Thursday, January 16, 2014

रमजान शरीर से गया, ये आत्मा से!

विषम कोण :

तीन महीने से छिन चुकी अपने पसीने की कमाई को हासिल करने की गुहार लगाते-लगाते रमजान अली दुनिया से चल बसा. कांकेर के जिलाधीश कार्यालय में जब उसने मिट्टी का तेल छिडक़कर अगिनदाह किया तो उसकी आत्मा के साथ-साथ मानवता, प्रशासनिक संवेदनशीलता और सुराज के खोखले दावे भी होम हो चुके थे. इस ह्दय विदारक घटना के बाद जेहन में दो बड़े सवाल उभरे हैं. पहला यह कि जिंदगी और मौत से जूझते अली ने जिस अफसर को दोषी बताया है, उसके खिलाफ एफआईआर क्यों नहीं हो रही? और दूसरा यह कि सरकार और प्रशासन यदि उसे बचाने में लगे हैं तो कर्मचारी-कल्याण के नाम पर नेतागिरी बघारने वाले या मुस्लिमहितों के नाम पर अपनी रोटियां सेंकने वाले धार्मिक-सामाजिक संगठन या उसके नेता, रमजान को या उसके परिवार को न्याय दिलाने के लिये आगे क्यों नहीं आ रहे?

भाईजान की मौत कई चेहरों पर एक बड़ा तमाचा है. वह जिला पंचायत कांकेर में ड्रायवर के पद पर कार्यरत था. विगत 5 जनवरी को यूट्यूब पर अपलोड तथा मृत्यु-पूर्व दिये अपने बयान में अली ने जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी, आइएएस भीम सिंह को अपनी मौत के लिये जिम्मेवार ठहराया है. इसके अलावा मेरे पास उस आवेदन-पत्र की कॉपी भी है जो उसने कलेक्टर को लिखा था. दो नवम्बर के इस पत्र में रमजान ने कहा था, ‘जिला पंचायत के सीईओ ने सितम्बर व अक्टूबर माह का मेरा वेतन बिना कारण बताए रोक दिया है. मुझे कार्य में अनुपस्थिति रहने का कारण बताओ नोटिस दिया जाता है जबकि मैं नियमित रूप से अपने कर्तव्य स्थल पर उपस्थित रहता हूं और हाजिरी रजिस्टर में हस्ताक्षर करता हूं जिसकी जांच करवा सकते हैं.’ वह आगे लिखता है : मेरी पत्नी ह्दय रोग से पीडि़त है. वेतन नहीं मिलने से आर्थिक परेशानी हो रही है. मुझे ऐसा लगता है कि मैं आत्महत्या कर लूं.’

लेकिन तर्कों और दिलासों के तीर चला रही पुलिस के लिये मानो ये दोनों सबूत सीईओ के खिलाफ एफआइआर के लिये पर्याप्त नहीं हैं इसलिए जांच जारी है. तय है कि यह कवायद भी खानापूर्ति के साथ खत्म हो जायेगी. कई मामलों का हश्र हम देख चुके हैं. मुद्दे की बात यह है कि अली ने मदद पाने के लिये अफसरों के अलावा मुख्यमंत्री, मंत्री सहित हर उस दरवाजे पर दस्तक दी जहां से उसे न्याय मिलने की उम्मीद लग रही थी लेकिन हाथ आई तो सिर्फ निराशा जिसके बाद उसने जीवनलीला समाप्त कर ली. कांकेर जिलाधीश अलरमेल मंगई डी की कार्यशैली भी सवालों के घेरे में है. चर्चित झालियामारी आश्रम काण्ड में उनकी निष्पक्ष और त्वरित कार्यवाही की खासी सराहना हुई थी लेकिन अली की शिकायत के निराकरण में जिस तरह की लेटलतीफी हुई या जानबूझकर होने दी गई, उससे मेडम की प्रतिष्ठा और ईमानदारीपूर्ण सेवा पर प्रश्न खड़ा हुआ है.

इस मजबूरी को समझा जा सकता है कि एक आइएएस, दूसरे साथी आइएएस के खिलाफ कार्रवाई करे तो कैसे करे? आश्चर्य कि जिस सरकार ने लोक सेवा गारंटी कानून लागू कर रखा है तथा जिसके अंतर्गत शासकीय सेवकों और नौकरशाहों को एक निश्चित अवधि के अंदर शिकायतों का निबटारा करना जरूरी होता है-वहां पर अली के आवेदन का निराकरण तीन महीने बीतने के बाद भी नहीं हो सका. एक बार मान भी लिया जाए कि रमजान ने ड्यूटी करने में लापरवाही बरती होगी लेकिन उसका वेतन रोकने का अधिकार आपको कैसे मिल गया? इसके पूर्व उसे कितने नोटिस दिये गये? निलंबन या बर्खास्तगी जैसी कार्रवाई के दौरान भी कर्मचारी को आधा वेतन या पेंशन पाने का अधिकार होता है. इस मुकाबले रमजान का गुनाह तो हल्का ही है.

लेकिन उसने अनमोल कीमत चुकाई. रमजान उन लाखों कर्मचारियों में शामिल था जिनके लिये सवेरा नई मेहनत और शाम थकान लेकर आती है. वह शासकीय कर्मचारी और ड्रायवर संघ का अध्यक्ष भी था लेकिन उसके परिवार की मदद के लिये कोई सामने नहीं आया. कर्मचारी-हितों के नाम पर कितने ही गुट-संगठन नेतागिरी करते हैं लेकिन प्रशासनिक दबाव के आगे सब बेबस नजर आ रहे. धर्म के उसूलों को आधार बनाकर बात-बात पर फतवा जारी करने वाली जमात हो या उनके नेता या फिर वोटों की खातिर अपनी राजनैतिक जमीन सींचने वाले राजनीतिक दल, रमजान अली की मौत पर आँसू बहाने का समय किसी को नहीं मिला. उसके जिंदा रहते ना सही, उसकी दुर्भागयपूर्ण और शर्मनाक मौत के जिम्मेदारों को सजा दिलाने की लड़ाई कांकेर से लेकर राजधानी तक लड़ी जानी चाहिए.

याद रखें कि यह घटना लाल आतंक में लिपटे उस जिले में हुई है, जहां आंख के बदले आंख का कबीलाई कानून लागू है लेकिन लोकतंत्र में न्याय की उम्मीद कानून के सांचे में ढली होती है. फिलहाल कमाऊ पूत के अचानक गुजर जाने से व्यथित पिता और अली का परिवार कलेक्टर के झूठे दिलासों का कफन ओढक़र सोने को मजबूर है. हुसैनी सेना, अली सेना, मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के अलावा मुस्लिम पंचायत और सीरत कमेटी जैसे संगठन हैं जिनकी एक आवाज पर पूरी कौम मदद के लिए खड़ी हो सकती है. वे चाहें तो रमजान के परिवार कोन्याय दिलाने की लड़ाई लड़ सकते हैं. यदि पत्थरों से बने आस्था-स्थलों के नाम पर जेहाद छिड़ सकता है तो रमजान को न्याय दिलाने के लिये क्यों नहीं?

अनिल द्विवेदी
लेखक पत्रकार हैं
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Wednesday, January 15, 2014

Wednesday, January 8, 2014

जिस कांग्रेस में 'बाबा' हैं
उस कांग्रेस में-जहां गांधी परिवार की मुहर ही अंतिम फैसला होती है-में इन दिनों कार्यकर्ता मन की बात कहने के लिये पार्टी फोरम नहीं बल्कि फेसबुक का सहारा ले रहे हैं! विधानसभा चुनाव में पार्टी की करारी हार से बौखलाए एक शख्स गोपाल साहू ने भड़ास निकालते हुए फेसबुक पर पोस्ट डाली. इसमें नेता प्रतिपक्ष रवीन्द्र चौबे की फोटो चस्पा करते हुए उनका एक बयान उद्धृत किया गया है. चौबे ने हार के बाद कहा था कि उम्मीदवार थोड़ा पहले तय हो जाते तो पार्टी जीत सकती थी. इस पर कार्यकर्ता ने कटाक्ष किया : आपकी टिकट तो तय थी महाराज. फिर कैसे हार गए?

यही सवाल एक साल पहले राहुल गांधी के समक्ष उठ चुका था. कार्यकर्ता भूले ना होंगे जब दुर्ग के एक कार्यकर्ता ने नेता प्रतिपक्ष रवीन्द्र चौबे की निष्क्रियता पर सवाल खड़ा करते हुए इस कदर आरोप लगाया था कि चौबे की आंखें गीली हो गई थीं. कांग्रेस की ताजा हार को लेकर जो खबरें जन्मीं, उसके मुताबिक जनमत साफ था कि निष्क्रिय, घमण्डी और बेईमान जनप्रतिनिधि नहीं चाहिये चाहे वह कांग्रेस हो या भाजपा लेकिन राहुल गांधी की इच्छा के विपरीत, नेता प्रतिपक्ष की जिद के चलते लगभग सभी विधायकों को टिकट दी गई जिनमें से सत्ताईस चुनावी मैदान में खेत हो गए. खैर.. अब पन्द्रह वर्ष का राजनीतिक वनवास बिताने को मजबूर कांग्रेस के कायाकल्प की शुरूआत हो ही गई. बदलाव के पहले शिकार प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष महंतजी हुए जिनके सर पर हार का ठीकरा फोड़ते हुए आलाकमान ने उनकी जगह तेजतर्रार और वरिष्ठ विधायक भूपेश बघेल को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया है लेकिन इन्हें मिली चुनौतियों की चर्चा बाद में.

अभी बात सरकार से लडऩे वालों की. विपरीत परिस्थितियों को साधते हुए, समझदारीभरे फैसले के साथ कांग्रेस विधायक दल को विश्वास में लेकर आलाकमान ने सरगुजा नरेश तथा वरिष्ठ विधायक टी.एस. सिंहदेव बाबा को नेता प्रतिपक्ष घोषित कर दिया. कहा तो यह जा रहा है कि गांधी परिवार से नजदीकी और महल के प्रभाव का इस्तेमाल करने के चलते सिंहदेव को यह अवसर मिला. इसे भी कौन नकारेगा कि सरगुजा में भाजपाई आंधी को थामकर सिंहदेव ने जिस तरह पार्टी की झोली में आठ में से सात सीटें डालीं, यह पद इसी का ईनाम माना जा रहा है. लेकिन राजनीति में नतीजे मायने रखते हैं, रणनीति नहीं. अब शर्माजी को ही लें. छठवीं बार विधायक बने सत्यनारायण जी नेता प्रतिपक्ष के प्रबल दावेदार थे लेकिन पार्टी में जरूरत से ज्यादा अज्ञातशत्रु पैदा कर लेना उनके लिये खतरनाक साबित हुआ. 

राजा अगर अच्छा है तो यह ईश्वर का वरदान है. यदि वह बुरा है तो मान लीजिए कि भगवान ने आपके पापों की सजा देने के लिये उसे भेजा है! नये साल में कुछ ऐसी ही उतार-चढ़ावभरी उम्मीद सरगुजा नरेश सिंहदेव से जुड़ चुकी हैं. नेक और कोमल स्वभाव वाले इस शख्स के सामने कई चुनौतियां हैं मगर राहुल गांधी की राह पर चलकर उनसे पार पाया जा सकता है. कांग्रेस का गढ़ वापस हासिल करने की तड़प के चलते कांग्रेस के युवराज ने युवा कार्यकर्ताओं के बीच टैलण्ट हाण्ट अभियान चलाया था लेकिन पार्टी उनका उपयोग कर पाती, इसके पहले बड़े नेताओं ने उनका शिकार कर लिया. सिंहदेव को भी युवा, उर्जावान और रमन सरकार के मंत्रियों को करारा जवाब देने वाले चेहरों को सामने करना होगा. लगातार तीसरी हार के बाद यदि कार्यकर्ता इस सोच के साथ घर बैठ गये हैं कि कांग्रेस का कुछ नहीं हो सकता तो उन्हें जगाने और उनमें विश्वास भरने का काम सिंहदेव को करना होगा. नब्बे विधानसभाओं में भी ऐसे चेहरे अभी से तलाशने-तराशने होंगे जो चुनाव जीतने की क्षमता रखते हों.

बड़े नेताओं के अहम और गुटबाजी से तंग आ चुके विधायकों में भरोसा जगाना बाबा के लिये तीसरी बड़ी चुनौती है. उनचालीस विधायकों में यह धारणा बलवती होती जा रही है कि भ्रष्टाचार से लेकर सरकार की खामियों तक के जिन मुद्दों को विधानसभा में वे उठाना चाहेंगे, उसके पीछे नेता प्रतिपक्ष का विश्वास और समर्थन बना रहेगा या नहीं. तीन बार से निर्वाचित हो रहे एक विधायक ने मुझसे कभी कहा था कि मयसबूतों के साथ उसने जब बलात्कार व हत्याकाण्ड का मामला पिछले विधानसभा में उठाना चाहा तो उसे चुप करा दिया गया. बाद में पता चला कि इसके बदले में नेता ने सरकार से भारी कीमत वसूल ली. यह कहने में गुरेज नहीं कि पूर्व के नेता प्रतिपक्षियों की कार्यशैली इस कदर बदनाम हो गई थी कि उन्हें रमन सरकार का चौदहवां मंत्री माना जाने लगा था. पत्रकारों ने जब इस छबि से मुक्त होने की बात सिंहदेव से पूछी तो उनका जवाब था : मैं मानता हूं कि हर आदमी की छबि उसके आचरण से तय होती है. आज के दौर में लोगों के सामने कुछ भी छुपा नहीं है. मेरे आचरण से पता चल जाएगा कि मैं क्या हूं?

आप क्या हैं, इसका अहसास होने लगा है. 2013 के चुनावों में दोबारा विधायक चुने जाने के बाद सिंहदेव पार्टी में ऐसे नेता के रूप में उभरे हैं, जिन्हें करिश्माई लीडर के तौर पर देखा जा रहा है. विधानसभा उपाध्यक्ष का विपक्षी-हक मांगने से लेकर अध्यक्ष पद पर सर्वानुमति कायम करने और लाल बत्ती को नकारने के बाद पार्टी और जनता उनके फैसलों की मुरीद हो चुकी है लेकिन सवाल यह है कि कांग्रेस कहां है और उसे कहां पहुंचाना है? क्या सिंहदेव आक्रामक और विश्वसनीय विपक्ष दे पाएंगे. इस देश में जहां पचास प्रतिशत से ज्यादा लोग युवा हैं तब कांग्रेस के अंदर बदलाव की एक बड़ी जरूरत महसूस हो रही है. जंग लगी मुरझाई सोच के थके-हारे चेहरों के बजाय कुछ कर गुजरने की सोच रखने वाले युवाओं को सामने लाना होगा. विधानसभा से लेकर संगठन और पंचायत स्तर तक में सरकार के खिलाफ धारदार हमला बोलने वाले युवा चेहरे तैयार करने होंगे. हालांकि गुटबाजी से अभिशप्त पार्टी में यह बदलाव थोड़ा समय मांगेगा मगर पांच साल कम थोड़े ही हैं.

अनिल द्विवेदी

Saturday, December 14, 2013

काँग्रेस ने अपने दुश्मन को देर से पहचाना
विधानसभा चुनाव की जंग और बयानों की उलटबांसियों के बीच एक अचरजभरा बयान केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश की ओर से आया. जीत या हार के कयासों के बीच एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि हमारी लड़ाई भाजपा से नहीं बल्कि आरएसएस यानि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से है! इस पर बात आगे बढ़े, उसके पहले एक कथा सुन लीजिये. महाभारत का आधा युद्ध खत्म हो चुका था और रणभूमि पर जिस तरह खून की नदियां बह रही थी, उससे चिंतित महाराज कृष्ण--कौरव और पाण्डव के मध्यस्थ--कौरवों को समझाने पहुंचे लेकिन कौरव नहीं माने तब कृष्ण अफसोस जताते हुए वहां से विदा होने लगे तो कौरवों ने उन्हें यह कहते हुए गिरफ्तार करने की कोशिश की कि सारा खेल इन्हीं का है. ये अर्जुन के सारथी हैं और पाण्डव इन्हीं की रणनीति पर  चलते हुए जीतते जा रहे हैं!

कांग्रेस को भी ऐन चुनाव के वक्त यह अहसास हुआ कि उसका मुकाबला भाजपा से नहीं बल्कि आरएसएस से है! रमेश ने जो सवाल उठाया है, पूर्व में भी कांग्रेस में इस पर चिंता हो चुकी है लेकिन हम यहां इस सवाल के बहाने कमजोर होती कांग्रेस और आरएसएस रूपी खाद से मजबूत होती भाजपा की चर्चा करेंगे क्योंकि आजादी के 65 साल बाद यदि कांग्रेस को अपने सही दुश्मन की पहचान हुई है तो सवाल यह खड़ा हुआ है कि वह आरएसएस से लडऩे की स्थिति में है भी या नहीं! जनसंघी दौर से लेकर 1990 की मात्र दो लोकसभा सीट से भाजपा यदि 137 तक पहुंची है और कांग्रेस का विकल्प बन चुकी है तो इसके पीछे आरएसएस की वर्षों की तपस्या है.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पहले सरसंघचालक हेडगेवार ने 1925 में नागपुर के मोहितेबाड़ा में आरएसएस का बीज बोया और पांच चुनिंदा प्रचारकों को देश के बड़े शहरों में भेजकर संघ-कार्य की शुरूआत की. नींव के पत्थर की भांति इन पांचों ने संगठित हिन्दु के लक्ष्य के साथ आरएसएस की जमीन को सींचना शुरू किया. यह वह दौर था जब लोग देखते-सुनते ही हंसने लगते थे कि क्या आप हिन्दु समाज को एकत्रित करेंगे! क्योंकि ऐसा करना मेंढक़ तौलने जैसा माना जाता है. लेकिन प्रचारकों ने धैर्य नहीं खोया. आज संघ के चार हजार से ज्यादा प्रचारक-जिनमें से कई इंजीनियर-डॉक्टर हैं-घरबार छोडक़र देश और समाज की चिंता कर रहे हैं. 50 हजार से अधिक शाखाएं और विविध क्षेत्रों में कार्यरत 30 से ज्यादा बड़े संगठनों की कार्यक्षमता के दम पर संघ ने करोड़ों भारतीयों को अपने साथ जोड़ रखा है.

बसपा के कांशीराम भी कभी संघ के कार्यों से प्रभावित हुए थे लेकिन जब विचार नहीं जमे तो उन्होंने संघ से किनारा करते हुए बहुजन समाज पार्टी का विकल्प दिया. हालांकि वहां भी उन्होंने संघ के समतामूलक समाज या दलितों को हिन्दु समाज की मुख्य धारा से जोडऩे का ही काम किया. यह स्वागतेय है कि मायावती भी उसी विजन के साथ आगे बढ़ रही हैं. नानाजी देशमुख ने चित्रकूट में जो प्रकल्प खड़ा किया या दत्तोपंत ठेंगड़ी ने जिस तरह मजदूरों के लिये काम किया, वह भी आरएसएस से ही प्रेरित रहे. देश से लेकर विदेश तक में ना सिर्फ आरएसएस खड़ा हुआ बल्कि विद्या भारती (सरस्वती शिशु मंदिर), विश्व हिन्दु परिषद, मजदूर संघ, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, स्वदेशी जागरण मंच, वनवासी कल्याण आश्रम, सेवा भारती, ग्राम भारती इत्यादि विशालकाय संगठन खड़े किये जिन्होंने जमीन से जुडक़र काम खड़ा और करोड़ों दिलों में देशभक्त संगठन के तौर पर अपनी अमिट पहचान कायम की. चाहे गांधीजी की हत्या हो या फिर भारतीय लोकतंत्र का काला अध्याय आपातकाल, नेहरू युग से लेकर हाल के सोनिया युग तक आरएसएस को बदनाम करने, रोकने की कई साजिशें रची गई, रची जा रही हैं लेकिन संघ ने इसकी परवाह कभी नहीं की.

कभी समय मिले तो छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा में होकर आइयेगा. आरएसएस के एक प्रचारक ने सालों पूर्व वहां जिस कुष्ठ आश्रम की शुरूआत की, आज वह विशालकाय वटवृक्ष बन चुका है. दस हजार से ज्यादा कुष्ठ रोगी अपना इलाज करा चुके हैं. जशपुर, रायपुर और बस्तर में आदिवासियों के लिये जो वनवासी कल्याण आश्रम चलाये जा रहे हैं, उनमें आदिवासियों का भरोसा जबरदस्त ढंग से जमा है. यह तो एक उदाहरण है. पूरे देश में संघ ऐसे हजारों प्रकल्प चला रहा है. क्या कांग्रेस या उसके मातहत काम कर रहे संगठनों ने कभी इस तरह के प्रकल्प चलाने की कोशिश की? महात्मा गांधी से लेकर अम्बेडकर तक संघ के शिविरों में पहुुंचे. वहां का दृश्य देखकर उन्होंने स्वीकारा कि जिस समतामूलक समाज की कल्पना वे करते हैं, संघ उसकी बेहतर नर्सरी साबित हो सकता है.

संघ रूपी बैसाखियों का सहारा लेकर जहां एक तरफ भाजपा मजबूत होती चली गई तो दूसरी ओर जंग लगी और मुरझाई सोच का प्रयोग करते हुए कांग्रेस अपना परम्परागत वोटबैंक खोती गई बल्कि अपनी जड़ों से कटती चली गई. उदाहरण के तौर पर कांग्रेस आरएसएस को मुस्लिमों का विरोधी बताते रही है मगर दो साल पहले संघ के समर्थन से मुस्लिम राष्ट्रीय मंच प्रारंभ हुआ तो उसे जबरदस्त सफलता मिली. शुरू में मुसलमान हिचके जरूर लेकिन बाद में उन्हें समझ में आ गया कि मन और दिमाग में छाई धुंध को साफ करना ही होगा. आज हजारों मुसलमान मंच से जुड़े चुके हैं. उन्हें समझ में आने लगा है कि धर्मनिरपेक्षता का चोला ओढक़र कांग्रेस सहित दूसरे राजनीतिक दल महज वोटबैंक की खातिर संघ का हौव्वा दिखाते रहे.

ताजा चुनाव इसके सबसे बड़े प्रतीक बनकर उभरे हैं. अभी राजस्थान में कांग्रेस ने 14 मुस्लिमों को विधानसभा के टिकट दिये लेकिन जीते एक भी नहीं. जबकि मध्य प्रदेश चुनाव में भाजपा ने चार मुस्लिमों को टिकट दिये जिनमें से दो जीतकर आ गये. संदेश स्पष्ट है कि मुसलमानों को भी कांग्र्रेस पर भरोसा नहीं रहा क्योंकि सालों तक उन्हें सिर्फ वोटबैंक समझा गया. शिशु मंदिरों से हजारों मुस्लिम बच्चे पढक़र निकलते हैं लेकिन उन्हें शिशु मंदिर कभी साम्प्रदायिक नहीं लगा. बात को लम्बा खींचने के बजाय शार्टकट में यह समझने की कोशिश करते हैं कि मात्र अल्पसंख्यकों की बात कहके कांग्रेस जिस तरह बहुसंख्यकों को नजरअंदाज कर रही है, उसका खामियाजा उसे कदर भुगतना पड़ रहा है?

संघ तो कबका ऐलान कर चुका है कि यदि कांग्रेस राष्ट्रवाद और हिन्दुत्व की चिंता करने लग जाये तो वह भी हमारा समर्थन ले सकती है. यकीन मानिए कि कांग्रेस का बुनियादी ढांचा अभी भी जमींदोज नहीं हुआ है लेकिन उसे खाद, पानी देने की जरूरत है. आज भी कांग्रेस अराजकता, अलगाववाद, आर्थिक आजादी और भारत को महाशक्ति बनाने के सपने के साथ समाज के सबसे निचले तबके तक जा सकती है लेकिन इसके लिये खुद आलाकमान को पहल करनी होगी. उसे पहला संदेश यह देना होगा कि वह सिर्फ अल्पसंख्यकों के लिये नहीं बल्कि पूरे देश की चिंता करती है. जैसे नरेन्द्र मोदी कहते हैं कि करोड़ों गुजरातियों की चिंता करता हूं.

सिर्फ भाजपा या आरएसएस ही क्यों? वामपन्थी या दक्षिणपंथी पार्टियों को देख लीजिये. द्रमुक से लेकर अन्नाद्रमुक और तृणमूल से लेकर कांशीराम-मायावती तक, सभी ने मेहनत से, नीतियों से अपनी पार्टियों को खड़ा किया जो आपकी छाती पर मूंग दल रही हैं. बसपा सहित इन सभी का वोट बैंक जिस तरह पूरे देश में बढ़ रहा है, कांग्रेस को उससे सीख लेने की जरूरत है. कांग्रेस को एक बार फिर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की ओर लौटना होगा. उसे अपनी जड़ों को सींचना होगा. उसका सपना यदि आरएसएस को पछाडऩा है तो मैं इसमें आरएसएस की हार नहीं देख रहा हूं बल्कि मन में एक उम्मीद जगी है कि कांग्रेस वाकई भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस होने जा रही है!

अनिल द्विवेदी
(लेखक राजनीतिक टिप्पणीकार हैं)

Thursday, August 15, 2013

अब दाँव पर मूछें कौन लगायेगा

‘आइ एम द किंग ऑफ रियासत बट दिस परसन इज द किंग ऑफ डेमोक्रेसी’ यानि मैं तो एक रियासत का राजा हूं लेकिन जूदेव लोकतंत्र के राजा हैं क्योंकि इन्हें जनता ने चुनती है. राजस्थान के महाराजा ने अपने विदेशी मेहमानों से दिलीपसिंह जूदेव का परिचय कभी इसी अंदाज में करवाया था. रौबीले चेहरे की शान बन चुकी घनी मूंछों पर ताव देते शख्स के तौर पर, मेरी तरह हिन्दुस्तानियों को भी दो ही चेहरे नजर आते हैं. एक थे देश की आजादी के नायक चंद्रशेखर आजाद और दूसरे जशपुर नरेश दिलीप सिंह जूदेव, जो हमारे बीच अब नहीं रहे. नईदिल्ली के मेदांता अस्पताल में कई दिनों तक जिंदगी और मौत से संघर्ष करने के बाद उन्होंने अंतिम सांसें ली.

इस दु:ख भरे क्षण में ना चाहते हुए भी यह बात कहना पड़ रही है कि गुजरे कुछ समय से जशपुर राजघराने पर अपशकुनों की छाया मंडरा रही है. हम भूले नहीं हैं कि चंद महीनों पूर्व ही उन्होंने अपने बड़े बेटे शत्रुंजय प्रताप सिंह को अकाल मृत्यु के हाथों खोया था और चंद महीनों बाद ही माँ जयादेवी का हाथ भी उनके सर से उठ गया था. ढलती उम्र और छोटी-मोटी बीमारियों से जूझ रहे जूदेव को बड़े बेटे की मौत ने हिलाकर रख दिया था. दरअसल वे उनमें अपना राजनीतिक वारिस खोज रहे थे. सब कुछ ठीक-ठाक रहता तो बिलासपुर का अगला सांसद जूदेव नहीं बल्कि उनके सुपुत्र शत्रुंजय बनते. खुद जूदेव के जनाधार का आलम देखिये कि उनके नाम पर ‘जूदेव सेना’ तक बनाई गई लेकिन इसका इस्तेमाल उन्होंने अन्य राजनीतिज्ञों की तरह कभी भी पार्टी को ब्लैकमेल करने या किसी को सबक सिखाने के लिये नहीं किया.

भाजपा के लिये अपूरणीय क्षति और हिन्दुत्व रूपी राजनीति का कभी ना भरा जाने वाला शून्य. देश की सियासत से लेकर छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पाटी का जनाधार पैदा करने वालों में जिन नेताओं को खासा याद किया जायेगा, जूदेव उनमें से एक होंगे. शरीर पर फौजी वर्दी, हाथ में हिन्दुत्व का झंडा और इसाई मिशनरियों के पुराने प्रतिद्वंद्वी लेकिन हिन्दु ह्दय सम्राट के तौर पर अपनी पहचान कायम रखने वाले दिलीपसिंह जूदेव एक ऐसे नेता थे जिनके परिवार ने पहले जनसंघ और फिर भाजपा के लिये अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया. यह कहते हुए सुकून होता है कि संघर्षशील जनसंघ से लेकर भाजपा के राजशाही युग तक जूदेव की तीसरी पीढ़ी पार्टी की सेवा में वफादारी के साथ लगी है. बहुत कम लोग जानते होंगे कि 1970 के दशक में-जब देश में एक ही पार्टी कांग्रेस का जलवा था-जूदेव के पिताजी ने मात्र एक रात के फैसले में जनसंघ की तरफ से सांसद का चुनाव लडऩे का फैसला स्वीकार किया बल्कि पूंजी लगाकर दूसरे अन्य प्रत्याशियों का हौंसला बढ़ाया. जूदेव पर परिवारवाद के लाख आरोप लगे हों लेकिन आईना दिखाता सच यह है कि राजाजी ने कई गरीब-गुरबों को फर्श से उठाकर अर्श तक पहुंचाया और मंत्री, विधायक व सांसद की कुर्सी दिलवाई.

एशिया का सबसे प्राचीनतम चर्च जशपुर में है तो अंदाजा लगाइये कि यहां पर चर्च की जड़ें कितनी मजबूत होंगी लेकिन जूदेव होश संभालते ही उनके लिए हमेशा अजेय चुनौती बने रहे. हिन्दु से इसाई बन गये लाखों लोगों को पुन: हिन्दु धर्म में लाने के लिये उन्होंने लम्बी-चौड़ी लड़ाईयां इतने प्रभावी ढंग से लड़ी कि 1988 के आसपास जशपुर की एक नन-मिशनरियों की महिला संत-को अदालत ने जिलाबदर कर दिया था.  आदिवासियों के पैर धोकर उन्हें पुन: घर-वापसी कराते हुए देखने पर यकीन नहीं होता था कि एक राजा के मन में हिन्दुत्व के प्रति कितनी श्रद्धा और विश्वास था. अब जबकि जूदेव नहीं हैं, संघ परिवार सहित हिन्दु समाज के समक्ष यह संकट आन पड़ा है कि घर वापसी अभियान की कमान किसके हाथों में होगी?

जशपुर नरेश जूदेव ताउम्र राजा की तरह जिए, राजा की तरह दहाड़े और उनकी विदाई भी राजा की तरह हुई. राजनैतिक नुमाइंदे भूले ना होंगे कि अपने राजनैतिक कैरियर की शुरूआत में उन्होंने पहला चुनाव अर्जुनसिंह के खिलाफ दमदारी से लड़ा था और उनके ‘चेले-चपाटों’ से अब तक लड़ते रहे. यह कतई छुपा नहीं है कि जोगी और जूदेव परंपरागत राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी बनकर एक-दूसरे को पछाड़ते रहे लेकिन राजनीतिक कड़ुवाहट के लिये जूदेव के मन और जुबान में कोई भेद ना था. पिछले लोकसभा चुनाव में जब उन्होंने डॉ. रेणु जोगी को हराया तो भावनाओं के प्रगटीकरण में वे मुझसे यह कहना नहीं भूले कि ‘यदि मैं हार भी जाता तो रेणु जोगी जैसी महिला से हारने का संतोष होता.‘
   
जूदेवजी दिल से राजा थे. सडक़ से लेकर संसद तक, आम से लेकर खास तक से खुद आगे बढक़र हाथ मिलाने की उनकी अदा लोगों का दिल जीतती थी. उनकी राजनीतिक पहुंच का असर देखिये कि एनडीए सरकार जाने के बाद जब यूपीए सरकार सत्ता में आई तो छत्तीसगढ़ के एक वरिष्ठ भाजपा सांसद का सामान बंगले से उठाकर बाहर फेंकवा दिया गया मगर जूदेव ताउम्र रकाबगंज स्थित अपने उसी बंगले में रहे जो उन्हें केंद्रीय राज्यमंत्री रहते हुए आबंटित हुआ था!  दोस्ती निभाने में या मेहनमानवाजी करने में उनका कोई मुकाबला नहीं था. जिस स्टिंग ऑपरेशन ने उनके राजनैतिक कैरियर पर काला धब्बा लगा दिया, उस साजिश के तथाकथित दोषी नटवर रतेरिया को-परिवार और मित्रों के लाख विरोध के बावजूद-अपने से कभी जुदा नहीं होने दिया. हालांकि इस बड़ी चूक ने उनके मुख्यमंत्री बनने के सपने को चकनाचूर कर दिया. सिद्धांतों और पार्टी की इज्जत के लिये जूदेव ‘सिंह’ की तरह लड़े. सन् 2003 में जोगी सरकार के खिलाफ ताल ठोंकने की बारी आई तो उन्होंने अपनी मूंछें दांव पर लगाकर पार्टी को ऐतिहासिक जीत दिलवाई.

अपने हमसफरों के लिये वे किसी भी स्तर की लड़ाई लड़ लेते थे. राज्य में भाजपा की सरकार दस सालों से चल रही है और मंत्रियों से लेकर मुख्यमंत्री तक से उनके कई मतभेद थे मगर पार्टी की इज्जत की खातिर दिलीप ंिसह जूदेव ने सार्वजनिक तौर पर कभी खुलकर कुछ नहीं कहा. मगर पिछले साल ही उनके बिलासपुर के एक समर्थक पर जब पुलिसिया अत्याचार हुआ और सरकार ने उनकी बातों पर कान नहीं धरे तो जूदेव प्रशासनिक आतंकवाद के खिलाफ जमकर दहाड़े. हमारे अजीज जूदेवजी तो चले गये लेकिन युद्धवीर सिंह के लिये एक निर्मम सच्चाई यह है कि वे एक ऐसे कुरूक्षेत्र में खड़े हैं जहां परिवार से लेकर क्षेत्र की जनता के लिए, अपने राजनैतिक कैरियर और पिता के सपनों को पूरा करने के लिए हर मोर्चे पर लडऩा-जीतना होगा. उम्मीद की छतरी हमने भी तानी है कि अपने नाम के मुताबिक युद्धवीर, इस महासमर में विजयी होकर निकलेंगे. गम और संकट की इस घड़ी में फिलहाल एक ही वादा : हम आपके साथ है!

अनिल द्विवेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार और शोधार्थी हैं.

Tuesday, August 13, 2013

किसका राज, कैसा धर्म

देर से ही सही, उस सच को देश के पूर्व गृहमंत्री लेकिन अब केंद्रीय वित्त मंती पी. चिदंबरम ने कुबूल कर ही लिया कि जम्मू-कश्मीर में एक वर्ग ऐसा भी है जो आज भी पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाता है और यह सिलसिला 1990 से चला आ रहा है. लेकिन इसके उलट अफसोस और आश्चर्य दूसरे बयान में दिखा. केंद्रीय गृह मंत्री की ओर से संसद में बोलने के लिए खड़े हुए चिदंबरम ने कहा कि ‘यह कोई नई बात नहीं है. ऐसा ईद के मौके पर एक वर्ग सालों से करता आ रहा है.‘ उनके एक और वक्तव्य पर मेरी तरह पूरा देश उनके साथ है कि 1990 की तरह हालात बिगडऩे नहीं दिये जायेंगे और ऐसे असामाजिक तत्वों से निबटने के लिये सेना पूरी तरह स्वतंत्र है? चिदंबरम की इस दृढ़ता को भी पूरा समर्थन है कि किसी को भी जम्मू-कश्मीर से विस्थापित नहीं होने दिया जायेगा.

निश्चित तौर पर कट्टरता भारतीय समाज का चरित्र कभी नहीं रहा. मगर सवाल यह मौजूं है कि यदि एक वर्ग देशद्रोही विचारों के साथ पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाता है तो दूसरा वर्ग उनसे यह सवाल तो कर ही सकता है कि भाई जब इस देश में रहते हो, यहां का हवा-पानी-अन्न खाते हो तो हिन्दुस्थान पर बुरी नजर रखने वाले पाकिस्तान की जय-जय क्यों? इसलिए जम्मू-कश्मीर के एक वर्ग ने यही किया. सरकारी ऐलान है कि ईद के दिन नमाज पढऩे के बाद खुरेंजी के जुनून में अंधे एक गुट ने देश विरोधी नारे लगाये जिसका स्थानीय लोगों ने विरोध किया. इससे गुस्साई भीड़ ने बंदूक, तलवार और डण्डे हाथ में लिये मुनीद चौक पर लगभग सौ दुकानों को फूंक डाला और तीन को गोली मार दी. इसमें दो की मौत हो गयी और सैंकड़ों घायल हुए. पुलिस और अन्य सिविल अथॉरिटी ने पूरे मामले में किसी प्रकार का प्रतिरोध दर्ज नहीं करवाया बल्कि दंगाईयों को और सहायता प्रदान की गयी. अफसोस कि रामबन में सुरक्षा बलों तक को निशाना बनाया गया.

आजादी के बाद से ही जम्मू की देशभक्त जनता ने लगातार न केवल आतंवाद के विरुद्ध आवाज उठाई बल्कि उसे हराया भी है. आतंक और अलगाववाद का खूनी खेल, खेल रहे लोग हताश हो चले हैं. उन्हें लगता था कि बंदूकों के दम पर या तो वे अल्पसंख्यकों को कश्मीर से भगा देंगे या फिर इस्लाम कबूल करवा लेंगे लेकिन कश्मीर की बहादुर जनता ने उनकी इन धमकियों पर कभी कान नही धरे. ऐसे में आतंकवाद और अलगाववाद को करारी शिकस्त मिली तो उन्होंने इन लोगों को बदनाम करने के लिए नए तरीके ईजाद कर लिए हैं. घटना के बाद मचे राजनैतिक कोहराम और दबाव के बाद राज्य के गृहमंत्र्री ने आखिर इस्तीफा दे ही दिया लेकिन कश्मीर के स्थानीय अखबार जो लिख रहे हैं, उसके मुताबिक नमाज में राज्य के गृहमंत्री भी शामिल हुए थे. उनकी आंखों के सामने दंगाईयों ने उत्पात मचाया लेकिन गृहमंत्री मानो उनका साथ देने के लिये ही खड़े थे!

बात चाहे गुजरात की हो या जम्मू-कश्मीर की, एक राजा को धर्मनिरपेक्ष रहना-दिखना चाहिए. उमर अब्दुल्ला अपने पापों को गुजरात दंगों का बहाना बनाकर भले ही छिपा लें लेकिन इस इतिहास को सभी जानते हैं कि कश्मीर की समस्या को भाड़े के आतंकवादियों से ज्यादा भारतीय सियासतदांओं ने उलझाया है. पहले शेख अब्दुल्ला और जवाहरलाल नेहरू, अहं की लड़ाई लड़ रहे थे बाद में उनके खानदानी वारिसों ने इस जंग की जिम्मेदारी उठा ली. कश्मीर के सत्तानायकों से उम्मीद है कि वे कश्मीर को अपनी राजनीतिक लिप्साओं का मुददा नही बनाएंगे. कश्मीर राजसत्ता का नहीं बल्कि इस देश की भावसत्ता का मुद्दा है. कश्मीर के लोग अपने दम पर अकेले इस चक्रव्यूह से निकल पाएंगे, यह मान लेना भूल होगी. इससे निबटने में नईदिल्ली और श्रीनगर की ससरकारों की नेकनीयती और मजबूत इच्छाशक्ति भी बेहद जरूरी है.

सत्ता, शक्ति और मजहब का अनूठा कॉकटेल तैयार करने वाले कुछ राजनीतिक दलों की चुप्पी ने इस बात का अहसास कराया है कि मानो जम्मू-कश्मीर भारत का अंग ना हो. अल्पसंख्यकों के अधिकारों की बात करने वाले ऐसे छुपे बैठे हैं मानो कश्मीर के अल्पसंख्यकों के दर्द और उन पर हो रहे अन्याय से उन्हें कोई लेना-देना ही नहीं है. यहां बहुजन समाज पार्टी के नये और ताजा रूख की तारीफ करना चाहूंगा कि उन्होंने वोट बैंक के खातिर ही सही, देश की एकता और शांति बनाये रखने की अपील करते हुए दोषी गृहमंत्री के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की मांग तो रखी.

और सरकार से ज्यादा जरूरत हमारी चिंताओं की है जो महज परिवार और अपने स्वार्थपूर्ति तक आकर खत्म हो गई हैं. हनीमून मनाने से लेकर धार्मिक यात्रा करने तक हमारे पांव जम्मू (कटरा) से आगे कम ही बढ़ते हैं. क्या हमने कभी जम्मू-कश्मीर जाने की हिमाकत की? पाकिस्तानी सेना के दुस्साहस से लेकर आतंकवादियों तक यदि कश्मीर में पनपे-पसरे हैं तो इसके जिम्मेदार हम भी हैं क्योंकि हमने कश्मीर को उसके भागय और हाल पर छोड़ दिया है. सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर मौज-मस्ती, गॉसिप या अश्लील चित्रों को एक-दूसरे से बांटकर दिल बहलाने वालों को देश की समस्या पर बोलने या लिखने की फुरसत कब मिलेगी! सही समय है कि मजहब के नाम पर जुनून बांटने वालों को जुदा करने की मुहिम में हमें जुटना ही होगा. ना भूलें कि चलना, जीना और बढऩा ही हमारी रवायत है,

अनिल द्विवेदी
(लेखक पत्रकार और शोधार्थी हैं)

Saturday, July 20, 2013

काश मुर्दे बोल पाते ?


 मुर्दे भी बोल सकते हैं? देश के सबसे ज्यादा नक्सल प्रभावित छत्तीसगढ़ और खासकर बस्तर में यह हास्यास्पद सवाल अनेकों बार उठा है. नक्सली एनकाउंटर हो, आदिवासी महिला के साथ सामूहिक बलात्कार या फिर आदिवासियों को नक्सली बताकर जेल में डालने जैसी कार्रवाई, मानवाधिकार संगठन से लेकर मृतकों के परिजन तक पुलिस की भूमिका पर अंगुलियां उठाते रहे हैं.

बात आगे बढ़े, उसके पहले दृढ़ता के साथ यह साफ कर दें कि हम यहां पर पुलिस के साहस, कार्रवाई या अभियानों पर प्रश्नचिह्न खड़ा करके उनका मनोबल कमजोर नहीं करना चाहते. किसी के हाथ में बंदूक है तो आप प्रवचन की मुद्रा में कब तक खड़े रहेंगे? 76 जवानों की शहादत होती है तो कलेजा हमारा भी रोता है. मगर जो न्याय कहता है, वह यह कि यदि किसी को चोरी के आरोप में पकड़ रहे हैं, मार रहे हैं तो सबूत तो देने होंगे ना. यही सवाल मैंने दो वर्ष पहले राज्य के पूर्व पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन से किया था. तब उन्होंने स्वीकार किया था कि पुलिस अधिकारी भी किसी डर या दबाव से अपने पूर्ववर्ती बयान से मुकर सकता है! दरअसल कांकेर न्यायालय ने एक फैसला सुनाते हुए उन अठारह आदिवासियों को बाइज्जत बरी कर दिया था जिन्हें पुलिस पार्टी पर हमला बोलने के आरोप में दो साल तक जेल में डाले रखा और अदालती लड़ाई के चक्कर में इन ग्रामीणों ने बहुत कुछ खो दिया था. क्या इस तरह की घटनाएं बंदूक उठाने को विवश नहीं करेंगी!

पुलिस की कार्रवाईयां हमेशा संदेह और सवालों के घेरे में क्यों आ जाती हैं? गुजरे सालों में ऐसी कई मुठभेड़ें हुईं जब माओवादियों को मारने का दावा किया गया मगर जल्द ही वह संदिगध हो गयी. आरोप तो यहां तक लगे कि सफलतायें गिनाने के लिये पुलिस ने निर्दोष ग्रामीणों को मार डाला! चंद दिनों पूर्व ही महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले में इटापल्ली के नजदीक पुलिस के साथ हुई मुठभेड़ में छह महिला नक्सलियों को मारने का दावा किया गया है मगर परिस्थितियां और बयानों के मुताबिक  मामला संदिगध नजर आ रहा है! कांग्रेस काफिले पर नक्सली हमले के चंद दिनों पूर्व ही सीआरपीएफ ने एडसमेटा में एक मुठभेड़ के तहत सात नक्सलियों को मार गिराने की बात कही थी लेकिन जल्द ही पता चल गया कि वे सभी आदिवासी थे जो पूजा के लिये इकट्ठा हुए थे लेकिन सर्चिंग करती पुलिस ने उन्हें नक्सली समझा व ताबड़तोड़ गोलियां चला दीं. आश्चर्य कि इस मामले में पुलिस ने जरूरी दस्तावेज तक उपलब्ध नहीं कराये नतीजन आयोग की जांच अटकी हुई है.

मानवता को कलंकित करते ऐसे हादसे एक नहीं, कई हैं. गुजरे 14 फरवरी को ही कांग्रेस ने आरोप लगाया था कि बीजापुर जिले के मदपाल गांव में जिला पुलिस बल और एसटीएफ ने मित्तुर थाना से 8 कि.मी दूर एक फर्जी मुठभेड़ में दो युवकों की हत्या कर दी जबकि ये अपने छह मित्रों के साथ जंगल घूमने के लिये निकले थे. इसके विरोध में पुलिस को जो ज्ञापन सौंपा गया, उसका कोई नतीजा नहीं निकल सका. मानो आदिवासियों के जीवन की कोई कीमत ही नहीं रही. सालों पूर्व दंतेवाड़ा के सिंगारम गांव में एसपीओ और जिला पुलिस ने 15 नक्सलियों को मारने का दावा किया था लेकिन सामाजिक संगठन और मृतकों के परिवारजन कहते हैं कि पुलिस ने नक्सलियों को पनाह देने के आरोप में ग्रामीणों को एक कतार में खड़ा करके नरसंहार किया. इस मामले की सुनवाई अभी भी जारी है.

अप्रैल, 2010 में दंतेवाड़ा के ताड़मेटला में नक्सलियों ने 76 जवानों को मौत के घाट उतार दिया था. इस ह्दय विदारक घटना के कुछ महीनों बाद इलाके की सर्चिंग कर रहे कोया कमाण्डो व पुलिस जवानों ने जांच के बहाने आदिवासियों के साथ मारपीट और महिलाओं से बलात्कार किया तथा तीन सौ से ज्यादा घरों को आग के हवाले कर दिया. घटना की वस्तुस्थिति जानने पहुंचे स्वामी अगिनवेश को पुलिसिया आतंक का शिकार होना पड़ा था. आश्चर्य कि मामले की जांच के लिये बैठाये गये आयोग ने अभी तक अपनी रिपोर्ट नहीं दी और सीबीआई भी केंचुए की गति से आगे बढ़ रही है.

इन सबमें जो दर्दनाक वाकया है, वह मीना खलखो मुठभेड़ से जुड़ा है. आरोप है कि जुलाई, 2011 में पुलिस और नक्सलियों के बीच जो कथित मुठभेड़ हुई, उसमें एक आदिवासी लडक़ी मीना खलखो मारी गई थी. पुलिस उसे नक्सलवादी बता रही है जबकि गांववालों ने मुठभेड़ को फर्जी करार दिया था. कांग्रेस के क्षेत्रीय विधायक टी.एस. सिंहदेव के मुताबिक मामला विधानसभा में उठने के बाद आई फारेंसिक रिपोर्ट से जो खुलासा हुआ, उसके मुताबिक मीना के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ और फिर गोली मार दी गई! इस मामले पर बैठे जांच आयोग ने अभी तक सुनवाई पूरी नहीं की है. जून 2012 की रात सारकेगुड़ा में हुई एक मुठभेड़ में पुलिस ने 17 नक्सलियों को मार गिराने का साहस दिखाया था लेकिन एक दिन में ही साफ हो गया था कि मारे गए लोग ग्रामीण थे जिसमें कुछ नाबालिग स्कूली बच्चे भी थे! मामले की जांच का हाल यह है कि अभी तक पुलिस दस्तावेज तक उपलब्ध नहीं करा सकी है.

वैसे किसी के माथे पर नहीं लिखा है कि वह नक्सली है या पुलिस. और यही कारण है कि निर्दोष भी चपेट में आ जाते हैं. साफ है कि अगर पुलिस इसी सोच में डूबी रहे तो नक्सलियों को जवाब कैसे दिया जायेगा? लेकिन इस उहापोह में निर्दोष आदिवासियों को मारने की छूट नहीं दी जा सकती. फर्जी मामले और पुलिस प्रताडऩा के आगे दम तोडऩे जैसा प्रकरण तथाकथित माओवादी पोडिय़ामी माड़ा का है. माड़ा ने पुलिस थाने में ही फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी. पूर्व की नागा बटालियन और सीआरपीएफ के अनेक जवानों पर पहले बलात्कार और बाद में एनकाउंटर करने की घटनाएं घटी लेकिन दोषी अभी तक या तो बचे हैं या ऐसे मामलों पर जो जांच कमेटियां बैठाई गईं, उनकी जांच रिपोर्ट या तो आई नहीं या फिर उन्हें रद्दी की टोकरी में डाल दिया गया. कुछ में नाममात्र की खानापूर्ति की गई. कहावत यूं ही नहीं बनी है कि सैंया भये कोतवाल तो डर काहे का! पुलिस की जांच पुलिस ही करेगी तो न्याय कहां से मिलेगा? काश मुर्दे बोल पाते.

अनिल दिवेदी
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और शोधार्थी हैं)