Thursday, August 15, 2013

अब दाँव पर मूछें कौन लगायेगा

‘आइ एम द किंग ऑफ रियासत बट दिस परसन इज द किंग ऑफ डेमोक्रेसी’ यानि मैं तो एक रियासत का राजा हूं लेकिन जूदेव लोकतंत्र के राजा हैं क्योंकि इन्हें जनता ने चुनती है. राजस्थान के महाराजा ने अपने विदेशी मेहमानों से दिलीपसिंह जूदेव का परिचय कभी इसी अंदाज में करवाया था. रौबीले चेहरे की शान बन चुकी घनी मूंछों पर ताव देते शख्स के तौर पर, मेरी तरह हिन्दुस्तानियों को भी दो ही चेहरे नजर आते हैं. एक थे देश की आजादी के नायक चंद्रशेखर आजाद और दूसरे जशपुर नरेश दिलीप सिंह जूदेव, जो हमारे बीच अब नहीं रहे. नईदिल्ली के मेदांता अस्पताल में कई दिनों तक जिंदगी और मौत से संघर्ष करने के बाद उन्होंने अंतिम सांसें ली.

इस दु:ख भरे क्षण में ना चाहते हुए भी यह बात कहना पड़ रही है कि गुजरे कुछ समय से जशपुर राजघराने पर अपशकुनों की छाया मंडरा रही है. हम भूले नहीं हैं कि चंद महीनों पूर्व ही उन्होंने अपने बड़े बेटे शत्रुंजय प्रताप सिंह को अकाल मृत्यु के हाथों खोया था और चंद महीनों बाद ही माँ जयादेवी का हाथ भी उनके सर से उठ गया था. ढलती उम्र और छोटी-मोटी बीमारियों से जूझ रहे जूदेव को बड़े बेटे की मौत ने हिलाकर रख दिया था. दरअसल वे उनमें अपना राजनीतिक वारिस खोज रहे थे. सब कुछ ठीक-ठाक रहता तो बिलासपुर का अगला सांसद जूदेव नहीं बल्कि उनके सुपुत्र शत्रुंजय बनते. खुद जूदेव के जनाधार का आलम देखिये कि उनके नाम पर ‘जूदेव सेना’ तक बनाई गई लेकिन इसका इस्तेमाल उन्होंने अन्य राजनीतिज्ञों की तरह कभी भी पार्टी को ब्लैकमेल करने या किसी को सबक सिखाने के लिये नहीं किया.

भाजपा के लिये अपूरणीय क्षति और हिन्दुत्व रूपी राजनीति का कभी ना भरा जाने वाला शून्य. देश की सियासत से लेकर छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पाटी का जनाधार पैदा करने वालों में जिन नेताओं को खासा याद किया जायेगा, जूदेव उनमें से एक होंगे. शरीर पर फौजी वर्दी, हाथ में हिन्दुत्व का झंडा और इसाई मिशनरियों के पुराने प्रतिद्वंद्वी लेकिन हिन्दु ह्दय सम्राट के तौर पर अपनी पहचान कायम रखने वाले दिलीपसिंह जूदेव एक ऐसे नेता थे जिनके परिवार ने पहले जनसंघ और फिर भाजपा के लिये अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया. यह कहते हुए सुकून होता है कि संघर्षशील जनसंघ से लेकर भाजपा के राजशाही युग तक जूदेव की तीसरी पीढ़ी पार्टी की सेवा में वफादारी के साथ लगी है. बहुत कम लोग जानते होंगे कि 1970 के दशक में-जब देश में एक ही पार्टी कांग्रेस का जलवा था-जूदेव के पिताजी ने मात्र एक रात के फैसले में जनसंघ की तरफ से सांसद का चुनाव लडऩे का फैसला स्वीकार किया बल्कि पूंजी लगाकर दूसरे अन्य प्रत्याशियों का हौंसला बढ़ाया. जूदेव पर परिवारवाद के लाख आरोप लगे हों लेकिन आईना दिखाता सच यह है कि राजाजी ने कई गरीब-गुरबों को फर्श से उठाकर अर्श तक पहुंचाया और मंत्री, विधायक व सांसद की कुर्सी दिलवाई.

एशिया का सबसे प्राचीनतम चर्च जशपुर में है तो अंदाजा लगाइये कि यहां पर चर्च की जड़ें कितनी मजबूत होंगी लेकिन जूदेव होश संभालते ही उनके लिए हमेशा अजेय चुनौती बने रहे. हिन्दु से इसाई बन गये लाखों लोगों को पुन: हिन्दु धर्म में लाने के लिये उन्होंने लम्बी-चौड़ी लड़ाईयां इतने प्रभावी ढंग से लड़ी कि 1988 के आसपास जशपुर की एक नन-मिशनरियों की महिला संत-को अदालत ने जिलाबदर कर दिया था.  आदिवासियों के पैर धोकर उन्हें पुन: घर-वापसी कराते हुए देखने पर यकीन नहीं होता था कि एक राजा के मन में हिन्दुत्व के प्रति कितनी श्रद्धा और विश्वास था. अब जबकि जूदेव नहीं हैं, संघ परिवार सहित हिन्दु समाज के समक्ष यह संकट आन पड़ा है कि घर वापसी अभियान की कमान किसके हाथों में होगी?

जशपुर नरेश जूदेव ताउम्र राजा की तरह जिए, राजा की तरह दहाड़े और उनकी विदाई भी राजा की तरह हुई. राजनैतिक नुमाइंदे भूले ना होंगे कि अपने राजनैतिक कैरियर की शुरूआत में उन्होंने पहला चुनाव अर्जुनसिंह के खिलाफ दमदारी से लड़ा था और उनके ‘चेले-चपाटों’ से अब तक लड़ते रहे. यह कतई छुपा नहीं है कि जोगी और जूदेव परंपरागत राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी बनकर एक-दूसरे को पछाड़ते रहे लेकिन राजनीतिक कड़ुवाहट के लिये जूदेव के मन और जुबान में कोई भेद ना था. पिछले लोकसभा चुनाव में जब उन्होंने डॉ. रेणु जोगी को हराया तो भावनाओं के प्रगटीकरण में वे मुझसे यह कहना नहीं भूले कि ‘यदि मैं हार भी जाता तो रेणु जोगी जैसी महिला से हारने का संतोष होता.‘
   
जूदेवजी दिल से राजा थे. सडक़ से लेकर संसद तक, आम से लेकर खास तक से खुद आगे बढक़र हाथ मिलाने की उनकी अदा लोगों का दिल जीतती थी. उनकी राजनीतिक पहुंच का असर देखिये कि एनडीए सरकार जाने के बाद जब यूपीए सरकार सत्ता में आई तो छत्तीसगढ़ के एक वरिष्ठ भाजपा सांसद का सामान बंगले से उठाकर बाहर फेंकवा दिया गया मगर जूदेव ताउम्र रकाबगंज स्थित अपने उसी बंगले में रहे जो उन्हें केंद्रीय राज्यमंत्री रहते हुए आबंटित हुआ था!  दोस्ती निभाने में या मेहनमानवाजी करने में उनका कोई मुकाबला नहीं था. जिस स्टिंग ऑपरेशन ने उनके राजनैतिक कैरियर पर काला धब्बा लगा दिया, उस साजिश के तथाकथित दोषी नटवर रतेरिया को-परिवार और मित्रों के लाख विरोध के बावजूद-अपने से कभी जुदा नहीं होने दिया. हालांकि इस बड़ी चूक ने उनके मुख्यमंत्री बनने के सपने को चकनाचूर कर दिया. सिद्धांतों और पार्टी की इज्जत के लिये जूदेव ‘सिंह’ की तरह लड़े. सन् 2003 में जोगी सरकार के खिलाफ ताल ठोंकने की बारी आई तो उन्होंने अपनी मूंछें दांव पर लगाकर पार्टी को ऐतिहासिक जीत दिलवाई.

अपने हमसफरों के लिये वे किसी भी स्तर की लड़ाई लड़ लेते थे. राज्य में भाजपा की सरकार दस सालों से चल रही है और मंत्रियों से लेकर मुख्यमंत्री तक से उनके कई मतभेद थे मगर पार्टी की इज्जत की खातिर दिलीप ंिसह जूदेव ने सार्वजनिक तौर पर कभी खुलकर कुछ नहीं कहा. मगर पिछले साल ही उनके बिलासपुर के एक समर्थक पर जब पुलिसिया अत्याचार हुआ और सरकार ने उनकी बातों पर कान नहीं धरे तो जूदेव प्रशासनिक आतंकवाद के खिलाफ जमकर दहाड़े. हमारे अजीज जूदेवजी तो चले गये लेकिन युद्धवीर सिंह के लिये एक निर्मम सच्चाई यह है कि वे एक ऐसे कुरूक्षेत्र में खड़े हैं जहां परिवार से लेकर क्षेत्र की जनता के लिए, अपने राजनैतिक कैरियर और पिता के सपनों को पूरा करने के लिए हर मोर्चे पर लडऩा-जीतना होगा. उम्मीद की छतरी हमने भी तानी है कि अपने नाम के मुताबिक युद्धवीर, इस महासमर में विजयी होकर निकलेंगे. गम और संकट की इस घड़ी में फिलहाल एक ही वादा : हम आपके साथ है!

अनिल द्विवेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार और शोधार्थी हैं.

Tuesday, August 13, 2013

किसका राज, कैसा धर्म

देर से ही सही, उस सच को देश के पूर्व गृहमंत्री लेकिन अब केंद्रीय वित्त मंती पी. चिदंबरम ने कुबूल कर ही लिया कि जम्मू-कश्मीर में एक वर्ग ऐसा भी है जो आज भी पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाता है और यह सिलसिला 1990 से चला आ रहा है. लेकिन इसके उलट अफसोस और आश्चर्य दूसरे बयान में दिखा. केंद्रीय गृह मंत्री की ओर से संसद में बोलने के लिए खड़े हुए चिदंबरम ने कहा कि ‘यह कोई नई बात नहीं है. ऐसा ईद के मौके पर एक वर्ग सालों से करता आ रहा है.‘ उनके एक और वक्तव्य पर मेरी तरह पूरा देश उनके साथ है कि 1990 की तरह हालात बिगडऩे नहीं दिये जायेंगे और ऐसे असामाजिक तत्वों से निबटने के लिये सेना पूरी तरह स्वतंत्र है? चिदंबरम की इस दृढ़ता को भी पूरा समर्थन है कि किसी को भी जम्मू-कश्मीर से विस्थापित नहीं होने दिया जायेगा.

निश्चित तौर पर कट्टरता भारतीय समाज का चरित्र कभी नहीं रहा. मगर सवाल यह मौजूं है कि यदि एक वर्ग देशद्रोही विचारों के साथ पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाता है तो दूसरा वर्ग उनसे यह सवाल तो कर ही सकता है कि भाई जब इस देश में रहते हो, यहां का हवा-पानी-अन्न खाते हो तो हिन्दुस्थान पर बुरी नजर रखने वाले पाकिस्तान की जय-जय क्यों? इसलिए जम्मू-कश्मीर के एक वर्ग ने यही किया. सरकारी ऐलान है कि ईद के दिन नमाज पढऩे के बाद खुरेंजी के जुनून में अंधे एक गुट ने देश विरोधी नारे लगाये जिसका स्थानीय लोगों ने विरोध किया. इससे गुस्साई भीड़ ने बंदूक, तलवार और डण्डे हाथ में लिये मुनीद चौक पर लगभग सौ दुकानों को फूंक डाला और तीन को गोली मार दी. इसमें दो की मौत हो गयी और सैंकड़ों घायल हुए. पुलिस और अन्य सिविल अथॉरिटी ने पूरे मामले में किसी प्रकार का प्रतिरोध दर्ज नहीं करवाया बल्कि दंगाईयों को और सहायता प्रदान की गयी. अफसोस कि रामबन में सुरक्षा बलों तक को निशाना बनाया गया.

आजादी के बाद से ही जम्मू की देशभक्त जनता ने लगातार न केवल आतंवाद के विरुद्ध आवाज उठाई बल्कि उसे हराया भी है. आतंक और अलगाववाद का खूनी खेल, खेल रहे लोग हताश हो चले हैं. उन्हें लगता था कि बंदूकों के दम पर या तो वे अल्पसंख्यकों को कश्मीर से भगा देंगे या फिर इस्लाम कबूल करवा लेंगे लेकिन कश्मीर की बहादुर जनता ने उनकी इन धमकियों पर कभी कान नही धरे. ऐसे में आतंकवाद और अलगाववाद को करारी शिकस्त मिली तो उन्होंने इन लोगों को बदनाम करने के लिए नए तरीके ईजाद कर लिए हैं. घटना के बाद मचे राजनैतिक कोहराम और दबाव के बाद राज्य के गृहमंत्र्री ने आखिर इस्तीफा दे ही दिया लेकिन कश्मीर के स्थानीय अखबार जो लिख रहे हैं, उसके मुताबिक नमाज में राज्य के गृहमंत्री भी शामिल हुए थे. उनकी आंखों के सामने दंगाईयों ने उत्पात मचाया लेकिन गृहमंत्री मानो उनका साथ देने के लिये ही खड़े थे!

बात चाहे गुजरात की हो या जम्मू-कश्मीर की, एक राजा को धर्मनिरपेक्ष रहना-दिखना चाहिए. उमर अब्दुल्ला अपने पापों को गुजरात दंगों का बहाना बनाकर भले ही छिपा लें लेकिन इस इतिहास को सभी जानते हैं कि कश्मीर की समस्या को भाड़े के आतंकवादियों से ज्यादा भारतीय सियासतदांओं ने उलझाया है. पहले शेख अब्दुल्ला और जवाहरलाल नेहरू, अहं की लड़ाई लड़ रहे थे बाद में उनके खानदानी वारिसों ने इस जंग की जिम्मेदारी उठा ली. कश्मीर के सत्तानायकों से उम्मीद है कि वे कश्मीर को अपनी राजनीतिक लिप्साओं का मुददा नही बनाएंगे. कश्मीर राजसत्ता का नहीं बल्कि इस देश की भावसत्ता का मुद्दा है. कश्मीर के लोग अपने दम पर अकेले इस चक्रव्यूह से निकल पाएंगे, यह मान लेना भूल होगी. इससे निबटने में नईदिल्ली और श्रीनगर की ससरकारों की नेकनीयती और मजबूत इच्छाशक्ति भी बेहद जरूरी है.

सत्ता, शक्ति और मजहब का अनूठा कॉकटेल तैयार करने वाले कुछ राजनीतिक दलों की चुप्पी ने इस बात का अहसास कराया है कि मानो जम्मू-कश्मीर भारत का अंग ना हो. अल्पसंख्यकों के अधिकारों की बात करने वाले ऐसे छुपे बैठे हैं मानो कश्मीर के अल्पसंख्यकों के दर्द और उन पर हो रहे अन्याय से उन्हें कोई लेना-देना ही नहीं है. यहां बहुजन समाज पार्टी के नये और ताजा रूख की तारीफ करना चाहूंगा कि उन्होंने वोट बैंक के खातिर ही सही, देश की एकता और शांति बनाये रखने की अपील करते हुए दोषी गृहमंत्री के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की मांग तो रखी.

और सरकार से ज्यादा जरूरत हमारी चिंताओं की है जो महज परिवार और अपने स्वार्थपूर्ति तक आकर खत्म हो गई हैं. हनीमून मनाने से लेकर धार्मिक यात्रा करने तक हमारे पांव जम्मू (कटरा) से आगे कम ही बढ़ते हैं. क्या हमने कभी जम्मू-कश्मीर जाने की हिमाकत की? पाकिस्तानी सेना के दुस्साहस से लेकर आतंकवादियों तक यदि कश्मीर में पनपे-पसरे हैं तो इसके जिम्मेदार हम भी हैं क्योंकि हमने कश्मीर को उसके भागय और हाल पर छोड़ दिया है. सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर मौज-मस्ती, गॉसिप या अश्लील चित्रों को एक-दूसरे से बांटकर दिल बहलाने वालों को देश की समस्या पर बोलने या लिखने की फुरसत कब मिलेगी! सही समय है कि मजहब के नाम पर जुनून बांटने वालों को जुदा करने की मुहिम में हमें जुटना ही होगा. ना भूलें कि चलना, जीना और बढऩा ही हमारी रवायत है,

अनिल द्विवेदी
(लेखक पत्रकार और शोधार्थी हैं)