Tuesday, November 25, 2014

किसका कोड़ा, किसकी पीठ

।। गंगा स्नान।।

पहले एक बयान : एक माँ का श्राप है जिम्मेदार कभी सुखी नही रहेंगे, यह दर्द दुलौरिन की सास के हैं जिसने बिलासपुर नसबंदी काण्ड में अपनी बहू को खो दिया है.

अब वाट्स अप पर आए मजाकिया संदेश पर गौर करें : मुख्यमंत्री कहते हैं : ऑपरेशन स्वास्थ्य मंत्री नहीं करता. स्वास्थ्य मंत्री कहते हैं कि स्वास्थ्य विभाग की गलती नहीं. डॉक्टर-संघ कह रहा है : मरीज गलत दवा खाने से मरे. फार्मा संघ कह रहा है : चूहा मार दवा इतनी नहीं थी कि उससे इंसान की मौत हो जाए लेकिन पीडि़त कह रहा है : बस कर ददा. गलती हमरे रहिच..हमरे मन करत रहिच मरे के..!

मजाकिया अंदाज लिए इस संदेश के अंतिम शब्द गंभीरता और सच्चाई ओढ़े हैं। काश यह तेजाब बन जाते और हर उस शख्स को झुलसा दें जो इस नसबंदी हत्याकाण्ड के जिम्मेदार माने जा रहे हैं। बिलासपुर के पेंडारी में हुआ नसबंदी हादसा या यूं कह लें कि एक ऐसा हत्याकाण्ड है जिसे मानव समूह की लापरवाही ने रचा। फिलवक्त 18 जानें गई हैं और अभी भी मौत मजे ले-लेकर लील रही है। चूक कहां हुई, कैसे हुई, समूची इंसानियत इसके जवाब के लिये बेकरार है लेकिन सही उत्तर नदारद है। यहां वाजिब सवाल यह खड़ा है कि जनसंख्या स्थरीकरण के लिए केन्द्र सरकार, जो नसबंदी योजना चला रही है, क्या वह सिर्फ एक समुदाय के लिए ही है क्योंकि मौतों का आंकड़ा इस पर अपनी मुहर लगा चुका है। 

यह अफसोसजनक हादसा ऐसे राज्य में हुआ है जिसके मुखिया यानि मुख्यमंत्री खुद डॉक्टर हैं। रमनसिंह जी की जो बड़ी खासियत है, वह यह कि उन्हें तौलकर बोलने में महारत हासिल है लेकिन उन्होंने मन को चुभने और गले ना उतरने वाला बयान देकर चौंका दिया। सवाल स्वास्थ्य मंत्री के इस्तीफे को लेकर दागा गया था जिसके जवाब में उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य मंत्री ऑपरेशन नहीं करते! कमाल है भाई! अगर सालों पहले रेल हादसे से विचलित एक रेल मंत्री ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था तो क्या इसका मतलब यह कि रेल मंत्री ही रेल चलाते हैं। यह तो नैतिकता का तकाजा है और इस्तीफा उसका सुबूत। एक नरेन्द्र मोदी हैं जिन्होंने छह महीने में ही परफारमेंस ना देने वाले मंत्रियों को सबक सिखाते हुए उनके विभाग छीन लिए। और एक आप हैं कि कोई कार्रवाई ना करना ही मानो असली काम बन चुका है। 

अपने परिजनों को खो चुके लोग दु:ख से सूखे जा रहे हैं और राजनीतिज्ञ हैं कि मौत को मनोरंजक बनाते हुए उलजुलूल बयान दे रहे हैं। फिलवक्त किसी कार्रवाई की उम्मीद करना बेमानी होगा क्योंकि बचने-बचाने का खेल शुरू हो चुका है। शुरूआत आरोपी डॉक्टर से करते हैं जिसकी गिरफतारी का विरोध इंडियन मेडिकल एसोसिएशन कर रहा है। डॉक्टरों के संघ ने जिन दो मांगों के साथ प्रदर्शन किया, उसमें एफआईआर से हत्या की धारा हटाने तथा रिहाई की मांग जुड़ी है। परंतु शवों पर अपने तर्कों के अट्ठहास लगाने वाले स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल ने स्वागतयोगय लेकिन घुडक़ीभरे अंदाज में कहा कि फिलहाल जो मौतें हुई हैं, उनमें से कुछ की वजह इंफेक्शन बताया जा रहा है जिसके लिए डॉक्टर जिम्मेदार है। 

जिस राज्य में पिछले 12 सालों तक निजी नर्सिंग होम एक्ट लागू ना हो सका हो, अंदाजा लगाया जा सकता है कि डॉक्टरों के बचने या बचाने की किस कदर छूट मिली हुई है! आंखफोड़वा काण्ड, गर्भाशय काण्ड, मलेरिया से होती बेगुनाह मौतें, स्वास्थ्य कार्ड के नाम पर लूट जैसे कई हादसे हमने देखे और हर वक्त इस उम्मीद के साथ मन मसोसकर चुप हो गए कि कभी तो स्थिति बदलेगी, सिस्टम सुधरेगा या डॉक्टरों में मानवीयता जागेगी मगर अफसोस कि गरीबों की जान के साथ खेलना मानो इनका असली पेशा बन चुका है। 

इस मखौल में सब शामिल हैं तभी तो विपक्षी कांग्रेस को जैसे अंधेरे में तीर चलाने का बहाना मिल गया। जनता को तो याद है परन्तु पार्टी ना भूले कि चंद महीनों पहले ही राजधानी रायपुर में पीलिया से हुई मौतों में तीन दर्जन से ज्यादा जिंदगियां होम हो गई थीं! क्या महापौर डॉ. किरणमयी नायक उन चेहरों को गिना सकती हैं जो इस काण्ड के लिए जिम्मेदार थे और उन्होंने उन पर बड़ी या कड़ी कार्रवाई की? नतीजा सिफर रहा है। लेकिन जनता न्याय करना चाहती है और वह नगर निगम चुनाव का इंतजार कर रही है। अब वापस नसबंदी काण्ड पर लौटते हैं जिस पर राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए सुरक्षित घरों में बैठे तमाम इच्छाधारी फुफकारते हुए बाहर निकल आए। इन्हीं में से एक कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी। दुर्घटना के पीडि़तों को रमन सरकार ने जो मुआवजा बांटा, वह न्यायानुकूल तो नहीं लगा मगर वह उसका धर्म था और निभाया भी लेकिन कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी से लेकर छुटभैया नेताओं ने आश्वासन और वादों के अलावा कुछ नहीं दिया। 

मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि राहुल जब पीडि़तों से मिल रहे थे तो वे लडख़ड़ाती सांसों के साथ यह उम्मीद बांधे बैठे थे कि कांग्रेस के युवराज उस पार्टी के सर्वोच्च नेता हैं जिसकी तिजोरी अरबों के चंदे से भरी पड़ी है? क्या उसका मुंह इन पीडि़तों की मदद के लिए नहीं खोला जा सकता था? राहुल ने महज सुर्खियां बटोरीं, वादों और आश्वासनों का मलहम लगाया और चलते बने। इसके ठीक विपरीत कांग्रेस के युवा विधायक अमित जोगी के पहल की दाद देनी होगी कि उन्होंने ना सिर्फ पीडि़तों के दु:ख-दर्द को बांटा बल्कि एक अनाथ बिटिया को उसकी परवरिश करने के लिए गोद भी लिया। राज्य में 90 विधायक हैं। अगर एक-एक परिवार को भी गोद लेंगे तो अभागे परिवारों के दर्द और आंसुओं पर कुछ तो मलहम लगेगा ही। 

आप भूलें ना हों तो याद दिला दूं कि पूर्व गृह मंत्री ननकीराम कंवर ने तीन साल पहले राजधानी के मेडिकल स्टोर में पुलिस के दस्ते भेजकर छापे पड़वाए थे। कारण यह कि उन्हें नौ रूपये की टेबलेट नब्बे रूपये में बेची गई थी। तब छापे में आश्चर्यजनक खुलासा हुआ था कि मेडिकल स्टोर्स में नकली दवाईयां खपाई जाती हैं। कंवर का यह अभियान जनता के हित से जुड़ा था या उनकी व्यक्तिगत भड़ास रही हो, परन्तु पब्लिक ने उसे खासा रिस्पांस दिया था। हालांकि  स्वास्थ्य विभाग को दीमक की तरह चाट रहे दलाल ठेकेदारों तथा कुछ राजनीतिज्ञों ने हायतौबा मचाते हुए कार्रवाई को कटघरे में खड़ा किया था परन्तु शीशे की तरह साफ है कि पूरे राज्य में दवा व्यवसाय का काला धन्धा फल-फूल रहा है और उसे सरकार के राइट-लेफट में बैठे शुभचिंतक संरक्षित करते रहे हैं, इन्हें बचाने का खेल बड़ी चालाकी से खेलते हैं। 

महावर दवा कंपनी को ही लीजिये : सन् 2012 में उसका लाइसेंस रद्द हुआ था लेकिन जल्द ही उसे श्रेष्ठ गुणवत्ता का प्रमाण-पत्र पकड़ा दिया गया। महावर को सांसद रमेश बैस के चुनाव कार्यालय प्रभारी के तौर पर मैंने खुद देखा है। मन में यह सुगबुगाहट उठना स्वाभाविक है कि सरकारी अस्पतालों में दवाईयां खपाने से लेकर राजनीतिक मदद करने तक में किसने साथ दिया होगा? हालांकि श्री बैस का साफगोईपना देखिए कि उन्होंने खुद ही खुलासा किया कि जिस दवा कंपनी की दवाईयां मरीजों को दी गईं, उसे कुछ साल पहले ब्लैकलिस्टेड किया जा चुका है। नसबंदी काण्ड पहला मामला थोड़े ही है। इसके पहले शर्मिंदा करने वाले वाकयों को अंजाम दिया गया था, उसके दोषी डॉक्टर नाममात्र के लिये निलंबित हुए और चंद महीनों में ही बहाल कर दिए गए। गर्भाशय काण्ड में जिन डॉक्टरों के लाइसेंस रद्द हुए, उसमें से कितने ही फिर से अपनी प्रेक्टिस पर लौट आए हैं। कहने का तात्पर्य यह कि सजा ऐसी दीजिये कि नैतिकता का थर्मामीटर टूट जाए। बहकावे में आकर या कह लें कि चंद रूपये पाने का लालच ही सही, आंखों में सपने पालने वालों ने सिस्टम पर भरोसा करने की जो कीमतचुकाई है, शैतानों को उसका पाई-पाई का हिसाब अभी ना सही, कभी ना कभी तो चुकाना पड़ेगा ही, वह भी जिंदा रहते हुए। रही न्याय की बात तो आप देखिएगा, आंखफोड़वा काण्ड, गर्भाशय काण्ड या बालको चिमनी हादसा की तरह ही नसबंदी काण्ड भी अपनी मौत मर जाएगा यानि इंसाफ समय की गर्द में दफन हो चुका होगा। 


अनिल द्विवेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार और शोधार्थी हैं 
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