Thursday, January 16, 2014

रमजान शरीर से गया, ये आत्मा से!

विषम कोण :

तीन महीने से छिन चुकी अपने पसीने की कमाई को हासिल करने की गुहार लगाते-लगाते रमजान अली दुनिया से चल बसा. कांकेर के जिलाधीश कार्यालय में जब उसने मिट्टी का तेल छिडक़कर अगिनदाह किया तो उसकी आत्मा के साथ-साथ मानवता, प्रशासनिक संवेदनशीलता और सुराज के खोखले दावे भी होम हो चुके थे. इस ह्दय विदारक घटना के बाद जेहन में दो बड़े सवाल उभरे हैं. पहला यह कि जिंदगी और मौत से जूझते अली ने जिस अफसर को दोषी बताया है, उसके खिलाफ एफआईआर क्यों नहीं हो रही? और दूसरा यह कि सरकार और प्रशासन यदि उसे बचाने में लगे हैं तो कर्मचारी-कल्याण के नाम पर नेतागिरी बघारने वाले या मुस्लिमहितों के नाम पर अपनी रोटियां सेंकने वाले धार्मिक-सामाजिक संगठन या उसके नेता, रमजान को या उसके परिवार को न्याय दिलाने के लिये आगे क्यों नहीं आ रहे?

भाईजान की मौत कई चेहरों पर एक बड़ा तमाचा है. वह जिला पंचायत कांकेर में ड्रायवर के पद पर कार्यरत था. विगत 5 जनवरी को यूट्यूब पर अपलोड तथा मृत्यु-पूर्व दिये अपने बयान में अली ने जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी, आइएएस भीम सिंह को अपनी मौत के लिये जिम्मेवार ठहराया है. इसके अलावा मेरे पास उस आवेदन-पत्र की कॉपी भी है जो उसने कलेक्टर को लिखा था. दो नवम्बर के इस पत्र में रमजान ने कहा था, ‘जिला पंचायत के सीईओ ने सितम्बर व अक्टूबर माह का मेरा वेतन बिना कारण बताए रोक दिया है. मुझे कार्य में अनुपस्थिति रहने का कारण बताओ नोटिस दिया जाता है जबकि मैं नियमित रूप से अपने कर्तव्य स्थल पर उपस्थित रहता हूं और हाजिरी रजिस्टर में हस्ताक्षर करता हूं जिसकी जांच करवा सकते हैं.’ वह आगे लिखता है : मेरी पत्नी ह्दय रोग से पीडि़त है. वेतन नहीं मिलने से आर्थिक परेशानी हो रही है. मुझे ऐसा लगता है कि मैं आत्महत्या कर लूं.’

लेकिन तर्कों और दिलासों के तीर चला रही पुलिस के लिये मानो ये दोनों सबूत सीईओ के खिलाफ एफआइआर के लिये पर्याप्त नहीं हैं इसलिए जांच जारी है. तय है कि यह कवायद भी खानापूर्ति के साथ खत्म हो जायेगी. कई मामलों का हश्र हम देख चुके हैं. मुद्दे की बात यह है कि अली ने मदद पाने के लिये अफसरों के अलावा मुख्यमंत्री, मंत्री सहित हर उस दरवाजे पर दस्तक दी जहां से उसे न्याय मिलने की उम्मीद लग रही थी लेकिन हाथ आई तो सिर्फ निराशा जिसके बाद उसने जीवनलीला समाप्त कर ली. कांकेर जिलाधीश अलरमेल मंगई डी की कार्यशैली भी सवालों के घेरे में है. चर्चित झालियामारी आश्रम काण्ड में उनकी निष्पक्ष और त्वरित कार्यवाही की खासी सराहना हुई थी लेकिन अली की शिकायत के निराकरण में जिस तरह की लेटलतीफी हुई या जानबूझकर होने दी गई, उससे मेडम की प्रतिष्ठा और ईमानदारीपूर्ण सेवा पर प्रश्न खड़ा हुआ है.

इस मजबूरी को समझा जा सकता है कि एक आइएएस, दूसरे साथी आइएएस के खिलाफ कार्रवाई करे तो कैसे करे? आश्चर्य कि जिस सरकार ने लोक सेवा गारंटी कानून लागू कर रखा है तथा जिसके अंतर्गत शासकीय सेवकों और नौकरशाहों को एक निश्चित अवधि के अंदर शिकायतों का निबटारा करना जरूरी होता है-वहां पर अली के आवेदन का निराकरण तीन महीने बीतने के बाद भी नहीं हो सका. एक बार मान भी लिया जाए कि रमजान ने ड्यूटी करने में लापरवाही बरती होगी लेकिन उसका वेतन रोकने का अधिकार आपको कैसे मिल गया? इसके पूर्व उसे कितने नोटिस दिये गये? निलंबन या बर्खास्तगी जैसी कार्रवाई के दौरान भी कर्मचारी को आधा वेतन या पेंशन पाने का अधिकार होता है. इस मुकाबले रमजान का गुनाह तो हल्का ही है.

लेकिन उसने अनमोल कीमत चुकाई. रमजान उन लाखों कर्मचारियों में शामिल था जिनके लिये सवेरा नई मेहनत और शाम थकान लेकर आती है. वह शासकीय कर्मचारी और ड्रायवर संघ का अध्यक्ष भी था लेकिन उसके परिवार की मदद के लिये कोई सामने नहीं आया. कर्मचारी-हितों के नाम पर कितने ही गुट-संगठन नेतागिरी करते हैं लेकिन प्रशासनिक दबाव के आगे सब बेबस नजर आ रहे. धर्म के उसूलों को आधार बनाकर बात-बात पर फतवा जारी करने वाली जमात हो या उनके नेता या फिर वोटों की खातिर अपनी राजनैतिक जमीन सींचने वाले राजनीतिक दल, रमजान अली की मौत पर आँसू बहाने का समय किसी को नहीं मिला. उसके जिंदा रहते ना सही, उसकी दुर्भागयपूर्ण और शर्मनाक मौत के जिम्मेदारों को सजा दिलाने की लड़ाई कांकेर से लेकर राजधानी तक लड़ी जानी चाहिए.

याद रखें कि यह घटना लाल आतंक में लिपटे उस जिले में हुई है, जहां आंख के बदले आंख का कबीलाई कानून लागू है लेकिन लोकतंत्र में न्याय की उम्मीद कानून के सांचे में ढली होती है. फिलहाल कमाऊ पूत के अचानक गुजर जाने से व्यथित पिता और अली का परिवार कलेक्टर के झूठे दिलासों का कफन ओढक़र सोने को मजबूर है. हुसैनी सेना, अली सेना, मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के अलावा मुस्लिम पंचायत और सीरत कमेटी जैसे संगठन हैं जिनकी एक आवाज पर पूरी कौम मदद के लिए खड़ी हो सकती है. वे चाहें तो रमजान के परिवार कोन्याय दिलाने की लड़ाई लड़ सकते हैं. यदि पत्थरों से बने आस्था-स्थलों के नाम पर जेहाद छिड़ सकता है तो रमजान को न्याय दिलाने के लिये क्यों नहीं?

अनिल द्विवेदी
लेखक पत्रकार हैं
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Wednesday, January 15, 2014

Wednesday, January 8, 2014

जिस कांग्रेस में 'बाबा' हैं
उस कांग्रेस में-जहां गांधी परिवार की मुहर ही अंतिम फैसला होती है-में इन दिनों कार्यकर्ता मन की बात कहने के लिये पार्टी फोरम नहीं बल्कि फेसबुक का सहारा ले रहे हैं! विधानसभा चुनाव में पार्टी की करारी हार से बौखलाए एक शख्स गोपाल साहू ने भड़ास निकालते हुए फेसबुक पर पोस्ट डाली. इसमें नेता प्रतिपक्ष रवीन्द्र चौबे की फोटो चस्पा करते हुए उनका एक बयान उद्धृत किया गया है. चौबे ने हार के बाद कहा था कि उम्मीदवार थोड़ा पहले तय हो जाते तो पार्टी जीत सकती थी. इस पर कार्यकर्ता ने कटाक्ष किया : आपकी टिकट तो तय थी महाराज. फिर कैसे हार गए?

यही सवाल एक साल पहले राहुल गांधी के समक्ष उठ चुका था. कार्यकर्ता भूले ना होंगे जब दुर्ग के एक कार्यकर्ता ने नेता प्रतिपक्ष रवीन्द्र चौबे की निष्क्रियता पर सवाल खड़ा करते हुए इस कदर आरोप लगाया था कि चौबे की आंखें गीली हो गई थीं. कांग्रेस की ताजा हार को लेकर जो खबरें जन्मीं, उसके मुताबिक जनमत साफ था कि निष्क्रिय, घमण्डी और बेईमान जनप्रतिनिधि नहीं चाहिये चाहे वह कांग्रेस हो या भाजपा लेकिन राहुल गांधी की इच्छा के विपरीत, नेता प्रतिपक्ष की जिद के चलते लगभग सभी विधायकों को टिकट दी गई जिनमें से सत्ताईस चुनावी मैदान में खेत हो गए. खैर.. अब पन्द्रह वर्ष का राजनीतिक वनवास बिताने को मजबूर कांग्रेस के कायाकल्प की शुरूआत हो ही गई. बदलाव के पहले शिकार प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष महंतजी हुए जिनके सर पर हार का ठीकरा फोड़ते हुए आलाकमान ने उनकी जगह तेजतर्रार और वरिष्ठ विधायक भूपेश बघेल को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया है लेकिन इन्हें मिली चुनौतियों की चर्चा बाद में.

अभी बात सरकार से लडऩे वालों की. विपरीत परिस्थितियों को साधते हुए, समझदारीभरे फैसले के साथ कांग्रेस विधायक दल को विश्वास में लेकर आलाकमान ने सरगुजा नरेश तथा वरिष्ठ विधायक टी.एस. सिंहदेव बाबा को नेता प्रतिपक्ष घोषित कर दिया. कहा तो यह जा रहा है कि गांधी परिवार से नजदीकी और महल के प्रभाव का इस्तेमाल करने के चलते सिंहदेव को यह अवसर मिला. इसे भी कौन नकारेगा कि सरगुजा में भाजपाई आंधी को थामकर सिंहदेव ने जिस तरह पार्टी की झोली में आठ में से सात सीटें डालीं, यह पद इसी का ईनाम माना जा रहा है. लेकिन राजनीति में नतीजे मायने रखते हैं, रणनीति नहीं. अब शर्माजी को ही लें. छठवीं बार विधायक बने सत्यनारायण जी नेता प्रतिपक्ष के प्रबल दावेदार थे लेकिन पार्टी में जरूरत से ज्यादा अज्ञातशत्रु पैदा कर लेना उनके लिये खतरनाक साबित हुआ. 

राजा अगर अच्छा है तो यह ईश्वर का वरदान है. यदि वह बुरा है तो मान लीजिए कि भगवान ने आपके पापों की सजा देने के लिये उसे भेजा है! नये साल में कुछ ऐसी ही उतार-चढ़ावभरी उम्मीद सरगुजा नरेश सिंहदेव से जुड़ चुकी हैं. नेक और कोमल स्वभाव वाले इस शख्स के सामने कई चुनौतियां हैं मगर राहुल गांधी की राह पर चलकर उनसे पार पाया जा सकता है. कांग्रेस का गढ़ वापस हासिल करने की तड़प के चलते कांग्रेस के युवराज ने युवा कार्यकर्ताओं के बीच टैलण्ट हाण्ट अभियान चलाया था लेकिन पार्टी उनका उपयोग कर पाती, इसके पहले बड़े नेताओं ने उनका शिकार कर लिया. सिंहदेव को भी युवा, उर्जावान और रमन सरकार के मंत्रियों को करारा जवाब देने वाले चेहरों को सामने करना होगा. लगातार तीसरी हार के बाद यदि कार्यकर्ता इस सोच के साथ घर बैठ गये हैं कि कांग्रेस का कुछ नहीं हो सकता तो उन्हें जगाने और उनमें विश्वास भरने का काम सिंहदेव को करना होगा. नब्बे विधानसभाओं में भी ऐसे चेहरे अभी से तलाशने-तराशने होंगे जो चुनाव जीतने की क्षमता रखते हों.

बड़े नेताओं के अहम और गुटबाजी से तंग आ चुके विधायकों में भरोसा जगाना बाबा के लिये तीसरी बड़ी चुनौती है. उनचालीस विधायकों में यह धारणा बलवती होती जा रही है कि भ्रष्टाचार से लेकर सरकार की खामियों तक के जिन मुद्दों को विधानसभा में वे उठाना चाहेंगे, उसके पीछे नेता प्रतिपक्ष का विश्वास और समर्थन बना रहेगा या नहीं. तीन बार से निर्वाचित हो रहे एक विधायक ने मुझसे कभी कहा था कि मयसबूतों के साथ उसने जब बलात्कार व हत्याकाण्ड का मामला पिछले विधानसभा में उठाना चाहा तो उसे चुप करा दिया गया. बाद में पता चला कि इसके बदले में नेता ने सरकार से भारी कीमत वसूल ली. यह कहने में गुरेज नहीं कि पूर्व के नेता प्रतिपक्षियों की कार्यशैली इस कदर बदनाम हो गई थी कि उन्हें रमन सरकार का चौदहवां मंत्री माना जाने लगा था. पत्रकारों ने जब इस छबि से मुक्त होने की बात सिंहदेव से पूछी तो उनका जवाब था : मैं मानता हूं कि हर आदमी की छबि उसके आचरण से तय होती है. आज के दौर में लोगों के सामने कुछ भी छुपा नहीं है. मेरे आचरण से पता चल जाएगा कि मैं क्या हूं?

आप क्या हैं, इसका अहसास होने लगा है. 2013 के चुनावों में दोबारा विधायक चुने जाने के बाद सिंहदेव पार्टी में ऐसे नेता के रूप में उभरे हैं, जिन्हें करिश्माई लीडर के तौर पर देखा जा रहा है. विधानसभा उपाध्यक्ष का विपक्षी-हक मांगने से लेकर अध्यक्ष पद पर सर्वानुमति कायम करने और लाल बत्ती को नकारने के बाद पार्टी और जनता उनके फैसलों की मुरीद हो चुकी है लेकिन सवाल यह है कि कांग्रेस कहां है और उसे कहां पहुंचाना है? क्या सिंहदेव आक्रामक और विश्वसनीय विपक्ष दे पाएंगे. इस देश में जहां पचास प्रतिशत से ज्यादा लोग युवा हैं तब कांग्रेस के अंदर बदलाव की एक बड़ी जरूरत महसूस हो रही है. जंग लगी मुरझाई सोच के थके-हारे चेहरों के बजाय कुछ कर गुजरने की सोच रखने वाले युवाओं को सामने लाना होगा. विधानसभा से लेकर संगठन और पंचायत स्तर तक में सरकार के खिलाफ धारदार हमला बोलने वाले युवा चेहरे तैयार करने होंगे. हालांकि गुटबाजी से अभिशप्त पार्टी में यह बदलाव थोड़ा समय मांगेगा मगर पांच साल कम थोड़े ही हैं.

अनिल द्विवेदी