बनाया जा सकता है.

अब जबकि अभिषेक सांसद बनने की ओर हैं तब एक बड़ा सवाल जेहन में यह है कि वे लम्बी राजनैतिक पारी खेलेंगे या देवव्रत सिंह और मधुसूदन यादव जैसे युवा चेहरों की तरह अगले चुनाव तक फुस्स हो जायेंगे. अंचल का दुर्भागय कह लीजिये कि राजपरिवार के आश्रय में पल-बढ़ रहा राजनांदगांव आज भी देश में पहचान के लिये मोहताज है. अगले पांच साल बाद तय होगा कि बाबा ने खुद का राजनैतिक धरातल किस कदर मजबूत किया है? फिलहाल भाजपा और कांग्रेस के संसदीय फलक पर जो युवा चेहरे जमे हैं, उनमें तरूणाई तो गायब सी हो गई है. भाजपा के दिनेश कश्यप, कांग्रेस के देवव्रत सिंह और कुछ हद तक दुर्ग की सरोज पाण्डे को छोड़ दें तो अभिषेक सिंग के रास्ते में ज्यादा अवरोध नहीं है. वे अपने पिता की तरह ही छुपे रूस्तम साबित हो सकते हैं क्योंकि सियासी शालीनता और परिपक्वता के मुकाबले अभिषेक सबसे बीस ही नजर आते हैं. मगर फिर भी बाबा को जंग खाई मुरझाई सोच को तिलांजलि देकर आगे बढऩा होगा. पिता का आभामण्डल-जो इनके इर्द-गिर्द बना है-को तोडक़र खुद की देशव्यापी छबि बनाने की चुनौती है. मन में आशा के फूल खिले हैं कि अभिषेक उस शून्य को जरूर भरेंगे जो शुक्ल-युग के अवसान के बाद देश की राजनीति में छत्तीसगढ़ के लिये पैदा हो गया है. हमारी शुभकामनाएं साथ हैं.

अनिल द्विवेदी
लेखक राजनीतिक टिप्पणीकार हैं

Friday, March 21, 2014

विषम कोण : 

तकनीक के आगे हारी नैतिकता ?

रोहित बनाम एनडी तिवारी के मामले में यह साबित हो चुका है कि जब नैतिक-धर्म कमजोर पड़ जाता है तो विज्ञान ना सिर्फ उम्मीद के तौर पर आपके साथ है बल्कि वह दूध का दूध और पानी का पानी करने की क्षमता भी रखता है. डीएनए जांच से ही साबित हुआ कि रोहित के गुणसूत्र तिवारी से मेल खाते हैं! इसके बाद तिवारी ने आत्मसमर्पण कर दिया. विज्ञान और रोहित के हौसलों के आगे नैतिक धर्म की हार हुई है!

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पुरानी कथा है. राजा उत्तानपाद की दो पत्नियां सुनीति और सुरूचि थी जिन्हें सुनीति से धु्रव और सुरूचि से उत्तम नामक पुत्र प्राप्त हुए थे. वैसे तो सुनीति बड़ी रानी थी लेकिन राजाजी का दिल सुरूचि के लिये ज्यादा धडक़ता था. एक दिन धु्रव राजा की गोद में बैठे खेल रहा था तभी छोटी रानी सुरूचि वहां आई और उसने ध्रुव को पिता की गोद से उतारते हुए अपने पुत्र को राजा की गोद में बैठाते हुए ध्रुव से कहा : तू मेरी कोख से पैदा नहीं हुआ है इसलिए उनकी गोद में या राजसिंहासन में बैठने का अधिकार तुझे नहीं है.. कहानी का अंत और निष्कर्ष दूसरी तरह का है लेकिन यहां इसका जिक्र हम नारायण दत्त तिवारी और उनके बेटे रोहित शेखर के बीच जारी विवाद से जोडक़र देखना चाहते हैं.

नैतिकता खखारने वालों के लिये यह अतिश्योक्ति कदापि नहीं होगी कि पूर्व मुख्यमंत्री, 87 साल के नारायण दत्त तिवारी के बेटे रोहित ने जो लड़ाई लड़ी, वह धु्रुव की लड़ाई से ज्यादा सम्मानीय है. सराहनीय भी है और प्रेरणास्पद भी. पैंतीस साल तक लावारिस होने का दंश झेल रहे रोहित ने ना सिर्फ पितृ-सुख हासिल करने का अधिकार हासिल किया बल्कि सालों से सुहाग के नाम से वंचित अपनी माँ को भी न्याय दिलाया. जिस समाज के अजीबोगरीब तर्कों के आगे भगवान राम तक ने घुटने टेक दिये (सीता की अगिनपरीक्षा) उस कलियुगी समाज में सालों तक किसी महिला का बिना पति के अकेले गुजर-बसर करना कितना त्रासद भरा रहा होगा, इसका दर्द उस माँ से ज्यादा भला कौन महसूस कर सकता है? या बिना पिता का नाम लिये दोस्तों के बीच उठना-बैठना, मार्कशाीट तक में पिता के नाम के लिये तरसना, रोहित के लिये कितना अपमानजनक रहा होगा, सहज अंदाजा लगाया जा सकता है. 

ऐसा नहीं है कि रोहित शेखर की माँ ने पति का अधिकार हासिल करने के लिये अनुनय-विनय नहीं किया होगा मगर एक शक्तिशाली राजनीतिज्ञ का नशा तिवारी पर इस कदर चढ़ा था कि उन्होंने इस अबला की दलीलें कई बार खारिज कर दी. एक बार तो उनके बंगले में ही खासा विवाद हुआ था. रोहित की मां उज्जवला शर्मा, पूर्व केन्द्रीय मंत्री प्रो. शेरसिंह की पुत्री हैं और तिवारी जब उत्तरप्रदेश के  मुख्यमंत्री थे, तब उनके संपर्क में आई थीं. चंद मुलाकातों में ही दोनों के बीच रिश्ते बन गये. सत्ता की संवेदनाओं की बंजर जमीन पर पकती आंकांक्षा और उत्तेजना की फसल से बेखबर, एनडी ने उनकी काफी मदद भी की और इतना शक्तिशाली बना दिया था कि उज्जवला के बिना सीएम हाउस का पत्ता तक नहीं खडक़ता था लेकिन जब वे गर्भवती हुईं तो तिवारी ने उन्हें शादीशुदा होने का हवाला देते हुए अपनाने से साफ इंकार कर दिया. 

बहस-तर्क  और परेशानी झेलने के बाद भी जब ढीठ राजनीतिक एनडी तिवारी नहीं माने तो रोहित पितृत्व हासिल करने और मां को उसका पति-अधिकार दिलाने के लिये न्यायालय की शरण में चले गये. जिरह के दौरान न्यायालय ने जब डीएनए टेस्ट करने का आदेश दिया तो राजनीतिक दर्शन का मुलम्मा चढ़ाकर अब तक बचते आये रसिकमिजाज तिवारी अंतत: उन्हें यह टेस्ट देना पड़ा. उसके बाद आई रिपोर्ट में यह साफ हो गया कि तिवारी ही रोहित के पिता हैं! 

सत्ता के बाएँ रहने वाले लोग मानते हैं कि तिवारी की रासलीलाओं का खेल नया नहीं है. यह तब से चल रहा है जब वे पहली बार विधायक और मुख्यमंत्री बने. पहले उत्तरप्रदेश और अब उत्तराखण्ड में उनके रसिकमिजाज के चटखारे लोग लेते ही रहते हैं. उत्तराखण्ड का मुख्यमंत्री बनने के बाद तिवारी की लीलाएं जारी रहीं. स्टैला डेविड कांड लोग भूले नहीं हैं. उनके वर्षों पुराने एक निजी सचिव को संदिग्ध परिस्थितियों में बाथरूम में मृत अवस्था में पाया गया था लेकिन मामला मीडिया प्रबंधन के जरिए हवा-हवाई हो गया. हालांकि तिवारी, अमरमणि, मदेरणा, चंद्रभान या गोपाल काण्डा की तरह दोगले नही हैं जो प्यार के नाम पर अवैध संबंधों का खेल खेलते हैं, फिर प्रेमिका को या तो मरवा देते हैं या आत्महत्या के लिये विवश कर देते हैं लेकिन पाप छुपाने का प्रयास तो तिवारी ने बेशर्मी की हद तक किया ही. 

विकासशील दौर में यह बहस अभी भी जिंदा है कि विज्ञान बड़ा या धर्म लेकिन रोहित बनाम एनडी तिवारी के मामले में यह साबित हो चुका है कि जब नैतिक-धर्म कमजोर पड़ जाता है तो विज्ञान ना सिर्फ उम्मीद के तौर पर आपके साथ है बल्कि वह दूध का दूध और पानी का पानी करने की क्षमता भी रखता है. रोहित-एनडी तिवारी प्रकरण का सत्य उजागर करने में डीएनए यानि जीवनसूत्र नामक चिकित्सा तकनीक की अहम भूमिका रही है. आयु के साथ व्यक्ति के डीएनए यानि जीवन-सूत्र में कोई बदलाव नहीं आता है अत: जन्म से मृत्यु पर्यंत डीएनए एक सा ही रहता है. अपने जैविक माता-पिता से प्राप्त इस जीवन-सूत्र में छिपी हुई सूक्ष्म विभिन्नताओं के आधार पर प्रत्येक जीव को किसी भी अन्य जीव से अलग पहचाना जा सकता है. रोहित को उसका पितृत्व अधिकार दिलाने में इसी तकनीक ने अहम भूमिका अदा की. न्यायालय के निर्देश पर हुई डीएनए जांच में स्पष्ट हो गया कि रोहित के गुणसूत्र तिवारी से मेल खाते हैं! इसके बाद तिवारी ने आत्मसमर्पण कर दिया.  साफ है कि विज्ञान और रोहित के हौसलों के आगे नैतिक धर्म की हार हुई है!

अनिल द्विवेदी
(लेखक रिसॅर्च स्कॉलर हैं)