मुर्दे भी बोल सकते हैं? देश के सबसे ज्यादा नक्सल प्रभावित छत्तीसगढ़ और खासकर बस्तर में यह हास्यास्पद सवाल अनेकों बार उठा है. नक्सली एनकाउंटर हो, आदिवासी महिला के साथ सामूहिक बलात्कार या फिर आदिवासियों को नक्सली बताकर जेल में डालने जैसी कार्रवाई, मानवाधिकार संगठन से लेकर मृतकों के परिजन तक पुलिस की भूमिका पर अंगुलियां उठाते रहे हैं.
बात आगे बढ़े, उसके पहले दृढ़ता के साथ यह साफ कर दें कि हम यहां पर पुलिस के साहस, कार्रवाई या अभियानों पर प्रश्नचिह्न खड़ा करके उनका मनोबल कमजोर नहीं करना चाहते. किसी के हाथ में बंदूक है तो आप प्रवचन की मुद्रा में कब तक खड़े रहेंगे? 76 जवानों की शहादत होती है तो कलेजा हमारा भी रोता है. मगर जो न्याय कहता है, वह यह कि यदि किसी को चोरी के आरोप में पकड़ रहे हैं, मार रहे हैं तो सबूत तो देने होंगे ना. यही सवाल मैंने दो वर्ष पहले राज्य के पूर्व पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन से किया था. तब उन्होंने स्वीकार किया था कि पुलिस अधिकारी भी किसी डर या दबाव से अपने पूर्ववर्ती बयान से मुकर सकता है! दरअसल कांकेर न्यायालय ने एक फैसला सुनाते हुए उन अठारह आदिवासियों को बाइज्जत बरी कर दिया था जिन्हें पुलिस पार्टी पर हमला बोलने के आरोप में दो साल तक जेल में डाले रखा और अदालती लड़ाई के चक्कर में इन ग्रामीणों ने बहुत कुछ खो दिया था. क्या इस तरह की घटनाएं बंदूक उठाने को विवश नहीं करेंगी!
पुलिस की कार्रवाईयां हमेशा संदेह और सवालों के घेरे में क्यों आ जाती हैं? गुजरे सालों में ऐसी कई मुठभेड़ें हुईं जब माओवादियों को मारने का दावा किया गया मगर जल्द ही वह संदिगध हो गयी. आरोप तो यहां तक लगे कि सफलतायें गिनाने के लिये पुलिस ने निर्दोष ग्रामीणों को मार डाला! चंद दिनों पूर्व ही महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले में इटापल्ली के नजदीक पुलिस के साथ हुई मुठभेड़ में छह महिला नक्सलियों को मारने का दावा किया गया है मगर परिस्थितियां और बयानों के मुताबिक मामला संदिगध नजर आ रहा है! कांग्रेस काफिले पर नक्सली हमले के चंद दिनों पूर्व ही सीआरपीएफ ने एडसमेटा में एक मुठभेड़ के तहत सात नक्सलियों को मार गिराने की बात कही थी लेकिन जल्द ही पता चल गया कि वे सभी आदिवासी थे जो पूजा के लिये इकट्ठा हुए थे लेकिन सर्चिंग करती पुलिस ने उन्हें नक्सली समझा व ताबड़तोड़ गोलियां चला दीं. आश्चर्य कि इस मामले में पुलिस ने जरूरी दस्तावेज तक उपलब्ध नहीं कराये नतीजन आयोग की जांच अटकी हुई है.
मानवता को कलंकित करते ऐसे हादसे एक नहीं, कई हैं. गुजरे 14 फरवरी को ही कांग्रेस ने आरोप लगाया था कि बीजापुर जिले के मदपाल गांव में जिला पुलिस बल और एसटीएफ ने मित्तुर थाना से 8 कि.मी दूर एक फर्जी मुठभेड़ में दो युवकों की हत्या कर दी जबकि ये अपने छह मित्रों के साथ जंगल घूमने के लिये निकले थे. इसके विरोध में पुलिस को जो ज्ञापन सौंपा गया, उसका कोई नतीजा नहीं निकल सका. मानो आदिवासियों के जीवन की कोई कीमत ही नहीं रही. सालों पूर्व दंतेवाड़ा के सिंगारम गांव में एसपीओ और जिला पुलिस ने 15 नक्सलियों को मारने का दावा किया था लेकिन सामाजिक संगठन और मृतकों के परिवारजन कहते हैं कि पुलिस ने नक्सलियों को पनाह देने के आरोप में ग्रामीणों को एक कतार में खड़ा करके नरसंहार किया. इस मामले की सुनवाई अभी भी जारी है.
अप्रैल, 2010 में दंतेवाड़ा के ताड़मेटला में नक्सलियों ने 76 जवानों को मौत के घाट उतार दिया था. इस ह्दय विदारक घटना के कुछ महीनों बाद इलाके की सर्चिंग कर रहे कोया कमाण्डो व पुलिस जवानों ने जांच के बहाने आदिवासियों के साथ मारपीट और महिलाओं से बलात्कार किया तथा तीन सौ से ज्यादा घरों को आग के हवाले कर दिया. घटना की वस्तुस्थिति जानने पहुंचे स्वामी अगिनवेश को पुलिसिया आतंक का शिकार होना पड़ा था. आश्चर्य कि मामले की जांच के लिये बैठाये गये आयोग ने अभी तक अपनी रिपोर्ट नहीं दी और सीबीआई भी केंचुए की गति से आगे बढ़ रही है.
इन सबमें जो दर्दनाक वाकया है, वह मीना खलखो मुठभेड़ से जुड़ा है. आरोप है कि जुलाई, 2011 में पुलिस और नक्सलियों के बीच जो कथित मुठभेड़ हुई, उसमें एक आदिवासी लडक़ी मीना खलखो मारी गई थी. पुलिस उसे नक्सलवादी बता रही है जबकि गांववालों ने मुठभेड़ को फर्जी करार दिया था. कांग्रेस के क्षेत्रीय विधायक टी.एस. सिंहदेव के मुताबिक मामला विधानसभा में उठने के बाद आई फारेंसिक रिपोर्ट से जो खुलासा हुआ, उसके मुताबिक मीना के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ और फिर गोली मार दी गई! इस मामले पर बैठे जांच आयोग ने अभी तक सुनवाई पूरी नहीं की है. जून 2012 की रात सारकेगुड़ा में हुई एक मुठभेड़ में पुलिस ने 17 नक्सलियों को मार गिराने का साहस दिखाया था लेकिन एक दिन में ही साफ हो गया था कि मारे गए लोग ग्रामीण थे जिसमें कुछ नाबालिग स्कूली बच्चे भी थे! मामले की जांच का हाल यह है कि अभी तक पुलिस दस्तावेज तक उपलब्ध नहीं करा सकी है.
वैसे किसी के माथे पर नहीं लिखा है कि वह नक्सली है या पुलिस. और यही कारण है कि निर्दोष भी चपेट में आ जाते हैं. साफ है कि अगर पुलिस इसी सोच में डूबी रहे तो नक्सलियों को जवाब कैसे दिया जायेगा? लेकिन इस उहापोह में निर्दोष आदिवासियों को मारने की छूट नहीं दी जा सकती. फर्जी मामले और पुलिस प्रताडऩा के आगे दम तोडऩे जैसा प्रकरण तथाकथित माओवादी पोडिय़ामी माड़ा का है. माड़ा ने पुलिस थाने में ही फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी. पूर्व की नागा बटालियन और सीआरपीएफ के अनेक जवानों पर पहले बलात्कार और बाद में एनकाउंटर करने की घटनाएं घटी लेकिन दोषी अभी तक या तो बचे हैं या ऐसे मामलों पर जो जांच कमेटियां बैठाई गईं, उनकी जांच रिपोर्ट या तो आई नहीं या फिर उन्हें रद्दी की टोकरी में डाल दिया गया. कुछ में नाममात्र की खानापूर्ति की गई. कहावत यूं ही नहीं बनी है कि सैंया भये कोतवाल तो डर काहे का! पुलिस की जांच पुलिस ही करेगी तो न्याय कहां से मिलेगा? काश मुर्दे बोल पाते.
अनिल दिवेदी
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और शोधार्थी हैं)