Saturday, October 17, 2015

किस मिट्टी के थे भाखरे साहब

शब्द=श्रद्धांजलि : दिनकर केशव भाखरे 


83 वर्षीय दिनकर केशव भाखरे, राष्ट्रवादी विचारधारा के आदर्श पत्रकार थे। स्वदेशी मन और कर्म ही उनकी पहचान रही। वे अपने परिवार से ज्यादा समाज के लिए जीए। कैंसर परछाई की तरह उनके साथ रहा लेकिन उसने उनमें कभी आत्मदया, कातरता या पराजय बोध नही जगने दिया। आगे पढ़ें : 

वरिष्ठ पत्रकार और पं. दीनदयाल उपाध्याय शोध पीठ के अध्यक्ष दिनकर केशव भाखरे (83 वर्ष) के पार्थिव शरीर को अगिन के सुपुर्द करके जब मैं वापस लौट रहा था तो मेरे सखा प्रभात मिश्र ने श्रद्धाँजलि स्वरूप यही शब्द कहे। उनका शरीर मिट्टी का था, उसी में मिल गया। अगिन भी इस शरीर को पाकर तेजोमयी हुई होगी जिसकी आत्मा ने खुद को समाज या देश हित के लिए तिल-तिलकर जलाया। भाखरे साहब किस मिट्टी के बने थे, यह जानना इसलिए जरूरी है क्योंकि वैसी जीवटता हम सभी में होनी चाहिए जैसा कि उन्होंने जी या दिखाई। गुजरे तीन महीने उनके लिए पीड़ादायक रहे लेकिन समाज के लिए जो किया या संगठन के लिए जोड़ा, दाह-संस्कार स्थल पर उमड़ी भीड़ इसकी गवाह थी। श्रद्धाँजलि देते हुए विधानसभा अध्यक्ष गौरीशंकर अग्रवाल ने कहा : परिवार से ज्यादा समाज के लिए  जिया जाये, भाखरेजी का यही संदेश है। 

ईशोपनिषद् ने कहा है : क्रतो स्मर: कृतम् स्मर:। भाखरेजी के जीवन मूल्य उस शिला के थे जिसकी रज, पद को सुशोभित करती है। वे मेहनती, मिलनसार, समय के पाबंद और कार्यकर्ताओं की कद्र करने वाले शख्स थे। उनकी तेज बुद्धि, चारित्रिक शक्ति, संयमित वाणी या अपार धैर्य का कुछ ऐसा असर था कि लोग उनसे जुड़ते चले गए। इस प्रखर आत्मा से मेरा मिलना सन् 1990 के आसपास हुआ तब वे राष्ट्रवादी विचारधारा के साथ स्वदेश और युगधर्म जैसे अखबारों को पुष्पित-पल्लवित करने में लगे थे। एक सीनियर के तौर पर मेरे लिए सबक था कि विचारधारा और पत्रकारिता के टकराव से बचना। हालांकि बाजारी ताकतें यह संभव नहीं होने दे रहीें। 

औरों के मुकाबले मेरे ऊपर भाखरेजी की कृपा दृष्टि ना के बराबर ही पड़ी लेकिन इसके उलट मेरे मन में उनके लिए हमेशा सम्मान बना रहा। मैं उनके दम गुर्दे का घनघोर प्रशंसक हूं। वे मुझे विलक्षण संयम और वस्तुनिष्ठ तटस्थता वाले व्यक्ति लगे। समयकाल अनुरूप रिश्तों पर जो बर्फ जम जाती थी, उसे पिघलाने में वे माहिर थे। स्वदेशी आंदोलन के साथ जुड़े तो मात्र दिखावे के लिए नहीं वरन् स्वदेशी उनके कर्तत्व में रच-बस गया था। भाखरे जी के साथ कैंसर परछाई की तरह साथ रहा लेकिन आत्मबल और गौमूत्र चिकित्सा के भरोसे वे उसे मात देते रहे। और यह शारीरिक अवस्था उनमें कभी आत्मदया, कातरता या पराजय बोध नही जगा सकी। उन्होंने एक प्रचारक सा जीवन जिया। सालों तक आरएसएस के संघ शिक्षा वर्ग में तृतीय वर्ष के स्वयंसेवकों को प्रशिक्षण देते रहे। घर में मात्र दो जून की रोटी के लिए ही ठहरते बाकी का समय संघ और उससे जुड़े संगठनों के लिए खपाते रहे। 

उनका व्यक्तित्व तुलसीदास के शब्दों में विसद-गुनमयफल जैसा है। उन्होंने पत्रकारिता का इस्तेमाल अपना घर-बार भरने, राजनीति करने या सत्ता में भागीदारी करने के लिए नही किया अन्यथा बारह साल की पत्रकारिता में मैंने कई श्लाघा-पुरूषों को समय-काल अनुरूप सत्ता की जुगाली करते देखा है। ताउम्र किसी विचारधारा के प्रति समर्पित होना अपने आप में एक चुनौती होता है। कुटिल राजनीति, पूंजीवादी पत्रकारिता और आयातित विचारधारा से ग्रस्त समय की मार के कई थपेड़े उन्होंने सहे लेकिन विचलित हुए बिना आगे बढ़ते रहे। सुना है कि मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने खुद यह कहकर कि-भाखरेजी के लिए कुछ करना है-उन्हें दीनदयाल शोध पीठ का अध्यक्ष बनाया। महज ऑबलाइज करने के लिहाज से सरकार ने तीन-चार शोध-पीठ जरूर बनाई हैं लेकिन उसे सुशोभित कर रहे महानुभावों ने अपनी आत्मकथा लिखने के सिवाय कुछ नहीं किया मगर भाखरेजी इनसे जुदा थे।

वैचारिक प्रतिबद्धता कह लें या एक पत्रकार का समाज को कुछ देकर जाने का जुनून, दीनदयाल उपाध्याय शोधपीठ में रहकर जितना संभव हो सका, भाखरे जी ने किया। स्वामी विवेकानंद शाद्र्धशती समारोह हो या दीनदयाल उपाध्याय की जयंती, उन्होंने दोनों ही आंदोलनों की कमान संभाले रखी और उसे सार्थक मुकाम तक पहुंचाया। स्वेदशी मेला और स्वदेशी भवन जैसी बुलंद इबारतें, उन्हीं की प्रयोगधर्मिता का परिणाम हैं। दिनकर कभी मरा नहीं करते। भाखरेजी ने आदर्श जीवन जीने की जो पगडंडी हमें दिखाई है, वह अमूल्य धरोहर है, सुपुत्र दिगिवजय के अंश में वे हमारे बीच हमेशा बने रहेंगे। विनम्र श्रद्धाँजलि..!

अनिल द्विवेदी
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार तथा रिसर्च स्कॉलर हैं)
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Saturday, September 19, 2015

देश पहचान गया मगर आप नहीं


संदर्भ : राहुल गांधी और लालू प्रसाद यादव का यह सवाल कि आरएसएस में महिलाओं को तवज्जो क्यों नही मिल रही?

अजब संयोग कह लीजिए कि जिस दिन बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और भारतीय राजनीति के स्थायी व्यँगय बन चुके लालू प्रसाद यादव, आरएसएस में महिला सरसंघचालक अब तक ना होने का मुद्दा उठा रहे थे, ठीक उसी दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बैनरतले आयोजित अखिल भारतीय कार्यशाला का समापन हो रहा था। जयपुर में दो दिनों तक चले इस वैचारिक कुंभ का विषय स्त्री और भारतीय समाज था। देशभर से पहुंचे विद्वान लेखक, स्तंभकार, पत्रकार और संपादक-जिनमें अधिकांश महिलाएं थी-ने भारतीय महिला के गौरवशाली इतिहास, सामाजिक, आर्थिक और परिवारिक व्यवस्था में महिला का योगदान, प्रगतिशील आंदोलनों और समानता का अधिकार जैसे विषयों पर विशेषज्ञों ने मन और दिमाग की खिडक़ी खोलकर चर्चा की तथा इस नतीजे पर पहुंचे कि देश की महिलाओं को ना सिर्फ सम्मानजनक समानता का अधिकार मिलना चाहिए बल्कि परिवार और समाज की केन्द्रीय इकाई होने के नाते, गरीब और पिछड़ी महिलाओं को जल्द से जल्द आरक्षण दिए जाने में बुराई क्या है?

लालू यादव ने यह सवाल अकेले उठाया हो, ऐसा नही है। कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी से लेकर पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम और छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता ने भी यही सवाल खड़ा किया है कि आरएसएस में महिलाओं के लिए कोई स्थान नही है! पूरी कांग्रेस पार्टी वैचारिक तौर पर किस कदर खोखली हो चुकी है, इसकी गवाही यह सवाल दे रहा है। वर्ना किसी पार्टी के युवराज या प्रवक्ता को प्रोफेशनली ही सही, अपने वैचारिक प्रतिद्वंद्वी के सांगठनिक ढाँचे की ठीक-ठाक समझ तो होनी ही चाहिए। लेकिन लालू और कांग्रेस प्रवक्ता ने बयानों के जो कोड़े आरएसएस पर फटकारे हैं, वे उन्हीं की पीठ पर जा चिपके हैं। जिस पार्टी की महिला कार्यकर्ता शारीरिक शोषण का शिकार या तंदूर में भून दी जाती हों, उन्हें यह सवाल उठाते वक्त चुल्लू भर पानी भी अपने पास रखना था। फिल्म अभिनेत्री नगमा जैसी महिला कांग्रेस कार्यकर्ताओं का दर्द भी किसी से छुपा नही है।

पहले यह समझ लें कि आरएसएस कांग्रेस नही है और ना ही राष्ट्रीय जनता दल, जहां लोकतांत्रिक ढंग से पूछे गए सवाल, तानाशाही या चापलूसी के मकडज़ाल में दम तोड़ देते हैं। गुलाबी नगरी जयपुर में स्त्री को केन्द्र में रखकर आयोजित संगोष्ठी में सरसंघचालक मोहन भागवत जी ने एक महिला विद्वान के सवाल के जवाब में कहा : हिन्दु समाज को संगठित करने के उद्देश्य के साथ, अपनी शक्ति और सामथ्र्य को नापते हुए जिस दौर में आरएसएस ने जन्म लिया, उस समय महिलाओं के संगठन की उतनी जरूरत महसूस नहीं हुई लेकिन सालों बाद जब आवश्यकता लगी तो संघ ने राष्ट्र सेविका समिति (आरएसएस) रूपी समानांतर महिला संगठन की शुरूआत सन् 1936 में महाराष्ट्र के वर्धा में की गई। श्री भागवत के अनुसार पहले महिलाओं को सीधे आरएसएस का हिस्सा बनाने पर सहमति हुई मगर महिलाओं को पुरूषों की बराबरी से आगे बढ़ाने का अवसर देने के उद्देश्य से समिति का निर्माण हुआ जिसमें प्रमुख संचालिका का पद (वर्तमान में वं. शांतक्का) सर्वोच्च है। इस संगठन से जुडक़र हजारों महिलाएं देश, समाज और परिवार को संवारने में लगी हुई हैं।

जानना जरूरी है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 35 से ज्यादा संगठन समाज जीवन में सक्रिय हैं जिनके माध्यम से हजारों महिलाएं जुडक़र समाज और देशसेवा में जुटी हुई हैं। विशेषतौर पर भाजपा, एबीवीपी, मजदूर संघ, सेवा भारती और विद्या भारती में महिलाओं का खासा प्रतिनिधित्व देखा जा सकता है। भाजपा ने जब अपने सांगठनिक ढांचे में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने की ओर कदम बढ़ाए तो आरएसएस ने दिल खोलकर स्वागत किया था।

दूसरी ओर संघ-प्रमुख मोहन भागवत जी के उत्तर से जो प्रेत-सवाल निकला है, वह लालू यादव सहित कांग्रेस या दूसरे अन्य राजनीतिक दलों के लिए ना सिर्फ आईना की तरह है बल्कि अन्य सामाजिक और सांस्कृतिक संगठनों को खुद में झांकने को विवश करता है। यहां ठहरकर यह सोचना गलत ना होगा कि देश के प्रमुख राजनीतिक दलों द्वारा महिलाओं को समान अधिकार दिलाने के दावे कितने भी किए जाते रहे हों लेकिन ईमानदारी से कहें तो क्या महिलाएं पुरूषों के वर्चस्व को तोडऩे में सफल हो पाई हैं? हाल यह है कि कई राजनीतिक दलों में अपना वाजिब स्थान पाने के लिए उन्हें अभी भी पुरूषों की कृपा पर निर्भर रहना पड़ता है। कांग्रेस को छोड़ दीजिए तो समाजवादी पार्टी या राजद में और भी बुरी स्थिति है जहां महिला आरक्षण के सवाल पर ही औचित्य खड़े किए जाते रहे हैं और जिनके चलते महिला आरक्षण बिल आज तक संसद से पारित नहीं हो सका।

बिना किसी जिरहबख्त के कांग्रेस से ज्यादा लालू यादव के सवाल में थोड़ी गंभीरता नजर आती है। वे लालू ही थे जिन्होंने चारा घोटाले के फेर में खुद के जेल जाने पर अपनी पत्नी राबड़ी देवी को चौके-चूल्हे से उठाकर सीधे मुख्यमंत्री की कुर्सी पर ला बिठाया था। कहना गलत ना होगा कि लगभग बीस साल पहले हुई यह पहल पुरूषों के वर्चस्व वाले समाज में महिलाओं के लिए एक उम्मीदभरी, सम्मानजनक शुरूआत थी लेकिन लालू ना भूलें कि उनकी पार्टी के अडिय़ल रवैये के चलते ही महिला आरक्षण बिल संसद में अब तक पेश नही हो सका है। स्पष्ट है कि लालू महिलाओं के सम्मान के मुद्दे पर अपनी राजनीतिक रोटी सेंक रहे हैं क्योंकि अगले महीने होने जा रहे बिहार विधानसभा चुनाव में उन्हें करो या मरो जैसी चुनौती से जूझना पड़ रहा है।

शायद कांग्रेस के नेता इस लोकोक्ति पर यकीन रखते हैं कि एक झूठ को सौ बार बोलो तो वह सच लगने लगता है मगर उन्हें याद होना चाहिए कि संघ के बारे में ऐसा ही एक झूठ गांधी-हत्या को लेकर कांग्रेस के नेता आजादी के समय से दुष्प्रचारित करते आए हैं लेकिन देश ने कभी उस पर भरोसा नही जताया उल्टा अर्जुन सिंह जैसे दिवंगत कांग्रेस नेता को इस आरोप के लिए माफी मांगनी पड़ी थी। अबकि बार कांग्रेस ने बड़प्पन का जो फतवा जारी किया है, वह उसी के लिए आईना बन चुका है।

अनिल द्विवेदी
(लेखक रिसर्च स्कॉलर और अतिथि प्राध्यापक हैं)
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इस आरएसएस को नही पहचानते आप


संदर्भ : राहुल गांधी और लालू प्रसाद यादव का यह सवाल कि आरएसएस में महिलाओं को तवज्जो क्यों नही मिल रही?

अजब संयोग कह लीजिए कि जिस दिन बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और भारतीय राजनीति के स्थायी व्यँगय बन चुके लालू प्रसाद यादव, आरएसएस में महिला सरसंघचालक अब तक ना होने का मुद्दा उठा रहे थे, ठीक उसी दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बैनरतले आयोजित अखिल भारतीय कार्यशाला का समापन हो रहा था। जयपुर में दो दिनों तक चले इस वैचारिक कुंभ का विषय स्त्री और भारतीय समाज था। देशभर से पहुंचे विद्वान लेखक, स्तंभकार, पत्रकार और संपादक-जिनमें अधिकांश महिलाएं थी-ने भारतीय महिला के गौरवशाली इतिहास, सामाजिक, आर्थिक और परिवारिक व्यवस्था में महिला का योगदान, प्रगतिशील आंदोलनों और समानता का अधिकार जैसे विषयों पर विशेषज्ञों ने मन और दिमाग की खिडक़ी खोलकर चर्चा की तथा इस नतीजे पर पहुंचे कि देश की महिलाओं को ना सिर्फ सम्मानजनक समानता का अधिकार मिलना चाहिए बल्कि परिवार और समाज की केन्द्रीय इकाई होने के नाते, गरीब और पिछड़ी महिलाओं को जल्द से जल्द आरक्षण दिए जाने में बुराई क्या है?

लालू यादव ने यह सवाल अकेले उठाया हो, ऐसा नही है। कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी से लेकर पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम और छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता ने भी यही सवाल खड़ा किया है कि आरएसएस में महिलाओं के लिए कोई स्थान नही है! पूरी कांग्रेस पार्टी वैचारिक तौर पर किस कदर खोखली हो चुकी है, इसकी गवाही यह सवाल दे रहा है। वर्ना किसी पार्टी के युवराज या प्रवक्ता को प्रोफेशनली ही सही, अपने वैचारिक प्रतिद्वंद्वी के सांगठनिक ढाँचे की ठीक-ठाक समझ तो होनी ही चाहिए। लेकिन लालू और कांग्रेस प्रवक्ता ने बयानों के जो कोड़े आरएसएस पर फटकारे हैं, वे उन्हीं की पीठ पर जा चिपके हैं। जिस पार्टी की महिला कार्यकर्ता शारीरिक शोषण का शिकार या तंदूर में भून दी जाती हों, उन्हें यह सवाल उठाते वक्त चुल्लू भर पानी भी अपने पास रखना था। फिल्म अभिनेत्री नगमा जैसी महिला कांग्रेस कार्यकर्ताओं का दर्द भी किसी से छुपा नही है।

पहले यह समझ लें कि आरएसएस कांग्रेस नही है और ना ही राष्ट्रीय जनता दल, जहां लोकतांत्रिक ढंग से पूछे गए सवाल, तानाशाही या चापलूसी के मकडज़ाल में दम तोड़ देते हैं। गुलाबी नगरी जयपुर में स्त्री को केन्द्र में रखकर आयोजित संगोष्ठी में सरसंघचालक मोहन भागवत जी ने एक महिला विद्वान के सवाल के जवाब में कहा : हिन्दु समाज को संगठित करने के उद्देश्य के साथ, अपनी शक्ति और सामथ्र्य को नापते हुए जिस दौर में आरएसएस ने जन्म लिया, उस समय महिलाओं के संगठन की उतनी जरूरत महसूस नहीं हुई लेकिन सालों बाद जब आवश्यकता लगी तो संघ ने राष्ट्र सेविका समिति (आरएसएस) रूपी समानांतर महिला संगठन की शुरूआत सन् 1936 में महाराष्ट्र के वर्धा में की गई। श्री भागवत के अनुसार पहले महिलाओं को सीधे आरएसएस का हिस्सा बनाने पर सहमति हुई मगर महिलाओं को पुरूषों की बराबरी से आगे बढ़ाने का अवसर देने के उद्देश्य से समिति का निर्माण हुआ जिसमें प्रमुख संचालिका का पद (वर्तमान में वं. शांतक्का) सर्वोच्च है। इस संगठन से जुडक़र हजारों महिलाएं देश, समाज और परिवार को संवारने में लगी हुई हैं।

जानना जरूरी है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 35 से ज्यादा संगठन समाज जीवन में सक्रिय हैं जिनके माध्यम से हजारों महिलाएं जुडक़र समाज और देशसेवा में जुटी हुई हैं। विशेषतौर पर भाजपा, एबीवीपी, मजदूर संघ, सेवा भारती और विद्या भारती में महिलाओं का खासा प्रतिनिधित्व देखा जा सकता है। भाजपा ने जब अपने सांगठनिक ढांचे में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने की ओर कदम बढ़ाए तो आरएसएस ने दिल खोलकर स्वागत किया था। दूसरी ओर संघ-प्रमुख मोहन भागवत जी के उत्तर से जो प्रेत-सवाल निकला है, वह लालू यादव सहित कांग्रेस या दूसरे अन्य राजनीतिक दलों के लिए ना सिर्फ आईना की तरह है बल्कि अन्य सामाजिक और सांस्कृतिक संगठनों को खुद में झांकने को विवश करता है। यहां ठहरकर यह सोचना गलत ना होगा कि देश के प्रमुख राजनीतिक दलों द्वारा महिलाओं को समान अधिकार दिलाने के दावे कितने भी किए जाते रहे हों लेकिन ईमानदारी से कहें तो क्या महिलाएं पुरूषों के वर्चस्व को तोडऩे में सफल हो पाई हैं? हाल यह है कि कई राजनीतिक दलों में अपना वाजिब स्थान पाने के लिए उन्हें अभी भी पुरूषों की कृपा पर निर्भर रहना पड़ता है। कांग्रेस को छोड़ दीजिए तो समाजवादी पार्टी या राजद में और भी बुरी स्थिति है जहां महिला आरक्षण के सवाल पर ही औचित्य खड़े किए जाते रहे हैं और जिनके चलते महिला आरक्षण बिल आज तक संसद से पारित नहीं हो सका।
बिना किसी जिरहबख्त के कांग्रेस से ज्यादा लालू यादव के सवाल में थोड़ी गंभीरता नजर आती है। वे लालू ही थे जिन्होंने चारा घोटाले के फेर में खुद के जेल जाने पर अपनी पत्नी राबड़ी देवी को चौके-चूल्हे से उठाकर सीधे मुख्यमंत्री की कुर्सी पर ला बिठाया था। कहना गलत ना होगा कि लगभग बीस साल पहले हुई यह पहल पुरूषों के वर्चस्व वाले समाज में महिलाओं के लिए एक उम्मीदभरी, सम्मानजनक शुरूआत थी लेकिन लालू ना भूलें कि उनकी पार्टी के अडिय़ल रवैये के चलते ही महिला आरक्षण बिल संसद में अब तक पेश नही हो सका है। स्पष्ट है कि लालू महिलाओं के सम्मान के मुद्दे पर अपनी राजनीतिक रोटी सेंक रहे हैं क्योंकि अगले महीने होने जा रहे बिहार विधानसभा चुनाव में उन्हें करो या मरो जैसी चुनौती से जूझना पड़ रहा है।

शायद कांग्रेस के नेता इस लोकोक्ति पर यकीन रखते हैं कि एक झूठ को सौ बार बोलो तो वह सच लगने लगता है मगर उन्हें याद होना चाहिए कि संघ के बारे में ऐसा ही एक झूठ गांधी-हत्या को लेकर कांग्रेस के नेता आजादी के समय से दुष्प्रचारित करते आए हैं लेकिन देश ने कभी उस पर भरोसा नही जताया उल्टा अर्जुन सिंह जैसे दिवंगत कांग्रेस नेता को इस आरोप के लिए माफी मांगनी पड़ी थी। अबकि बार कांग्रेस ने बड़प्पन का जो फतवा जारी किया है, वह उसी के लिए आईना बन चुका है।

अनिल द्विवेदी
(लेखक रिसर्च स्कॉलर और अतिथि प्राध्यापक हैं)
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Wednesday, July 15, 2015

नए अवतार में धरम लाल कौशिक

!! छत्तीसगढ़ : भाजपा !!

सरकार के चिकने-चुपड़े पैरोकार भले ही इसका खंडन करें, मगर धीरे-धीरे ही सही, धरम लाल कौशिक ने प्रदेश भाजपा में अपनी जड़ें इस कदर जमा ली हैं कि पार्टी उन्हें वैकल्पिक चेहरे के तौर पर देख रही है। लाल बत्ती बांटने में श्री कौशिक ने अपने पॉवर का पूरा सदुपयोग किया और चार समर्थकों को सूची में एडजस्ट करा दिया। हालांकि सांसद रमेश बैस, सरोज पाण्डे, रामविचार नेताम, केदार कश्यप और बृजमोहन अग्रवाल जैसे वरिष्ठ विश्वसनीय चेहरों को पछाडऩा कौशिक के लिए बड़ी चुनौती होगी जो तीव्र और लपलपाती इच्छा के साथ मुख्यमंत्री बनने का सपना संजोए बैठे हैं।
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प्रदेश भाजपा की राजनीति दिन-प्रतिदिन करवटें बदल रही है। अंदरखाने से निकलकर आई ताजा खबर यह है कि प्रदेश भाजपा अध्यक्ष श्री धरम लाल कौशिक, संगठन और सरकार के बीच एक नई ताकत बनकर उभरे हैं। इसके संकेत ताजा मंत्रिमण्डल विस्तार से मिले हैं। सूत्रों के मुताबिक श्री कौशिक की सलाह पर मुख्यमंत्री ने चार चेहरों को लालबत्ती से नवाजा है। इनमें से दो चेहरे ऐसे हैं जिन्हें मुख्यमंत्री ना तो मंत्री बनाने के इच्छुक थे और ना ही कोई निगम-मण्डल पकड़ाना चाहते थे लेकिन ऐनवक्त पर कौशिक के प्रभावी हस्तक्षेप ने इन नेताओं का बेड़ापार करवा ही दिया। बाकी दो को भी प्रदेश भाजपा के मुखिया का आर्शीवाद मिला है।

सबसे ज्यादा पेंच विधायक युद्धवीर सिंह जूदेव को लेकर था। जशपुर जिला में जूदेव परिवार का खासा दबदबा और समर्थन है। स्व. दिलीप सिंह जूदेव ने जनता का जो विश्वास हासिल किया था, उसी का प्रतिफल है कि आज युद्धवीर दूसरी बार विधायक बने हैं। बतौर संसदीय सचिव उनका कार्यकाल सराहनीय रहा था। इस बार जूदेव मंत्री बनना चाहते थे लेकिन मुख्यमंत्री की नापसंदगी के चलते उनका सपना अधूरा ही रह गया मगर  कौशिक की कृपा के बाद वे आबकारी निगम के चेयरमैन तक पहुँच ही गए। दरअसल छोटे जूदेव के कार्यकलापों को लेकर सरकार, संघ और संगठन का एक धड़ा हमेशा चिंतित रहता आया है। कई नेताओं ने इसकी शिकायत ना सिर्फ मुख्यमंत्री से की बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी संदेश भेजा जा चुका है कि जूदेव को लाल बत्ती देना खतरे से खाली नहीं।

सब तरफ से निराशा हाथ लगने के बाद अंतत: छोटे जूदेव ने प्रदेश भाजपा अध्यक्ष धरम लाल कौशिक का दामन थामा जिसके बाद कौशिक ने संगठन महामंत्री राम प्रताप सिंह को मनाया और दोनों ने मिलकर मुख्यमंत्री से युद्धवीर को निगम-मण्डल में एडजस्ट करने की सिफारिश कर दी। मुख्यमंत्री सचिवालय के मुताबिक मंत्री ना बनने से गुस्साये युद्धवीर के समर्थकों ने जशपुर बंद रखते हुए डॉ. रमनसिंह का पुतला फूँका था जिससे पार्टी और संगठन के बड़े नेताओं के कान खड़े हो गए थे मगर जैसा कि भाजपा अनुशासन के मामले में बेहद सख्त मानी जाती है सो युद्धवीर को कड़ा संदेश भिजवा दिया गया। इसके बाद छोटे जूदेव कई दिनों तक डैमेज कंट्रोल में लगे रहे।

प्रदेश भाजपा अध्यक्ष का आर्शीवाद पाने वालों में एक नाम भूपेन्द्र सवन्नी का है। भाजपा के महामंत्री रह चुके सवन्नी, कौशिक के दाएं हाथ माने जाते हैं। दूसरा वे जिस सिख समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं, वह भाजपा का तगड़ा वोटबैंक भी है। सवन्नी एक तरफ कौशिक के सिपहसालार बने रहे तो दूसरी ओर बतौर महामंत्री, संगठनमंत्री रामप्रताप सिंह का विश्वास भी हासिल करते रहे। दोनों की नजदीकी का ही सिला रहा कि उन्हें हाऊसिंग बोर्ड जैसे कमाऊ विभाग की जिम्मेदारी दी गई है।

खादी ग्रामोद्योग बोर्ड के अध्यक्ष कृष्णा रॉय भी प्रदेश भाजपा अध्यक्ष धरम लाल कौशिक का आर्शीवाद लेने में सफल रहे। इसके पीछे पूर्व में पर्यटन मण्डल और फिर हस्तशिल्प बोर्ड के अध्यक्ष के तौर पर श्री रॉय का पिछला कार्यकाल बेदाग रहा था जिसके चलते उन्होंने मुख्यमंत्री का आर्शीवाद हासिल किया मगर श्री कौशिक ने इस बार रॉय का नाम खुद होकर आगे बढ़ाया नतीजन श्री राय, खादी तथा ग्रामोद्योग बोर्ड का पद हासिल करने में सफल रहे।

पहले विधायक और फिर राजधानी का महापौर बनते-बनते रह गए पार्टी के युवा नेता संजय श्रीवास्तव की सिफारिश भी प्रदेश भाजपा अध्यक्ष ने ही की। दरअसल युवा मोर्चा का अध्यक्ष रहते हुए श्रीवास्तव ने श्री कौशिक की मदद संगठन को तराशने में की थी। बतौर सभापति उनका कार्यकाल भी बेदाग और परिणामदायी रहा था। दूसरी ओर जातीय समीकरण के हिसाब से वे फिट बैठ रहे थे। पहले विधायक, फिर महापौर की टिकट से वंचित रहने वाले संजय श्रीवास्तव को निगम-मण्डल सौंपने का मन खुद मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने बना लिया था लेकिन प्रदेश भाजपा अध्यक्ष श्री कौशिक ने भी उन्हें गहरा समर्थन दे दिया। संभवत: इन्हीं समीकरणों के चलते श्रीवास्तव को रायपुर विकास प्राधिकरण जैसे विभाग की जिम्मेदारी मिली है।

तो साफ है कि श्री कौशिक अपनी आवश्यकता सिद्ध करते जा रहे हैं। इस पूरी कहानी का लब्बोलुआब यही है कि प्रदेश भाजपा अध्यक्ष धरम लाल कौशिक, संगठन और सरकार में एक ऐसे शिखर पुरूष के तौर पर उभरे हैं जो उदार आईने में फिट हैं तथा पार्टी के लिए विकल्प के तौर पर देखे जा रहे हैं। थोड़ा साफ करेंं तो उनके समर्थक उनमें मुख्यमंत्री पद का चेहरा भी नजर पाते हैं। हालांकि अपनी अदाभरी शालीन चुप्पी के साथ कौशिक इसे महज मीडिया का आंकलन करार देते हैं लेकिन सच यह है कि भविष्य में यदि मुख्यमंत्री पद के विकल्पों की तलाश पार्टी करती है तो जातीय समीकरण के हिसाब से कौशिक इस पर फिट बैठते हैं। हालांकि उनके समक्ष रमेश बैस, सरोज पाण्डे, नंद कुमार साय, रामविचार नेताम और केदार कश्यप जैसे वरिष्ठ विश्वसनीय चेहरे को पछाडऩा बड़ी चुनौती होगी जो तीव्र और लपलपाती इच्छा के साथ मुख्यमंत्री बनने का सपना संजोए बैठे हैं।

अनिल द्विवेदी
लेखक राजनीतिक समीक्षक हैं

Saturday, May 16, 2015

यहां लिबास की कीमत है, आदमी की नहीं

II संदर्भ : आइएएस अमित कटारिया का डेे्रस कोड विवाद II

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की बस्तर-यात्रा के दौरान दो बड़े हादसे हुए। एक तो रायपुर में जो उनकी सभा होनी थी, उसका मंच बनते-बनते धराशायी हो गया जिसमें एक काल-कलवित हो गया और बाकी अभी अस्पताल में ईलाज करवा रहे हैं। दूसरा 'हादसा' यह रहा कि प्रधानमंत्री के समक्ष आइएएस अमित कटारिया पैंट, शर्ट और चश्मे के साथ मुखातिब हुए जिस पर प्रधानमंत्री ने कुछ टिप्पणी की और उसके बाद यह बहस आग पकड़ चुकी है कि एक आइएएस को वीआईपी के समक्ष किस कदर पेश होना चाहिए? अफसोस कि घटना के एक सप्ताह बाद भी हम उस गले की पकड़ से दूर हैं जो पंडाल के गिरने, उससे हुई मौतें या दर्जनों घायलों की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार है लेकिन प्रधानमंत्री के समक्ष काला चश्मा लगाकर खड़े होने वाले आइएएस का गला नापने के लिए कई तैयार खड़े हैं। 

स्कूल में बच्चों-टीचर के लिए ड्रेस कोड है, सेना में अफसर-सैनिकों के लिए है। न्यायालय में न्यायाधीश-वकीलों के लिए है। पुलिस में सभी के लिए है। अस्पताल में है I कार्पोरेट हाऊजेस में भी ड्रेस कोड लागू है। वहां पर सिवाय शनिवार के बाकी दिन आपको पेंट, शर्ट और टाई में दिखना होगा। इसी तरह प्रशासन में भी ड्रेस की आचार संहिता है। प्रशिक्षु आइएएस जब प्रशिक्षण ले रहे होते हैं तभी से इसकी आदत डाल दी जाती है। इसके पीछे का एक मकसद समानता और अनुशासन का भाव स्थापित करना है। यहां तक कि बतौर आइएएस यदि आप न्यायाधीश के समक्ष हाजिर हो रहे हैं तो ड्रेस कोड जरूरी हो जाता है और ऐसी चूकें करने वालों को अदालतों ने फटकार भी लगाई है। 

और ऐसा सिर्फ भारत में ही नहीं है। हमने देखा हैकि अमरीकी राष्ट्रपति से लेकर दुनियाभर के प्रधानमंत्री के साथ जो अफसर होते हैं, ड्रेस कोड में ही झलकते हैं। 1984 में रोनाल्ड रीगन जब अमरीका के राष्ट्रपति थे तो उनकी सुरक्षा में लगे एक अफसर को ऐनवक्त पर हवाईजहाज में चढ़ने से रोक दिया गया था क्योंकि उसके सूटकेश का रंग सुरक्षा जांच से मेल नहीं खाता था। प्रधानमंत्री मोदी जब बस्तर पहुंचे तो मुख्य सचिव से लेकर सीएम के सचिव अमन सिंह, अपर मुख्य सचिव बैजेन्द्र कुमार तथा पुलिस महानिदेशक तक सभी ड्रेस कोड में थे। तस्वीर देखने से स्पष्ट है कि खुद मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने जैकेट और सफेद कुर्ता-पायजामा (नेताओं का ड्रेस कोड) पहनकर, प्रधानमंत्री मोदी का स्वागत किया; खुद प्रधानमंत्री जी ड्रेस कोड को लेकर गंभीर रहते दीखते आये हैं।

याद कीजिये उस वाकये को जब मोदी सरकार के केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर एक सरकारी आयोजन में जींस टी शर्ट्स पहनकर पहुंचे थे जिसे पीएम ने उचित नहीं माना था। उसके बाद जावड़ेकर वापस गए और जीन्स के ऊपर ब्लेज़र डालकर आये थे। हांलांकि इसकी पुष्टि नहीं हो सकी थी लेकिन संकेत साफ़ हैं कि कुछ जगहों पर ड्रेस कोड अनिवारयतः लागू होना चाहिए। लेकिन कटारिया जो कि उस जिले के कलेक्टर यानि प्रशासन के मुखिया थे, ने इसे संभवत: हल्के में लिया। उन्होंने पीएम मोदी का स्वागत पैंट, शर्ट और आंखों में चश्मा डालकर किया इसलिए पहली नजर में वे ड्रेस की आचार संहिता का अपमान करने के दोषी तो दिखते ही हैं। 

मगर सिर्फ कटारिया ही क्यों, छत्तीसगढ़ में ड्रेस कोड की धज्जियां तो कई बार उड़ाई गई हैं और वो भी मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के सामने। एक आइएएस राजनेताओं की तरह व्यवहार करने लगे, यह किस आचार संहिता में लिखा है? महीनों पूर्व सिविल लाइंस स्थित सर्किट हाऊस में मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह एक सरकारी योजना का लोकार्पण करने पहुंचे थे तब तत्कालीन अपर मुख्य सचिव स्तर के वरिष्ठ आइएएस अफसर ने जींस के ऊपर कुर्ता ओढ़ रखा था। संयोग देखिए कि खुद मुख्यमंत्री भी कुर्ता और जैकेट में थे तब मैंने मजाकिया अंदाज में अफसर से पूछा था कि आज तो ड्रेस कोड से अलग दिख रहे हैं तब उन्होंने हंसते हुए इसे टाल दिया था। राज्य में ड्रेस कोड की धज्जियां अफसरों के इस कदर उड़ाई हैं कि ब्लेज़र की जगह अब नेहरू जैकेट ने ले ली है। 

बात साफ है कि यदि प्रधानमंत्री के समक्ष कोई आइएएस पैंट, शर्ट या चश्मा पहनकर आने पर अनुशासनहीनता का दोषी हो सकता है तो मुख्यमंत्री के समक्ष जींस-कुर्ता पहने और चश्मा लगाकर खड़ा होना कैसे स्वीकार्य हो सकता है? लेकिन यह सब इसलिए चल रहा है या नजरअंदाज किया जा रहा है क्योंकि मखमली दिल वाले मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने आंखें तरेरने का स्वभाव कभी रखा ही नहीं। 
बहस-मुबाहिसों के बीच फेसबुक पर वरिष्ठ पत्रकार बरूणा सखाजी की  टिप्पणी पढ़ने को मिली कि हमें स्मार्ट सिटी और स्मार्ट फोन तो चाहिए मगर स्मार्ट अफसर नहीं। आइएएस अमित कटारिया उन चुनिंदा अफसरों में शुमार हैं जिन्होंने अपने कार्य-व्यवहार से लोगों का दिल इस कदर जीता है कि रायपुर से जब उनका स्थानांतरण हुआ था तो इसके खिलाफ सैकड़ों लोग सड़कों पर उतर आए थे और हस्ताक्षर अभियान चलाया था। वे अकेले अफसर होंगे जो सेलेरी के तौर पर मात्र एक रूपया लेते रहे हैं। यह भी सच है कि प्रधानमंत्री के समक्ष यूं पेश होना, घण्टों तक उमसभरी तीखी धूप से बचने की एक कवायद भर रही होगी लेकिन यहां सवाल ड्रेस कोड की एकरूपता के साथ-साथ नियम और अनुशासन में बने रहने तथा प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति का सम्मान ज्यादा अहम है। 

गुजरे साल तत्कालीन केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री जयराम रमेश एक विश्वविद्यालय में थे जहां उन्हें बतौर मुख्य अतिथि स्नातक छात्रों को डिग्रियां बांटनी थी और अचानक उन्होंने अपने शरीर ओढ़ा लबादा उतारकर फेंक दिया था। उनका तर्क था कि अंग्रेजों की दी हुई यह परम्परा हम कब तक ढोएंगे? संभवत: कटारिया ने भी एक नया संदेश देने की कोशिश की है जिसे स्वीकार करने की दरियादिली हमें दिखानी होगी। 

अनिल द्विवेदी 
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं 

Tuesday, May 5, 2015

पानी दे मौला, शराब नहीं


मुद्दा : आइपीएल क्रिकेट मैचों में वीआईपीज को शराब परोसने का. 

II गंगा स्नान II

"ये अक्ल वाले नही अहले दिल समझते हैं, क्यों शराब से पहले वुजू जरुरी है"

राज्य सरकार में ईमानदार मंत्री के रूप में ख्यात मगर इस बार विधायक का चुनाव हार चुके एक वरिष्ठ भाजपा नेता ने फोन किया और एक ही सांस में बहुत कुछ खरी-खोटी सुनाते चले गए। कहा कि आप लोग ना जाने किस-किस मुद्दे पर कलम चलाते हैं मगर जब ेेजनहित की बात हो तो स्याही क्यों सूख जाती है? वे मुझे सुनाते रहे और मैं सुनते हुए, सम्मान देते हुए मुस्कुराता रहा। प्यारभरी डांट में लिपटी मुद्दे की बात यह रही कि श्रीमान को यह गंवारा नहीं था कि जिस राज्य में आंशिक शराबबंदी हो, वहां सरकार के नियम-कायदों को अंगूठा दिखाते हुए आगामी 9 और 12 मई को होने वाले आइपीएल मैचों में वीआईपीज को या कार्पोरेट लॉबी में कंपनियों की ओर से शराब परोसी जाए।

नेताजी यही नहीं रूके बल्कि अपनी विवशता समझाते हुए बोले, क्या हो गया है पार्टी और सरकार के सिद्धातों को या फिर आरएसएस के कर्णधारों को जिन्होंने कभी शराबबंदी लागू करने का प्रस्ताव सरकार के समक्ष रखा था, आज वे ऐसे खामोश हैं मानो शराब ना हुई, दूध की नदियां बहने वाली हैं। वे यहीं नहीं रूके। बोले, चलो हमारी तो मजबूरी है कि अपनी ही सरकार में रहकर अपनों के खिलाफ कौन बोले या लड़े? लेकिन मीडिया किस दबाव में है जो इस कुप्रथा का विरोध तक नहीं कर सकता। चूंकि मुद्दा वाकई सरकार की नीतियों को ठेंगा दिखाने और जनहित के स्वास्थ्य से जुड़ा है इसलिए मैंने नेताजी से सिर्फ इतना ही कहा कि कल का अखबार देख लीजिएगा।

अब वादा किया है तो निभाना पड़ेगा ही। इसमें दो राय नही है कि मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह देश के उन चुनिंदा मुख्यमंत्रियों में शुमार हैं जिन्होंने यह जानते हुए भी कि प्रदेश के राजस्व का लगभग 20 प्रतिशत खजाना शराब बिक्री से आता है--ने बड़े साहस के साथ फैसला लेते हुए शराबबंदी की ओर कदम बढ़ाए। खासकर महिलाओं की व्यथा और दशा को समझते हुए उन्होंने यह कानून भी बना डाला कि जिस इलाके की 55 प्रतिशत महिलाएं शराबभट्टी का विरोध करेंगी, वहां से वह दुकान हटा दी जाएगी। आब.ए.आईना यह है कि राज्य में कोई 300 से अधिक शराब दुकानें बंद हो चुकी हैं। गुजरे दिनों महिलाओं के लम्बे विरोध के बाद राजधानी से लगे कुम्हारी इलाके में एक शराबभट्टी में ताला लग गया था।

फिलवक्त बड़ा और गहरा सवाल यह है कि क्या आइपीएल क्रिकेट मैचों का आयोजन हमारे लिए इतना ज्यादा प्रतिष्ठा का विषय बन गया है कि उसके लिए सारे नियम-कानूनों को धता बता दिया जाये? माना कि इसके आयोजन से छत्तीसगढ़ का नाम देश-दुनिया में गूंजता है। या एक बड़ा लालच यह भी है कि देश के कार्पोरेट जगत की निगाहें छत्तीसगढ़ की ओर दौड़ पड़ती हैं? लेकिन किसकी, कितनी कीमत चुकायेंगे, इसकी सीमा तो तय होनी ही चाहिए।

एनएसयूआई के नेता संजीव शुक्ला ने बड़ा सवाल खड़ा किया कि आज आईपीएल आयोजित करने वाली कंपनी जीएमआर ने छूट मांगी है, कल से राजधानी में कुकुरमुत्तों की तरह इवेंट आयोजित कर रही कंपनियां या फाइव स्टार हॉटल्स चाहेंगे कि उन्हें पार्टी या इवेंट्स में शराब परोसने की इजाजत दी जाए, तब कलेक्टर साहब के पास क्या जवाब होगा? वैसे भी कलेक्टर ने शराब परोसने की अनुमति किस आधार पर दी? उनसे अनुमति ली भी गई या नहीं, इन सारे प्रश्नों का जवाब जल्द तलाशना होगा। साफ है कि सरकार या अफसरशाही शराब लॉबी की गिरफ्त में है जो खुलेआम सरकारी पॉलिसी की धज्जियां उड़ते देखना चाहती है!

पिछली बार भी आईपीएल कराने वाली कंपनी को राज्य सरकार ने मनोरंजन टैक्स से छूट दे दी थी लेकिन यह नुकसान इसलिए मंजूर था क्योंकि बड़े फायदों के लिए छोटे नुकसान झेलने ही पड़ते हैं परंतु इस बार सवाल धन जाने का नहीं है बल्कि चरित्र खोने का है। आशय साफ है कि आईपीएल मैंचों की कार्पोरेट लॉबी में शराब परोसकर जिस तरह सरकार के नियम-नीतियों की धज्जियां उड़ेंगी, उससे तो यही संकेत मिलता है। और फिर ऐसा क्यों लग रहा है कि आप करो तो रामलीला और हम करें तो रासलीला। एक तरफ कंपनी धूप और पसीने से सूखते कंठ को तर करने को बैचेन सामान्य दर्शक से पानी की बॉटल तक छीन लेना चाहती है तो दूसरी ओर 20 हजार की टिकट खरीदने वाले एयरकंडीशंड के शौकीनों को पीने और पिलाने की पूरी आजादी है। वाह रे रामराज!

अनिल द्विवेदी
( लेखक वरिष्ठ पत्रकार और शोधार्थी हैं )

Tuesday, February 10, 2015

एके49 से एके67 तक

II हारता सावन II

"मोदी सरकार के नौ महीने पूरे हो गये। उसके पेट से जो विकासरूपी बालक जन्मा है, उसका नाम केजरीवाल है : फेसबुक पर वायरल हुआ एक चुटकुला।"

जैसे किसी ने बहते हुए दरिया को बोतल में बंद कर दिया हो और उसका जल उछलने को छटपटा रहा है, कुछ ऐसा हम भाजपा के साथ होता महसूस कर रहे हैं। इसे वरदान नहीं विडम्बना कह लीजिये कि मात्र नौ महीने पहले जिस नरेन्द्र मोदी को दिल्ली की जनता ने सातों लोकसभा सीटें देते हुए सरआंखों पर चढ़ाया था, आज उसी जनता ने भाजपा को उसकी सबसे शर्मनाक पराजय तक ला पटका है। धमाकेदार जीत के साथ केजरीवाल आज प्रासंगिक तो हैं ही, कालजयी भी हो गये हैं। उनके विजन, मेहनत और जीतने योगय रणनीति को लाखों सलाम! शुभकामनाएँ!  

तमाम दुष्प्रचारों को धता बताते हुए दिल्ली की जनता ने जिस तरह आम आदमी पार्टी पर दुबारा भरोसा जताया है, वह भाजपा-कांग्रेस सहित दूसरे राजनीतिक दलों के लिए खतरे की घण्टी की तरह है। सोलह सालों से राजनीतिक वनवास भोग रही भाजपा, इस दावे के साथ किरण बेदी को लेकर आई थी कि बेदी नया चेहरा हैं और दिल्ली में वे खासी लोकप्रिय हैं, लेकिन यह मृगमरीचिका तब साबित हुई जब बेदी भाजपा का गढ़ माने जाने वाले कृष्णा नगर सीट से चुनाव हार गईं। एक न्यूज चैनल पर भाजपा कार्यकर्ता ने उनकी हार पर आक्रोश व्यक्त करते हुए कहा : जिस बेदी ने कभी ब्यूरोक्रेट्स रहते हुए कार्यकर्ताओं पर लाठियां भांजी थीं, हम उन्हें मुख्यमंत्री कैसे बनते देखते? दूध का जला छाछ भी फूंककर पीता है लेकिन भाजपा ने पिछली गल्तियों से कोई सबक नहीं लिया। 

भूले नहीं होंगे कि 2005 के लोकसभा चुनावों में भाजपा ने छत्तीसगढ़ की महासमुंद सीट से कांग्रेस के वरिष्ठ नेता स्व. विद्याचरण शुक्ल को बतौर उम्मीदवार बनाकर उतारा था तब भाजपा-संघ के कार्यकर्ताओं ने उन्हें सिरे से खारिज कर दिया था और शुुक्ल एक लाख से ज्यादा मतों से हार गए थे। यह सवाल रह-रहकर फन फैला रहा है कि जब पार्टी के पास पेशेवर नेताओं की फौज थी तो उसने सबको धकियाते हुए किरण बेदी को क्यों ला खड़ा किया? सभी बड़े नेता अनुशासन का डण्डा चलने के डर से मन मसोसकर शांत हो गए थे लेकिन देवतुल्य भाजपा कार्यकर्ताओं को लगा कि झूठे दिलासों के कफन ओढ़कर कब तक इंतजार करेंगे सो वे ना सिर्फ घर बैठ गए! 

और सिर्फ कार्यकर्ता ही क्यों, भारतीय लोकतंत्र की यही खासियत है कि वह अधिनायकवादी फैसलों के आगे कभी नहीं झुका। चाहे इंदिरा गांधी का दौर रहा हो या फिर वर्तमान में मोदी और शाह का। इस हार-जीत को हम जिस उजाले में देखने का प्रयास कर रहे हैं, उसके मुताबिक दिल्ली विधानसभा चुनाव के मीठे-खट्ठे परिणामों के बीच तीन प्रमुख कारण निकलकर आए हैं : पहला है ईमानदार चेहरा, दूसरा केडरबेस काम और तीसरा रणनीतिपूर्वक आगे बढ़ना। आश्चर्य कि आप पार्टी इसमें सफल रही जबकि भाजपा की चाल डगमगाती रही। 
केजरीवाल ने मोदी और शाह की तरह पार्टी को अपनी दृष्टि से नहीं बल्कि जनता की दृष्टि से गढ़ने की कोशिश की। 

जबान की फिसलन भी भाजपा को ले डूबी। एक तरफ भाजपा नेता ऐलानियां आप को धमकाते रहे तो दूसरी ओर केजरीवाल का आत्मविश्वास आकार लेता गया। मोदी और भाजपा जहां केजरीवाल को एके47, नक्सली, हरामजादा और चोर बताते रहे, वहीं दूसरी ओर आप के कार्यकर्ता और नेता पिछली गल्तियों के लिए जनता से माफी मांगते हुए दिल जीतते चले गए। केजरीवाल ने छप्पर फाड़ जीत हासिल कर 67 सीटें जीतकर एके47 का करारा जवाब दिया है। एक बानगी देखिए कि मतदान के एक दिन पहले प्रवक्ता आशुतोष ने बयान दिया कि हमें बुखारी का समर्थन नहीं चाहिए क्योंकि नवाज शरीफ को आमंत्रण देकर उन्होंने देश के प्रधानमंत्री का अपमान किया था। यह बयान भी भाजपा की जीत के लिए अंतिम कील साबित हुआ। 

समय से बहस करते हुए भाजपा की हार को धड़कनों की समग्रता में महसूस करने की जरूरत है। पार्टी और नेताओं को सर्वानुमति का सम्मान करना होगा। आरएसएस को भी भाजपा के उन बुलडोजरी फैसलों का विरोध करना सीखना होगा जिसमें अधिनायकवाद की बू आती है अन्यथा आज भाजपा कार्यकर्ता घर बैठे हैं, कल से स्वयंसेवक भी गंभीरता से लेना बंद कर देंगे। 

चलिए जो जीता, वो सिकंदर। बहुत उम्मीद और भरोसे के साथ केजरीवाल में जनता ने एक ऐसे सुपर स्टार को देखा है जिससे ढेरों आशाएं और उम्मीदें जुड़ी हैं। दिल्ली ने पिछले सालों में लाखों बेरोजगार उगले हैं। सुरक्षा, बिजली और पानी की गारंटी भी बड़ी चुनौती है। उम्मीर करें कि पांच साल बाद अरविंद केजरीवाल की सरकार, कांग्रेस की शीला दीक्षित सरकार से ज्यादा बड़ी लकीर खींचकर दिखाएगी। 

अनिल द्विवेदी ( लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं )