Tuesday, November 25, 2014

किसका कोड़ा, किसकी पीठ

।। गंगा स्नान।।

पहले एक बयान : एक माँ का श्राप है जिम्मेदार कभी सुखी नही रहेंगे, यह दर्द दुलौरिन की सास के हैं जिसने बिलासपुर नसबंदी काण्ड में अपनी बहू को खो दिया है.

अब वाट्स अप पर आए मजाकिया संदेश पर गौर करें : मुख्यमंत्री कहते हैं : ऑपरेशन स्वास्थ्य मंत्री नहीं करता. स्वास्थ्य मंत्री कहते हैं कि स्वास्थ्य विभाग की गलती नहीं. डॉक्टर-संघ कह रहा है : मरीज गलत दवा खाने से मरे. फार्मा संघ कह रहा है : चूहा मार दवा इतनी नहीं थी कि उससे इंसान की मौत हो जाए लेकिन पीडि़त कह रहा है : बस कर ददा. गलती हमरे रहिच..हमरे मन करत रहिच मरे के..!

मजाकिया अंदाज लिए इस संदेश के अंतिम शब्द गंभीरता और सच्चाई ओढ़े हैं। काश यह तेजाब बन जाते और हर उस शख्स को झुलसा दें जो इस नसबंदी हत्याकाण्ड के जिम्मेदार माने जा रहे हैं। बिलासपुर के पेंडारी में हुआ नसबंदी हादसा या यूं कह लें कि एक ऐसा हत्याकाण्ड है जिसे मानव समूह की लापरवाही ने रचा। फिलवक्त 18 जानें गई हैं और अभी भी मौत मजे ले-लेकर लील रही है। चूक कहां हुई, कैसे हुई, समूची इंसानियत इसके जवाब के लिये बेकरार है लेकिन सही उत्तर नदारद है। यहां वाजिब सवाल यह खड़ा है कि जनसंख्या स्थरीकरण के लिए केन्द्र सरकार, जो नसबंदी योजना चला रही है, क्या वह सिर्फ एक समुदाय के लिए ही है क्योंकि मौतों का आंकड़ा इस पर अपनी मुहर लगा चुका है। 

यह अफसोसजनक हादसा ऐसे राज्य में हुआ है जिसके मुखिया यानि मुख्यमंत्री खुद डॉक्टर हैं। रमनसिंह जी की जो बड़ी खासियत है, वह यह कि उन्हें तौलकर बोलने में महारत हासिल है लेकिन उन्होंने मन को चुभने और गले ना उतरने वाला बयान देकर चौंका दिया। सवाल स्वास्थ्य मंत्री के इस्तीफे को लेकर दागा गया था जिसके जवाब में उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य मंत्री ऑपरेशन नहीं करते! कमाल है भाई! अगर सालों पहले रेल हादसे से विचलित एक रेल मंत्री ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था तो क्या इसका मतलब यह कि रेल मंत्री ही रेल चलाते हैं। यह तो नैतिकता का तकाजा है और इस्तीफा उसका सुबूत। एक नरेन्द्र मोदी हैं जिन्होंने छह महीने में ही परफारमेंस ना देने वाले मंत्रियों को सबक सिखाते हुए उनके विभाग छीन लिए। और एक आप हैं कि कोई कार्रवाई ना करना ही मानो असली काम बन चुका है। 

अपने परिजनों को खो चुके लोग दु:ख से सूखे जा रहे हैं और राजनीतिज्ञ हैं कि मौत को मनोरंजक बनाते हुए उलजुलूल बयान दे रहे हैं। फिलवक्त किसी कार्रवाई की उम्मीद करना बेमानी होगा क्योंकि बचने-बचाने का खेल शुरू हो चुका है। शुरूआत आरोपी डॉक्टर से करते हैं जिसकी गिरफतारी का विरोध इंडियन मेडिकल एसोसिएशन कर रहा है। डॉक्टरों के संघ ने जिन दो मांगों के साथ प्रदर्शन किया, उसमें एफआईआर से हत्या की धारा हटाने तथा रिहाई की मांग जुड़ी है। परंतु शवों पर अपने तर्कों के अट्ठहास लगाने वाले स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल ने स्वागतयोगय लेकिन घुडक़ीभरे अंदाज में कहा कि फिलहाल जो मौतें हुई हैं, उनमें से कुछ की वजह इंफेक्शन बताया जा रहा है जिसके लिए डॉक्टर जिम्मेदार है। 

जिस राज्य में पिछले 12 सालों तक निजी नर्सिंग होम एक्ट लागू ना हो सका हो, अंदाजा लगाया जा सकता है कि डॉक्टरों के बचने या बचाने की किस कदर छूट मिली हुई है! आंखफोड़वा काण्ड, गर्भाशय काण्ड, मलेरिया से होती बेगुनाह मौतें, स्वास्थ्य कार्ड के नाम पर लूट जैसे कई हादसे हमने देखे और हर वक्त इस उम्मीद के साथ मन मसोसकर चुप हो गए कि कभी तो स्थिति बदलेगी, सिस्टम सुधरेगा या डॉक्टरों में मानवीयता जागेगी मगर अफसोस कि गरीबों की जान के साथ खेलना मानो इनका असली पेशा बन चुका है। 

इस मखौल में सब शामिल हैं तभी तो विपक्षी कांग्रेस को जैसे अंधेरे में तीर चलाने का बहाना मिल गया। जनता को तो याद है परन्तु पार्टी ना भूले कि चंद महीनों पहले ही राजधानी रायपुर में पीलिया से हुई मौतों में तीन दर्जन से ज्यादा जिंदगियां होम हो गई थीं! क्या महापौर डॉ. किरणमयी नायक उन चेहरों को गिना सकती हैं जो इस काण्ड के लिए जिम्मेदार थे और उन्होंने उन पर बड़ी या कड़ी कार्रवाई की? नतीजा सिफर रहा है। लेकिन जनता न्याय करना चाहती है और वह नगर निगम चुनाव का इंतजार कर रही है। अब वापस नसबंदी काण्ड पर लौटते हैं जिस पर राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए सुरक्षित घरों में बैठे तमाम इच्छाधारी फुफकारते हुए बाहर निकल आए। इन्हीं में से एक कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी। दुर्घटना के पीडि़तों को रमन सरकार ने जो मुआवजा बांटा, वह न्यायानुकूल तो नहीं लगा मगर वह उसका धर्म था और निभाया भी लेकिन कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी से लेकर छुटभैया नेताओं ने आश्वासन और वादों के अलावा कुछ नहीं दिया। 

मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि राहुल जब पीडि़तों से मिल रहे थे तो वे लडख़ड़ाती सांसों के साथ यह उम्मीद बांधे बैठे थे कि कांग्रेस के युवराज उस पार्टी के सर्वोच्च नेता हैं जिसकी तिजोरी अरबों के चंदे से भरी पड़ी है? क्या उसका मुंह इन पीडि़तों की मदद के लिए नहीं खोला जा सकता था? राहुल ने महज सुर्खियां बटोरीं, वादों और आश्वासनों का मलहम लगाया और चलते बने। इसके ठीक विपरीत कांग्रेस के युवा विधायक अमित जोगी के पहल की दाद देनी होगी कि उन्होंने ना सिर्फ पीडि़तों के दु:ख-दर्द को बांटा बल्कि एक अनाथ बिटिया को उसकी परवरिश करने के लिए गोद भी लिया। राज्य में 90 विधायक हैं। अगर एक-एक परिवार को भी गोद लेंगे तो अभागे परिवारों के दर्द और आंसुओं पर कुछ तो मलहम लगेगा ही। 

आप भूलें ना हों तो याद दिला दूं कि पूर्व गृह मंत्री ननकीराम कंवर ने तीन साल पहले राजधानी के मेडिकल स्टोर में पुलिस के दस्ते भेजकर छापे पड़वाए थे। कारण यह कि उन्हें नौ रूपये की टेबलेट नब्बे रूपये में बेची गई थी। तब छापे में आश्चर्यजनक खुलासा हुआ था कि मेडिकल स्टोर्स में नकली दवाईयां खपाई जाती हैं। कंवर का यह अभियान जनता के हित से जुड़ा था या उनकी व्यक्तिगत भड़ास रही हो, परन्तु पब्लिक ने उसे खासा रिस्पांस दिया था। हालांकि  स्वास्थ्य विभाग को दीमक की तरह चाट रहे दलाल ठेकेदारों तथा कुछ राजनीतिज्ञों ने हायतौबा मचाते हुए कार्रवाई को कटघरे में खड़ा किया था परन्तु शीशे की तरह साफ है कि पूरे राज्य में दवा व्यवसाय का काला धन्धा फल-फूल रहा है और उसे सरकार के राइट-लेफट में बैठे शुभचिंतक संरक्षित करते रहे हैं, इन्हें बचाने का खेल बड़ी चालाकी से खेलते हैं। 

महावर दवा कंपनी को ही लीजिये : सन् 2012 में उसका लाइसेंस रद्द हुआ था लेकिन जल्द ही उसे श्रेष्ठ गुणवत्ता का प्रमाण-पत्र पकड़ा दिया गया। महावर को सांसद रमेश बैस के चुनाव कार्यालय प्रभारी के तौर पर मैंने खुद देखा है। मन में यह सुगबुगाहट उठना स्वाभाविक है कि सरकारी अस्पतालों में दवाईयां खपाने से लेकर राजनीतिक मदद करने तक में किसने साथ दिया होगा? हालांकि श्री बैस का साफगोईपना देखिए कि उन्होंने खुद ही खुलासा किया कि जिस दवा कंपनी की दवाईयां मरीजों को दी गईं, उसे कुछ साल पहले ब्लैकलिस्टेड किया जा चुका है। नसबंदी काण्ड पहला मामला थोड़े ही है। इसके पहले शर्मिंदा करने वाले वाकयों को अंजाम दिया गया था, उसके दोषी डॉक्टर नाममात्र के लिये निलंबित हुए और चंद महीनों में ही बहाल कर दिए गए। गर्भाशय काण्ड में जिन डॉक्टरों के लाइसेंस रद्द हुए, उसमें से कितने ही फिर से अपनी प्रेक्टिस पर लौट आए हैं। कहने का तात्पर्य यह कि सजा ऐसी दीजिये कि नैतिकता का थर्मामीटर टूट जाए। बहकावे में आकर या कह लें कि चंद रूपये पाने का लालच ही सही, आंखों में सपने पालने वालों ने सिस्टम पर भरोसा करने की जो कीमतचुकाई है, शैतानों को उसका पाई-पाई का हिसाब अभी ना सही, कभी ना कभी तो चुकाना पड़ेगा ही, वह भी जिंदा रहते हुए। रही न्याय की बात तो आप देखिएगा, आंखफोड़वा काण्ड, गर्भाशय काण्ड या बालको चिमनी हादसा की तरह ही नसबंदी काण्ड भी अपनी मौत मर जाएगा यानि इंसाफ समय की गर्द में दफन हो चुका होगा। 


अनिल द्विवेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार और शोधार्थी हैं 
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Wednesday, April 2, 2014

राजनीति का नया अभिषेक



आसान जीत की ओर बढ़ रहे अभिषेक सिंह का राजतिलक लगभग तय है लेकिन इसके बाद खुद को साबित करने की चुनौती मुंहबांये खड़ी है. अब तक राजनांदगांव से खुद को दाँव पर लगाने वालों की सच्चाई यह है कि राजनीतिक रोटियां सेंकने के सिवाय वे कोई खास चमत्कार नहीं कर सके अत: परिवार से लेकर जनता-जनार्दन तक में आशा की यह डोर बंधी है कि शुक्ल-युग का अवसान होने के बाद देश के राजनीतिक-शीर्ष पर युवा छत्तीसगढिय़ा की जो कमी राज्य महसूस कर रहा है, उम्मीद है कि अभिषेक इसे भरने में कामयाब होंगे. ठीक राहुल गांधी, सचिन पायलट और ज्योतिरादित्य सिंधिया की तरह. राजनांदगांव संसदीय क्षेत्र से विशेष रिपोर्ट :
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जादुई स्पर्श लिए मुस्कान और अदाभरी शालीन चुप्पी के साथ अभिषेक सिंह जब चुनाव-प्रचार के लिये घर से निकलते हैं तो छह फीट से अधिक की काया वाले इस शख्स से हाथ मिलाने को लोग बेताब हो उठते हैं. बुढ़ापा ओढ़े दो शख्स के बीच खड़ी एक नन्हीं बिटिया के सर पर बाबा हाथ फेरते हैं और बुजुर्गों से कहते हैं, ‘इस क्षेत्र की सेवा करना चाहता हूं. आपका आर्शीवाद चाहिये.’ जोश से भरी युवाओं की टोली नारे लगाती है और काफिला आगे बढ़ जाता है. लेकिन कांगे्रस-जोकि विपक्षी चुनौती के तौर पर सामने है-के झण्डे-बैनर देखना मुश्किल पड़ रहा है. इसकी वजह साफ करते हुए पार्टी के वरिष्ठ नेता कहते हैं, ‘जनमत का दबाव या सत्ता के लोभ का असर कह लीजिये, विद्रोह और विरोध की हर चिंगारी जलने से पहले ही बुझ गई.’

लेकिन राजा-रजवाड़ों के प्रभुत्व वाले इस शहर में ऐसा कब नहीं हुआ? सत्ता का तो चरित्र ही यही है. क्षेत्र का संसदीय इतिहास गवाह है कि राजा वीरेन्द्र बहादुर सिंह से लेकर रानी पद्मावती देवी, शिवेंद्र बहादुर सिंह, मोतीलाल वोरा, राजा देवव्रत सिंह, डॉ. रमनसिंह और मधुसूदन यादव तक में मात्र यादव ही तो थे जो महल बनाम हल की लड़ाई जीतकर संसद पहुंचे और अब यह नारा कांग्रेस प्रत्याशी कमलेश्वर वर्मा लगा रहे हैं. अभिषेक पर अप्रत्यक्ष प्रहार करते हुए वे कहते हैं, ‘मतदाता चाहकर भी महल के प्रत्याशी (अभिषेक सिंह) से नहीं मिल पायेंगे.’ अभिषेक इसके जवाब में मौन साध लेते हैं.

पन्द्रह लाख से ज्यादा की आबादी वाले राजनांदगांव लोकसभा में चुनावी बिसात सज चुकी है. हाथों में मुद्दे और आरोपरूपी तलवार के साथ मोहरे मैदान में हैं और पार्टी के दिगगज रणनीतियों के साथ एक-दूसरे को धराशायी करने में लगे हैं. तस्वीर साफ है कि गुजरे विधानसभा में भाजपा और कांग्रेसचार-चार सीटें जीतकर बराबरी पर रही थीं और यदि कांग्रेस ने वर्तमान की तुलना में मजबूत प्रत्याश्ी उतारा होता तो अभिषेक को गहरी चुनौती से जूझना पड़ता लेकिन अब खुला खेल फर्रूखाबादी हो चला है. राजनीतिक पंडितों का आंकलन है कि जब प्रदेश की राजनीति में नई जमात दहाड़ रही है तब अभिषेक ने धमाकेदार एण्ट्री मारी है.

लडख़ड़ाहटों के साथ ही सही, अभिषेक ने अपने राजनीतिक कैरियर की शानदार शुरूआत की है. कुछ अभिषेक को पैराशूट कैंडीडेट मान रहे हैं मगर वे गफलत में हैं. विरोधी तर्क देते हैं कि उनका कोई राजनीतिक अनुभव नहीं है और सिर्फ एक ही योगयता है कि वे मुख्यमंत्री के सुपुत्र हैं. इसके बचाव में वरिष्ठ पत्रकार विजय कानूगा कहते हैं, ‘ऐसे लोगों के लिये सचिन पायलट और ज्योतिरादित्य सिंधिया को याद करना चाहिये जिन्होंने कम अनुभव के बावजूद पिता की विरासत संभाली और राजनीति में सफल हुए. आप देखिएगा अभिषेक की जीत एक लाख से ज्यादा मतों से होगी.’

दरअसल राजनांदगांव लोकसभा क्षेत्र पर बाबा की नजर तीन साल पहले लग गई थी. सीट तय होने के बाद मुख्यमंत्री डॉ. रमनसिंह के सलाहकार विवेक सक्सेना को वहां का प्रभार सौंपा गया जिन्होंने दिन-रात एक करके स्थानीय समीकरणों को साधा, रास्ते की रूकावटों को साफ किया, असंतुष्टों को मनाया और सरकारी मशीनरी को झोंकते हुए विकास की गंगा बहा दी. इलाका चमन हो चुका है और यहां के सडक़ मार्ग से गुजरते वक्त आप इसका नजारा बखूबी देख सकते हैं.

गुजरे विधानसभा चुनाव में बाबा की नेतृत्व-क्षमता को परखने का वक्त था सो पर्दे के पीछे रखते हुए उन्हें राजनांदगांव सीट का चुनाव संचालक बनाया गया. पूरे दो महीने तक अभिषेक ने जिस सूझबूझ से चुनाव संचालन किया और पिताश्री को पैंतीस हजार से ज्यादा की लीड से विजयश्री का वरण कराया, उसने भाजपा संगठन, आम आदमी और पिता का दिल जीत लिया. इस सफलता के बाद इस बात पर मुहर लग गई थी कि अगला लोकसभा चुनाव अभिषेक ही लड़ेंगे. ऐसा नहीं है कि वर्तमान सांसद मधुसूदन यादव की टिकट काटने से पार्टी और संगठन में खदबदाहटें नहीं हुईं लेकिन उसे जादू की झप्पी के साथ बेहद खामोशी से दफन कर दिया गया. सुना है कि इस कुर्बानी के बदले मधुसूदन को लालबत्ती से नवाजते हुए युवा आयोग का अध्यक्ष बनाया जा सकता है.

अब जबकि अभिषेक सांसद बनने की ओर हैं तब एक बड़ा सवाल जेहन में यह है कि वे लम्बी राजनैतिक पारी खेलेंगे या देवव्रत सिंह और मधुसूदन यादव जैसे युवा चेहरों की तरह अगले चुनाव तक फुस्स हो जायेंगे. अंचल का दुर्भागय कह लीजिये कि राजपरिवार के आश्रय में पल-बढ़ रहा राजनांदगांव आज भी देश में पहचान के लिये मोहताज है. अगले पांच साल बाद तय होगा कि बाबा ने खुद का राजनैतिक धरातल किस कदर मजबूत किया है? फिलहाल भाजपा और कांग्रेस के संसदीय फलक पर जो युवा चेहरे जमे हैं, उनमें तरूणाई तो गायब सी हो गई है. भाजपा के दिनेश कश्यप, कांग्रेस के देवव्रत सिंह और कुछ हद तक दुर्ग की सरोज पाण्डे को छोड़ दें तो अभिषेक सिंग के रास्ते में ज्यादा अवरोध नहीं है. वे अपने पिता की तरह ही छुपे रूस्तम साबित हो सकते हैं क्योंकि सियासी शालीनता और परिपक्वता के मुकाबले अभिषेक सबसे बीस ही नजर आते हैं. मगर फिर भी बाबा को जंग खाई मुरझाई सोच को तिलांजलि देकर आगे बढऩा होगा. पिता का आभामण्डल-जो इनके इर्द-गिर्द बना है-को तोडक़र खुद की देशव्यापी छबि बनाने की चुनौती है. मन में आशा के फूल खिले हैं कि अभिषेक उस शून्य को जरूर भरेंगे जो शुक्ल-युग के अवसान के बाद देश की राजनीति में छत्तीसगढ़ के लिये पैदा हो गया है. हमारी शुभकामनाएं साथ हैं.

अनिल द्विवेदी
लेखक राजनीतिक टिप्पणीकार हैं

Friday, March 21, 2014

विषम कोण : 

तकनीक के आगे हारी नैतिकता ?

रोहित बनाम एनडी तिवारी के मामले में यह साबित हो चुका है कि जब नैतिक-धर्म कमजोर पड़ जाता है तो विज्ञान ना सिर्फ उम्मीद के तौर पर आपके साथ है बल्कि वह दूध का दूध और पानी का पानी करने की क्षमता भी रखता है. डीएनए जांच से ही साबित हुआ कि रोहित के गुणसूत्र तिवारी से मेल खाते हैं! इसके बाद तिवारी ने आत्मसमर्पण कर दिया. विज्ञान और रोहित के हौसलों के आगे नैतिक धर्म की हार हुई है!

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पुरानी कथा है. राजा उत्तानपाद की दो पत्नियां सुनीति और सुरूचि थी जिन्हें सुनीति से धु्रव और सुरूचि से उत्तम नामक पुत्र प्राप्त हुए थे. वैसे तो सुनीति बड़ी रानी थी लेकिन राजाजी का दिल सुरूचि के लिये ज्यादा धडक़ता था. एक दिन धु्रव राजा की गोद में बैठे खेल रहा था तभी छोटी रानी सुरूचि वहां आई और उसने ध्रुव को पिता की गोद से उतारते हुए अपने पुत्र को राजा की गोद में बैठाते हुए ध्रुव से कहा : तू मेरी कोख से पैदा नहीं हुआ है इसलिए उनकी गोद में या राजसिंहासन में बैठने का अधिकार तुझे नहीं है.. कहानी का अंत और निष्कर्ष दूसरी तरह का है लेकिन यहां इसका जिक्र हम नारायण दत्त तिवारी और उनके बेटे रोहित शेखर के बीच जारी विवाद से जोडक़र देखना चाहते हैं.

नैतिकता खखारने वालों के लिये यह अतिश्योक्ति कदापि नहीं होगी कि पूर्व मुख्यमंत्री, 87 साल के नारायण दत्त तिवारी के बेटे रोहित ने जो लड़ाई लड़ी, वह धु्रुव की लड़ाई से ज्यादा सम्मानीय है. सराहनीय भी है और प्रेरणास्पद भी. पैंतीस साल तक लावारिस होने का दंश झेल रहे रोहित ने ना सिर्फ पितृ-सुख हासिल करने का अधिकार हासिल किया बल्कि सालों से सुहाग के नाम से वंचित अपनी माँ को भी न्याय दिलाया. जिस समाज के अजीबोगरीब तर्कों के आगे भगवान राम तक ने घुटने टेक दिये (सीता की अगिनपरीक्षा) उस कलियुगी समाज में सालों तक किसी महिला का बिना पति के अकेले गुजर-बसर करना कितना त्रासद भरा रहा होगा, इसका दर्द उस माँ से ज्यादा भला कौन महसूस कर सकता है? या बिना पिता का नाम लिये दोस्तों के बीच उठना-बैठना, मार्कशाीट तक में पिता के नाम के लिये तरसना, रोहित के लिये कितना अपमानजनक रहा होगा, सहज अंदाजा लगाया जा सकता है. 

ऐसा नहीं है कि रोहित शेखर की माँ ने पति का अधिकार हासिल करने के लिये अनुनय-विनय नहीं किया होगा मगर एक शक्तिशाली राजनीतिज्ञ का नशा तिवारी पर इस कदर चढ़ा था कि उन्होंने इस अबला की दलीलें कई बार खारिज कर दी. एक बार तो उनके बंगले में ही खासा विवाद हुआ था. रोहित की मां उज्जवला शर्मा, पूर्व केन्द्रीय मंत्री प्रो. शेरसिंह की पुत्री हैं और तिवारी जब उत्तरप्रदेश के  मुख्यमंत्री थे, तब उनके संपर्क में आई थीं. चंद मुलाकातों में ही दोनों के बीच रिश्ते बन गये. सत्ता की संवेदनाओं की बंजर जमीन पर पकती आंकांक्षा और उत्तेजना की फसल से बेखबर, एनडी ने उनकी काफी मदद भी की और इतना शक्तिशाली बना दिया था कि उज्जवला के बिना सीएम हाउस का पत्ता तक नहीं खडक़ता था लेकिन जब वे गर्भवती हुईं तो तिवारी ने उन्हें शादीशुदा होने का हवाला देते हुए अपनाने से साफ इंकार कर दिया. 

बहस-तर्क  और परेशानी झेलने के बाद भी जब ढीठ राजनीतिक एनडी तिवारी नहीं माने तो रोहित पितृत्व हासिल करने और मां को उसका पति-अधिकार दिलाने के लिये न्यायालय की शरण में चले गये. जिरह के दौरान न्यायालय ने जब डीएनए टेस्ट करने का आदेश दिया तो राजनीतिक दर्शन का मुलम्मा चढ़ाकर अब तक बचते आये रसिकमिजाज तिवारी अंतत: उन्हें यह टेस्ट देना पड़ा. उसके बाद आई रिपोर्ट में यह साफ हो गया कि तिवारी ही रोहित के पिता हैं! 

सत्ता के बाएँ रहने वाले लोग मानते हैं कि तिवारी की रासलीलाओं का खेल नया नहीं है. यह तब से चल रहा है जब वे पहली बार विधायक और मुख्यमंत्री बने. पहले उत्तरप्रदेश और अब उत्तराखण्ड में उनके रसिकमिजाज के चटखारे लोग लेते ही रहते हैं. उत्तराखण्ड का मुख्यमंत्री बनने के बाद तिवारी की लीलाएं जारी रहीं. स्टैला डेविड कांड लोग भूले नहीं हैं. उनके वर्षों पुराने एक निजी सचिव को संदिग्ध परिस्थितियों में बाथरूम में मृत अवस्था में पाया गया था लेकिन मामला मीडिया प्रबंधन के जरिए हवा-हवाई हो गया. हालांकि तिवारी, अमरमणि, मदेरणा, चंद्रभान या गोपाल काण्डा की तरह दोगले नही हैं जो प्यार के नाम पर अवैध संबंधों का खेल खेलते हैं, फिर प्रेमिका को या तो मरवा देते हैं या आत्महत्या के लिये विवश कर देते हैं लेकिन पाप छुपाने का प्रयास तो तिवारी ने बेशर्मी की हद तक किया ही. 

विकासशील दौर में यह बहस अभी भी जिंदा है कि विज्ञान बड़ा या धर्म लेकिन रोहित बनाम एनडी तिवारी के मामले में यह साबित हो चुका है कि जब नैतिक-धर्म कमजोर पड़ जाता है तो विज्ञान ना सिर्फ उम्मीद के तौर पर आपके साथ है बल्कि वह दूध का दूध और पानी का पानी करने की क्षमता भी रखता है. रोहित-एनडी तिवारी प्रकरण का सत्य उजागर करने में डीएनए यानि जीवनसूत्र नामक चिकित्सा तकनीक की अहम भूमिका रही है. आयु के साथ व्यक्ति के डीएनए यानि जीवन-सूत्र में कोई बदलाव नहीं आता है अत: जन्म से मृत्यु पर्यंत डीएनए एक सा ही रहता है. अपने जैविक माता-पिता से प्राप्त इस जीवन-सूत्र में छिपी हुई सूक्ष्म विभिन्नताओं के आधार पर प्रत्येक जीव को किसी भी अन्य जीव से अलग पहचाना जा सकता है. रोहित को उसका पितृत्व अधिकार दिलाने में इसी तकनीक ने अहम भूमिका अदा की. न्यायालय के निर्देश पर हुई डीएनए जांच में स्पष्ट हो गया कि रोहित के गुणसूत्र तिवारी से मेल खाते हैं! इसके बाद तिवारी ने आत्मसमर्पण कर दिया.  साफ है कि विज्ञान और रोहित के हौसलों के आगे नैतिक धर्म की हार हुई है!

अनिल द्विवेदी
(लेखक रिसॅर्च स्कॉलर हैं)

Thursday, January 16, 2014

रमजान शरीर से गया, ये आत्मा से!

विषम कोण :

तीन महीने से छिन चुकी अपने पसीने की कमाई को हासिल करने की गुहार लगाते-लगाते रमजान अली दुनिया से चल बसा. कांकेर के जिलाधीश कार्यालय में जब उसने मिट्टी का तेल छिडक़कर अगिनदाह किया तो उसकी आत्मा के साथ-साथ मानवता, प्रशासनिक संवेदनशीलता और सुराज के खोखले दावे भी होम हो चुके थे. इस ह्दय विदारक घटना के बाद जेहन में दो बड़े सवाल उभरे हैं. पहला यह कि जिंदगी और मौत से जूझते अली ने जिस अफसर को दोषी बताया है, उसके खिलाफ एफआईआर क्यों नहीं हो रही? और दूसरा यह कि सरकार और प्रशासन यदि उसे बचाने में लगे हैं तो कर्मचारी-कल्याण के नाम पर नेतागिरी बघारने वाले या मुस्लिमहितों के नाम पर अपनी रोटियां सेंकने वाले धार्मिक-सामाजिक संगठन या उसके नेता, रमजान को या उसके परिवार को न्याय दिलाने के लिये आगे क्यों नहीं आ रहे?

भाईजान की मौत कई चेहरों पर एक बड़ा तमाचा है. वह जिला पंचायत कांकेर में ड्रायवर के पद पर कार्यरत था. विगत 5 जनवरी को यूट्यूब पर अपलोड तथा मृत्यु-पूर्व दिये अपने बयान में अली ने जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी, आइएएस भीम सिंह को अपनी मौत के लिये जिम्मेवार ठहराया है. इसके अलावा मेरे पास उस आवेदन-पत्र की कॉपी भी है जो उसने कलेक्टर को लिखा था. दो नवम्बर के इस पत्र में रमजान ने कहा था, ‘जिला पंचायत के सीईओ ने सितम्बर व अक्टूबर माह का मेरा वेतन बिना कारण बताए रोक दिया है. मुझे कार्य में अनुपस्थिति रहने का कारण बताओ नोटिस दिया जाता है जबकि मैं नियमित रूप से अपने कर्तव्य स्थल पर उपस्थित रहता हूं और हाजिरी रजिस्टर में हस्ताक्षर करता हूं जिसकी जांच करवा सकते हैं.’ वह आगे लिखता है : मेरी पत्नी ह्दय रोग से पीडि़त है. वेतन नहीं मिलने से आर्थिक परेशानी हो रही है. मुझे ऐसा लगता है कि मैं आत्महत्या कर लूं.’

लेकिन तर्कों और दिलासों के तीर चला रही पुलिस के लिये मानो ये दोनों सबूत सीईओ के खिलाफ एफआइआर के लिये पर्याप्त नहीं हैं इसलिए जांच जारी है. तय है कि यह कवायद भी खानापूर्ति के साथ खत्म हो जायेगी. कई मामलों का हश्र हम देख चुके हैं. मुद्दे की बात यह है कि अली ने मदद पाने के लिये अफसरों के अलावा मुख्यमंत्री, मंत्री सहित हर उस दरवाजे पर दस्तक दी जहां से उसे न्याय मिलने की उम्मीद लग रही थी लेकिन हाथ आई तो सिर्फ निराशा जिसके बाद उसने जीवनलीला समाप्त कर ली. कांकेर जिलाधीश अलरमेल मंगई डी की कार्यशैली भी सवालों के घेरे में है. चर्चित झालियामारी आश्रम काण्ड में उनकी निष्पक्ष और त्वरित कार्यवाही की खासी सराहना हुई थी लेकिन अली की शिकायत के निराकरण में जिस तरह की लेटलतीफी हुई या जानबूझकर होने दी गई, उससे मेडम की प्रतिष्ठा और ईमानदारीपूर्ण सेवा पर प्रश्न खड़ा हुआ है.

इस मजबूरी को समझा जा सकता है कि एक आइएएस, दूसरे साथी आइएएस के खिलाफ कार्रवाई करे तो कैसे करे? आश्चर्य कि जिस सरकार ने लोक सेवा गारंटी कानून लागू कर रखा है तथा जिसके अंतर्गत शासकीय सेवकों और नौकरशाहों को एक निश्चित अवधि के अंदर शिकायतों का निबटारा करना जरूरी होता है-वहां पर अली के आवेदन का निराकरण तीन महीने बीतने के बाद भी नहीं हो सका. एक बार मान भी लिया जाए कि रमजान ने ड्यूटी करने में लापरवाही बरती होगी लेकिन उसका वेतन रोकने का अधिकार आपको कैसे मिल गया? इसके पूर्व उसे कितने नोटिस दिये गये? निलंबन या बर्खास्तगी जैसी कार्रवाई के दौरान भी कर्मचारी को आधा वेतन या पेंशन पाने का अधिकार होता है. इस मुकाबले रमजान का गुनाह तो हल्का ही है.

लेकिन उसने अनमोल कीमत चुकाई. रमजान उन लाखों कर्मचारियों में शामिल था जिनके लिये सवेरा नई मेहनत और शाम थकान लेकर आती है. वह शासकीय कर्मचारी और ड्रायवर संघ का अध्यक्ष भी था लेकिन उसके परिवार की मदद के लिये कोई सामने नहीं आया. कर्मचारी-हितों के नाम पर कितने ही गुट-संगठन नेतागिरी करते हैं लेकिन प्रशासनिक दबाव के आगे सब बेबस नजर आ रहे. धर्म के उसूलों को आधार बनाकर बात-बात पर फतवा जारी करने वाली जमात हो या उनके नेता या फिर वोटों की खातिर अपनी राजनैतिक जमीन सींचने वाले राजनीतिक दल, रमजान अली की मौत पर आँसू बहाने का समय किसी को नहीं मिला. उसके जिंदा रहते ना सही, उसकी दुर्भागयपूर्ण और शर्मनाक मौत के जिम्मेदारों को सजा दिलाने की लड़ाई कांकेर से लेकर राजधानी तक लड़ी जानी चाहिए.

याद रखें कि यह घटना लाल आतंक में लिपटे उस जिले में हुई है, जहां आंख के बदले आंख का कबीलाई कानून लागू है लेकिन लोकतंत्र में न्याय की उम्मीद कानून के सांचे में ढली होती है. फिलहाल कमाऊ पूत के अचानक गुजर जाने से व्यथित पिता और अली का परिवार कलेक्टर के झूठे दिलासों का कफन ओढक़र सोने को मजबूर है. हुसैनी सेना, अली सेना, मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के अलावा मुस्लिम पंचायत और सीरत कमेटी जैसे संगठन हैं जिनकी एक आवाज पर पूरी कौम मदद के लिए खड़ी हो सकती है. वे चाहें तो रमजान के परिवार कोन्याय दिलाने की लड़ाई लड़ सकते हैं. यदि पत्थरों से बने आस्था-स्थलों के नाम पर जेहाद छिड़ सकता है तो रमजान को न्याय दिलाने के लिये क्यों नहीं?

अनिल द्विवेदी
लेखक पत्रकार हैं
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Wednesday, January 15, 2014

Wednesday, January 8, 2014

जिस कांग्रेस में 'बाबा' हैं
उस कांग्रेस में-जहां गांधी परिवार की मुहर ही अंतिम फैसला होती है-में इन दिनों कार्यकर्ता मन की बात कहने के लिये पार्टी फोरम नहीं बल्कि फेसबुक का सहारा ले रहे हैं! विधानसभा चुनाव में पार्टी की करारी हार से बौखलाए एक शख्स गोपाल साहू ने भड़ास निकालते हुए फेसबुक पर पोस्ट डाली. इसमें नेता प्रतिपक्ष रवीन्द्र चौबे की फोटो चस्पा करते हुए उनका एक बयान उद्धृत किया गया है. चौबे ने हार के बाद कहा था कि उम्मीदवार थोड़ा पहले तय हो जाते तो पार्टी जीत सकती थी. इस पर कार्यकर्ता ने कटाक्ष किया : आपकी टिकट तो तय थी महाराज. फिर कैसे हार गए?

यही सवाल एक साल पहले राहुल गांधी के समक्ष उठ चुका था. कार्यकर्ता भूले ना होंगे जब दुर्ग के एक कार्यकर्ता ने नेता प्रतिपक्ष रवीन्द्र चौबे की निष्क्रियता पर सवाल खड़ा करते हुए इस कदर आरोप लगाया था कि चौबे की आंखें गीली हो गई थीं. कांग्रेस की ताजा हार को लेकर जो खबरें जन्मीं, उसके मुताबिक जनमत साफ था कि निष्क्रिय, घमण्डी और बेईमान जनप्रतिनिधि नहीं चाहिये चाहे वह कांग्रेस हो या भाजपा लेकिन राहुल गांधी की इच्छा के विपरीत, नेता प्रतिपक्ष की जिद के चलते लगभग सभी विधायकों को टिकट दी गई जिनमें से सत्ताईस चुनावी मैदान में खेत हो गए. खैर.. अब पन्द्रह वर्ष का राजनीतिक वनवास बिताने को मजबूर कांग्रेस के कायाकल्प की शुरूआत हो ही गई. बदलाव के पहले शिकार प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष महंतजी हुए जिनके सर पर हार का ठीकरा फोड़ते हुए आलाकमान ने उनकी जगह तेजतर्रार और वरिष्ठ विधायक भूपेश बघेल को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया है लेकिन इन्हें मिली चुनौतियों की चर्चा बाद में.

अभी बात सरकार से लडऩे वालों की. विपरीत परिस्थितियों को साधते हुए, समझदारीभरे फैसले के साथ कांग्रेस विधायक दल को विश्वास में लेकर आलाकमान ने सरगुजा नरेश तथा वरिष्ठ विधायक टी.एस. सिंहदेव बाबा को नेता प्रतिपक्ष घोषित कर दिया. कहा तो यह जा रहा है कि गांधी परिवार से नजदीकी और महल के प्रभाव का इस्तेमाल करने के चलते सिंहदेव को यह अवसर मिला. इसे भी कौन नकारेगा कि सरगुजा में भाजपाई आंधी को थामकर सिंहदेव ने जिस तरह पार्टी की झोली में आठ में से सात सीटें डालीं, यह पद इसी का ईनाम माना जा रहा है. लेकिन राजनीति में नतीजे मायने रखते हैं, रणनीति नहीं. अब शर्माजी को ही लें. छठवीं बार विधायक बने सत्यनारायण जी नेता प्रतिपक्ष के प्रबल दावेदार थे लेकिन पार्टी में जरूरत से ज्यादा अज्ञातशत्रु पैदा कर लेना उनके लिये खतरनाक साबित हुआ. 

राजा अगर अच्छा है तो यह ईश्वर का वरदान है. यदि वह बुरा है तो मान लीजिए कि भगवान ने आपके पापों की सजा देने के लिये उसे भेजा है! नये साल में कुछ ऐसी ही उतार-चढ़ावभरी उम्मीद सरगुजा नरेश सिंहदेव से जुड़ चुकी हैं. नेक और कोमल स्वभाव वाले इस शख्स के सामने कई चुनौतियां हैं मगर राहुल गांधी की राह पर चलकर उनसे पार पाया जा सकता है. कांग्रेस का गढ़ वापस हासिल करने की तड़प के चलते कांग्रेस के युवराज ने युवा कार्यकर्ताओं के बीच टैलण्ट हाण्ट अभियान चलाया था लेकिन पार्टी उनका उपयोग कर पाती, इसके पहले बड़े नेताओं ने उनका शिकार कर लिया. सिंहदेव को भी युवा, उर्जावान और रमन सरकार के मंत्रियों को करारा जवाब देने वाले चेहरों को सामने करना होगा. लगातार तीसरी हार के बाद यदि कार्यकर्ता इस सोच के साथ घर बैठ गये हैं कि कांग्रेस का कुछ नहीं हो सकता तो उन्हें जगाने और उनमें विश्वास भरने का काम सिंहदेव को करना होगा. नब्बे विधानसभाओं में भी ऐसे चेहरे अभी से तलाशने-तराशने होंगे जो चुनाव जीतने की क्षमता रखते हों.

बड़े नेताओं के अहम और गुटबाजी से तंग आ चुके विधायकों में भरोसा जगाना बाबा के लिये तीसरी बड़ी चुनौती है. उनचालीस विधायकों में यह धारणा बलवती होती जा रही है कि भ्रष्टाचार से लेकर सरकार की खामियों तक के जिन मुद्दों को विधानसभा में वे उठाना चाहेंगे, उसके पीछे नेता प्रतिपक्ष का विश्वास और समर्थन बना रहेगा या नहीं. तीन बार से निर्वाचित हो रहे एक विधायक ने मुझसे कभी कहा था कि मयसबूतों के साथ उसने जब बलात्कार व हत्याकाण्ड का मामला पिछले विधानसभा में उठाना चाहा तो उसे चुप करा दिया गया. बाद में पता चला कि इसके बदले में नेता ने सरकार से भारी कीमत वसूल ली. यह कहने में गुरेज नहीं कि पूर्व के नेता प्रतिपक्षियों की कार्यशैली इस कदर बदनाम हो गई थी कि उन्हें रमन सरकार का चौदहवां मंत्री माना जाने लगा था. पत्रकारों ने जब इस छबि से मुक्त होने की बात सिंहदेव से पूछी तो उनका जवाब था : मैं मानता हूं कि हर आदमी की छबि उसके आचरण से तय होती है. आज के दौर में लोगों के सामने कुछ भी छुपा नहीं है. मेरे आचरण से पता चल जाएगा कि मैं क्या हूं?

आप क्या हैं, इसका अहसास होने लगा है. 2013 के चुनावों में दोबारा विधायक चुने जाने के बाद सिंहदेव पार्टी में ऐसे नेता के रूप में उभरे हैं, जिन्हें करिश्माई लीडर के तौर पर देखा जा रहा है. विधानसभा उपाध्यक्ष का विपक्षी-हक मांगने से लेकर अध्यक्ष पद पर सर्वानुमति कायम करने और लाल बत्ती को नकारने के बाद पार्टी और जनता उनके फैसलों की मुरीद हो चुकी है लेकिन सवाल यह है कि कांग्रेस कहां है और उसे कहां पहुंचाना है? क्या सिंहदेव आक्रामक और विश्वसनीय विपक्ष दे पाएंगे. इस देश में जहां पचास प्रतिशत से ज्यादा लोग युवा हैं तब कांग्रेस के अंदर बदलाव की एक बड़ी जरूरत महसूस हो रही है. जंग लगी मुरझाई सोच के थके-हारे चेहरों के बजाय कुछ कर गुजरने की सोच रखने वाले युवाओं को सामने लाना होगा. विधानसभा से लेकर संगठन और पंचायत स्तर तक में सरकार के खिलाफ धारदार हमला बोलने वाले युवा चेहरे तैयार करने होंगे. हालांकि गुटबाजी से अभिशप्त पार्टी में यह बदलाव थोड़ा समय मांगेगा मगर पांच साल कम थोड़े ही हैं.

अनिल द्विवेदी